संविधान सभा के समक्ष कौन कौन सी चुनौतियां थी?

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भारतीय संविधान की रचनाः समस्याएँ और चुनौतियाँ : भारतीय संविधान ने तो किसी संयोग की उत्पत्ति है और न ही क्रमिक विकास का परिणाम । इसकी रचना एक संविधान निर्मात्री सभा द्वारा लगभग तीन वर्षों के विचार-विमर्श के उपरांत की गई और इसे एक निश्चित तिथि पर अंगीकृत करके एक निश्चित तिथि पर लागू किया गया । दूसरे शब्दों में इंग्लैण्ड के विपरीत, भारत का संविधान निर्मित एवं लिखित है । भारत का जनतंत्रीय शासन व्यवस्था शताब्दियों के विकास का परिणाम है जो मूलतः परम्पराओं पर आधारित है । वे नियम जिनके आधार पर इंग्लैण्ड में सरकार के विभिन्न अंगों का गठन और कार्य-संचालन होता है, न तो पूर्णतया लिखित है और न ही किसी एक पुस्तक के रूप में उपलब्ध है । इनमें से अधिकांश नियमों को औपचारिक रूप से न तो बनाया गया है और न ही उन्हें लेखबद्ध किया गया है । संभवत: यही कारण है कि डी. टाकवेलि ने यह कह दिया कि इंग्लैण्ड में कोई संविधान नहीं है ।

विश्व के आधुनिक संविधानों में अमेरिका पहले देश है जहां 1776 में फ्लेडल्फिया में आयोजित एक सम्मेलन में अमेरिकी संविधान की रचना की गई और 1789 में उसे लागू किया गया ।

भारत में स्वाधीनता की मांग में ही संविधान बनाने की मांग भी छिपी हुई थी । 1895 में बाल गंगाधर तिलक के निर्देशन में तैयार किए गए’ स्वराज्य विधेयक में भारत के लिए संविधान बनाने हेतु एक संविधान सभा को गठित करने की बात की गई थी । 1922 में महात्मा गांधी ने यह विचार व्यक्त किया कि ‘भारतीय संविधान भारतीयों की इच्छानुसार ही होगा । 1924 में मोतीलाल नेहरू ने ब्रिटिश सरकार के सामने संविधान सभा के निर्माण की मांग प्रस्तुत की । एम.एन. राय ने भी स्पष्ट रूप से संविधान सभा के गठन का विचार प्रस्तुत किया । पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रयत्नों से कांग्रेस ने औपचारिक रूप से यह घोषणा की कि’ यदि भारत को आत्म-निर्णय का अवसर मिलता है तो भारत के सभी विचारों के लोगों की प्रतिनिधि सभा बुलाई जानी चाहिए जो ‘ सर्वसम्मति से संविधान का निर्माण कर सके । यह संविधान सभा होगी ।

1936 में लखनऊ में आयोजित कांग्रेस-अधिवेशन में संविधान सभा के विषय में चर्चा हुई और 1937 तथा 1938 के अधिवेशन में संविधान सभा की पुनः मांग की गई । 1938 के कांग्रेस-अधिवेशन में यह प्रस्तुत पारित किया गया कि’ एक स्वतंत्र देश के लिए संविधान निर्माण का एकमात्र तरीका संविधान सभा है । सिर्फ प्रजातंत्र और स्वतंत्रता में विश्वास न रखने वाले ही इसका विरोध कर सकते हैं । ‘इस मांग की पुष्टि करते हुए महात्मा गांधी  ने कहा कि’ हम ऐसी संविधान-सभा चाहते हैं जो भारतीय मस्तिष्क का वास्तविक दर्पण हो ।

भारतवासियों द्वार संविधान सभा की मांग का प्रारंभ में ब्रिटिश सरकार द्वारा विरोध किया गया किन्तु द्वितीय विश्व युद्ध से  उत्पन्न परिस्थितियों और अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं ने उसे इस मांग पर गम्भीरता से विचार करने के लिए मजबूर कर दिया । अगस्त 1940 में ब्रिटिश सरकार ने यह प्रस्ताव पारित किया कि ‘भारत का संविधान स्वभावतः स्वयं भारतवासी ही तैयार करेंगे ।’ 1942 में क्रिप्स योजना के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार ने यह घोषणा की कि भारत में एक निर्वाचित संविधान सभा का गठन किया जाएगा जो युद्ध के बाद भारत के लिए एक संविधान तैयार करेगी लेकिन भारतवासियों ने विविध कारणों से क्रिप्स योजना को ही अस्वीकार कर दिया ।

संविधान सभा का निर्माणः

अगस्त 1946 में भारत में आए कैबिनेट मिशन द्वारा किए गए संविधान सभा के गठन के प्रस्ताव को भारतीय नेताओं ने स्वीकार कर लिया । मिशन का यह विचार था कि तत्कालीन परिस्थितियों में वयस्क मताधिकार के आधार पर संविधान सभा को निर्वाचित करना संभव न होगा । अतः प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा संविधान सभा को निर्वाचित किए जाने का प्रावधान किया गया ।

कैबिनेट मिशन योजना में 389 सदस्यीय संविधान सभा के गठन की व्यवस्था की गई थी । इसमें 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 04 चीफ कमिश्नर प्रांतों के प्रतिनिधि और 93 देशी रियासतों के प्रतिनिधि थे । इस योजना के अनुसार प्रांतों के बीच स्थानों का विभाजन इनकी जनसंख्या के आधार पर किया गया था और दस लाख की जनसंख्या पर एक प्रतिनिधि लेने का नियम अपनाया गया । प्रत्येक प्रांत के लिए निर्धारित स्थानों को, उनमें निवास करने वाली प्रमुख जातियों के बीच उनकी जनसंख्या के आधार पर विभाजित कर दिया गया । यह भी प्रावधान किया गया कि प्रत्येक जाति के प्रतिनिधि उस जाति-विशेष के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किए जाएंगे । मतदाताओं को तीन श्रेणियों-साधारण, मुसलमान तथा सिख (केवल पंजाब) में बांटने का निश्चिय किया गया । देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए एक ‘समझौता समिति’ का प्रावधान किया गया था ।

कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार जुलाई 1946 में संविधान-सभा के चुनाव हुए । सभा की कुल सदस्य संख्या (389) में से प्रांतों के लिए निर्धारित 296 सदस्यों का चुनाव हुआ जिसमें कांग्रेस पार्टी को 208, मुस्लिम लीग को 73 तथा शेष सात राजनैतिक दलों को एक-एक स्थान मिले । निर्दलीय उम्मीदवारों में से आठ विजयी हुए । इस दयनीय स्थिति को देखकर मुस्लिम लीग ने संविधान सभा का बहिष्कार करने का निर्णय लिया ।

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संविधान सभा की समस्याएँ

स्वतंत्रता के समय जो परिस्थितियां थीं उनमें यह संभव नहीं था कि जनसाधारण द्वारा संविधान का प्रत्यक्ष रूप से चुनाव कराया जाए या संविधान को जनमत संग्रह के लिए रखा जाए । इसलिए संविधान सभा का चुनाव प्रांतीय विधान मण्डलों और देशी रियासतों द्वारा कराया गया । कैबिनेट मिशन योजना को भारतीय नेताओं ने काफी वाद-विवाद के बाद से स्वीकार किया था, वह भारत पर जबदस्ती थोपी नहीं गई थी । अत: उसके पीछे भारतवासियों की सहमति थी ।

संविधान सभा के गठन के संबंध में अनेक आपत्तियां और आलोचनाएं की गई जिनमें से कुछ का आगे उल्लेख किया जा रहा है:

1. संविधान सभा की प्रभुसंपन्नताः

संविधान सभा के एक सदस्य ने यह कहा कि ‘संविधान सभा एक प्रभुसंपन्न संस्था नहीं है और उसकी शक्तियां, मूलभूत सिद्धांत और प्रक्रियाओं दोनों ही दृष्टि से मर्यादित है । उनका तर्क यह था कि यह संस्था ब्रिटिश सरकार द्वारा कैबिनेट मिशन के माध्यम से स्वीकृत किया गया था और संविधान सभा कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार ही कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध थी । यह आपत्ति एक सीमा तक ठीक थी लेकिन संविधान सभा ने जिस प्रकार कार्य किया उससे स्पष्ट है कि संविधान की रचना, उसके लिए अपनाई गई प्रक्रिया तथा स्थापित की गई शासन व्यवस्था, संक्षेप में आंतरिक और वाह्य दोनों तरह से संविधान सभा ने एक प्रभुतासंपन्न संस्था के रूप में कार्य किया । संविधान सभा ने सभा के संचालन की शक्ति अपने द्वारा निर्वाचित सभापति को दे दी और यह प्रस्ताव पारित किया कि संविधान सभा का विघटन ब्रिटिश सरकार या किसी अन्य शक्ति के निर्देश पर नहीं किया जाएगा । सभा उसी समय भंग की जा सकेगी जब स्वयं संविधान सभा इस आशय का प्रस्ताव अपने दो-तिहाइ बहुमत से पार करे । संविधान सभा के प्रभुत्व-संपन्न होने का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उसने जो संविधान बनाया उसे किसी भी स्तर पर ब्रिटिश सरकार की सहमति अथवा अनुमोदन के लिए नहीं रखाा गया ।

15 अगस्त 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के पारित होने के बाद भारत ने एक प्रभुत्वसंपन्न राज्य का स्तर प्राप्त कर लिया । यह उल्लेखनीय है कि संविधान निर्मात्री सभा का गठन जुलाई 1946 में हो गया था किन्तु संविधान स्वतंत्रता मिलने के दो वर्ष बाद तैयार हुआ अत: संविधान निर्माण के मामले में ब्रिटिश सरकार के दबाव या हस्तक्षेप का प्रश्न ही नहीं उठता । निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि संविधान सभा के गठन की वैधानिक पहल भले ही कैबिनेट मिशन योजना के रूप में ब्रिटिश सरकार द्वारा की गई हो किन्तु संविधान सभा ने आंतरिक और वाह्य रूप से एक स्वतंत्र और प्रभुता-संपन्न संस्था के रूप में ही कार्य किया ।

2. संविधान सभा का प्रतिनिध्यात्मक स्वरूपः

कांग्रेस के अंतर्गत समाजवादी वर्ग तथा कुछ अन्य दलों द्वारा यह आपत्ति की गई कि संविधान सभा वास्तव में भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती क्योंकि इसका चुनाव जनता के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से न होकर प्रांतीय विधानमण्डलों द्वारा किया गया । समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायाण ने कहा कि’ यह संविधान सभा अपने गठन में उस संविधान सभा में बहुत भिन्न है जिसकी रूपरेखा पंडित नेहरू ने हमारे सामने रखी थी । इसकी रचना ब्रिटिश    सरकार ने की है, अत: हम इसके द्वारा उस स्वतंत्रता को प्राप्त करने की आशा कदापि नहीं कर सते जिसके लिए हम संघर्ष करते रहे हैं । ‘उन्होंने इस बात पर बल दिया कि संविधान का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाना चाहिए था ।

सैद्धांतिक दृष्टि से उपर्युक्त विचार बिल्कुल ठीक लगता है किन्तु स्वतंत्रता की प्राप्ति के पूर्व और स्वतंत्रता मिलने के तुरन्त बाद की जो परिस्थितियां थीं, विशेषकर भारत विभाजन और उसके बाद बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा ने सांप्रदायिकता और देशव्यापी अशांति का जो वातावरण उत्पन्न कर दिया था उसमें संवधिान सभा के गठन के लिए आम चुनाव कराया जाना संभव ही न था । यह भी उल्लेखनीय है कि अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित होने के कारण भले ही संविधान सभा को एक प्रतिनिधि संस्था न कहा जाए लेकिन अपनी सदस्यता की दृष्टि से वह देश के हर क्षेत्र, धर्म वर्ग और व्यवसाय का प्रतिनिधित्व करती थी । उसमें सभी दलों के चोटी के नेता, विधिवेत्ता, बुद्धिजीवी, तथा प्रशासनिक योग्यता रखने वाले लोग शामिल थे । उदाहरण के लिए पंडित नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, राजगोपालचारी, पुरुषोत्तम दास टण्डन, के. एम. मुंशी आचार्य, जे.बी. कृपलानी, डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डॉ. राधाकृष्णन, एन.जी. आयंगर, के. संस्थानम, बी. शिवराव आदि । मुस्लिम लीग के टिकट पर चुने गए वह सदस्य भी जो पाकिस्तान नहीं गए उन्हें भी संविधान सभा में शामिल किया गया । के. संस्थानम के अनुसार,’ जनमत का कोई भी ऐसा वर्ग नहीं था जिसे संविधान सभा में प्रतिनिधित्व प्राप्त न हो । ‘ग्रेनविल आस्टिन का कहना है कि’ अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित और इस दृष्टि से भारतीय जनता के प्रति उत्तरदायी न होने पर भी संविधान सभा अत्यधिक प्रतिनिध्यात्मक संस्था थी ।

3. संविधान के पीछे लोक -स्वीकृति (Popular sanction) का अभाव:

संविधान के विरूद्ध यह भी आपत्ति की गई कि उस पर जनमत संग्रह कराए बगैर ही उसे लागू कर दिय गया अतः संविध न को जन-अनुसमर्थन प्राप्त नहीं था । आलोचकों का यह कहना कि यदि तत्कालीन अशांतिपूर्ण परिस्थितियों में वयस्क मताधिकार के आधार पर संविधान सभा का चुनाव कराया जाना संभव नहीं था तो कम से कम संविधान को जनता के समक्षर रखकर उसका अनुमोदन तो कराया ही जाना चाहिए था । लेकिन इस आलोचना के उत्तर में यह कहा जा सकता है कि जिन कारणों से स्वयं सविध न सभा का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा नहीं कराया जा सका उन्हीं कारणों से संविधान पर जनमत संग्रह कराना भी संभव नहीं था । क्योंकि उसके लिए भी पूरे देश में मतदान कराना पड़ता जो उस समय की विषम परिस्थतियों में व्यावहारिक नहीं था ।

संविधान सभा के समक्ष कौन कौन सी चुनौतियां थी

संविधान सभा के सामने जो प्रमुख मुद्दे या चुनौतियां थी उनमें से कुछ का उल्लेख आगे किया जा रहा है:

(1) विरोधी हितों का समन्वयः

संविधान सभा का पहला कार्य था देश में पायी जाने वाली विविधताओं के बीच एकता स्थापित करना, परस्पर विरोधी हितों के बीच सामंजस्य कायम करना, धर्म, जाति, के आधार पर विभाजित सामाजिक वर्गों को एक मंच लाना और एक ऐसी शासन व्यवस्था को स्थापित करना जो समाज के सभी वर्गों के लिए स्वीकार्य हो ।

स्वतंत्रता के बाद देश के सामने विभिन्न प्रकार के समस्याएं थीं जिनके निराकरण के लिए अलग-अलग विचाराधाराएं थीं जिनके बीच कुछ मुद्दों पर मतैक्य था और कुछ के विषय में मतभेद । विभिन्न राजनैतिक वैचारीकियों का प्रतिनिधित्व संविधान सभा में था । अतएव संविधान सभा की मौलिक समस्या यह थी कि इन परस्पर विरोधी विचारधाराओं के मानने वालों और विभिन्न वर्गों और हितों का प्रतिनिधित्व करने वालों को कैसे संतुष्ट किया जाए । इस समस्या को दृष्टि में रखते हुए संविधान सभा ने संविध न-निर्माण प्रक्रिया में ‘सहमति’ और ‘समायोजन’ के सिद्धांतों को अपनाया । संविधान सभा की विभिन्न समितियों में सभी वर्गों, हितों और विचारधाराओं को प्रतिनिधित्व दिय गया और इस बात का प्रयास किया गय कि मात्र संख्या के आधार पर निर्णय न लिए जाएं वरन् सभी की सहमति से कार्य किया जाए । इस स्थिति पर प्रकाश डालते हुए एम.वी. पायली ने लिखा है कि “संविधान सभा में वाद-विवाद के प्रति असंतोष नहीं दिखाया गया, अपने विचार दूसरों पर लादने एवं शीघ्रता से कार्य समाप्त करने का प्रयास नहीं किया गया । यह एक पूर्ण लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी जिस पर भारत के लोग गर्व कर सकते हैं ।”

संविधान सभा ने लगभग सभी महत्वपूर्ण और विवादास्पद मुद्दों पर जल्दबाजी के बजाए सहनशीलता से विचार किया । उदाहरण के लिए भाषाई विवाद को सर्वसम्मति से हल करने के लिए संविध न सभा का लगभग तीन वर्षों तक विचार-विमर्श करना पड़ा और अंत में सर्वसम्मति से हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया ।

सभा यह भी चाहती थी कि संविधान मात्र बहुमत के बल पर नहीं वरन् सबकी सहमति से बनाया जाए, इस लक्ष्य को दृष्टि में रखते हुए संविधान सभा ने व्यावहारिकता को आधार बनाया और परस्पर विरोधी विचाराधाराओं में समन्वय स्थापित करने का प्रयत्न किया । जैसे संघात्मक और एकात्मक व्यवस्था के बीच, पूंजीवाद और समाजवाद के बीच तथा केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण के दृष्टिकोण के बीच सामंजस्य स्थापित किया गया । उदारहरण के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तथा कुछ अन्य सदस्य यह चाहते थे कि संसद का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से पंचायतों और नगरपालिकाओं द्वारा किया जाए । नेहरू तथा कुछ अन्य सदस्य संसद का निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष रूप से चाहते थे । संविध न सभा ने दोनों ही बातों को मान लिया पर संसद का निर्वाचन प्रत्यक्ष कर दिया गया और पंचायती व्यवस्था को नीति-निदेशक सिद्धांतों का अंग बना दिया गया ।

2. देशी रियासतों की समस्याः

स्वतंत्रता के समय भारत में लगभग 600 देशी रियासतें थी जो स्वतंत्र ढंग से शासन कार्य कर रही थीं । कैबिनेट मिशन योजना में देशी रियासतों को यह स्वतंत्रता दी गई थी कि वह स्वतंत्रत रह सकती है य भरत अथवा पाकिस्तान में मिल सकती हैं इनमें से कुछ रियासतें अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखना चाहती थीं और भारतीय संघ में विलय के पक्ष में नहीं थीं । एक स्वतंत्र और प्रभुत्ता -संपन्न राज्य के भू-क्षेत्र में स्थित पूर्ण स्वायत्तता चाहने वाली इन इकाइयों की स्थिति क्या हो, संविधान सभा के सामने यह बहुत बड़ी चुनौती थीं । संविधान सभा ने संघीय व्यवस्था के विभिन्न पक्षों पर विचार-विमर्श में लगभग दो वर्ष का समय लगाया । वह न तो किसी देशी रियासत के विरूद्ध शक्ति का प्रयोग करने के पक्ष में थी और न ही किसी प्रांत या क्षेत्र (देशी रियासत) को संघ से बिल्कुल स्वतंत्र रहने का अधिकार ही दे सकती थी । इसलिए संघीय शक्ति समिति (Union Power Committee) में विभिन्न प्रांतों और रियासतों की राजनीति में प्रभाव रखने वाले व्यक्तियों को सम्मिलित किया गया । समुचित विचार-विमर्श के उपरांत भारतीय संविधान ने संघ-शासन की एक ऐसी योजना बनाई जिसमें तीन प्रकार की राजनैतिक इकाइयों को मान्यता दी गई और विशेषकर देशी रियासतों के हितों का पूरा ख्याल रखा गया । धीरे-धीरे एक ऐसी राजनैतिक वातावरण तैयार हो गया कि 1956 में राज्य-पुनर्गठन आयोग द्वारा देशी रियासतों का अंत ही कर दिया गया ।

3. सांप्रदायिकता और संविधान का स्वरूपः

भारत-विभाजन के समय पूरे देश में बड़े पैमाने पर हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो रहे थे । किन्तु हिन्दू-बहूमत का एक वर्ग देश में हिन्दू राज्य स्थापित करना चाहता था । इसके विपरीत मुसलमानों की एक बड़ी संख्या पाकिस्तान नहीं जाना चाहती थी और इसी देश में रहने के पक्ष में थी । मुसलमान भारत में सबसे बड़ा अल्प-संख्यक समूह था । संविधान सभा ने सांप्रदायिक उन्माद से भयभीत हुए बगैर धर्मतंत्र के बजाए एक धधर्म-निरपेक्ष संविधान का निर्माण किया और धर्म, जाति अथवा किसी अन्य आधार पर भेदभाव किए बिना सभी नागरिकों को समान राजनैतिक अधिकार देने का प्रावधान किया ।

4. अल्पसंख्यकों की समस्याः

भारत में धर्म, भाषा, संस्कृति आदि के आधार पर अनेक अल्पसंख्यक समूह पाए जाते हैं । धर्म के आधार पर सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह मुसलमान हैं जिसकी जनसंख्या देशी की कुल आबादी का लगभग 12 प्रतिशत है । शेष धार्मिक अल्प-संख्यक जैसे सिख, ईसाई आदि की संख्या 2-3 प्रतिशत से अधिक नहीं है । भाषायी दृष्टि से भी मुसलमान सबसे बड़ा भाषायी अल्पसंख्यक समूह है । धर्म और भाषा के अतिरिक्त सांस्कृतिक दृष्टि से भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के बीच मूलभूत विषमताएं पाई     जाती हैं और विभिन्न सांस्कृतिक समूह अपनी पहचान बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं ।

एक जनतंत्रीय शासन व्यवस्था में जो बहुमत के सिद्धांत से संचालित होती है, अल्पसंख्यकों का विशेष महत्व होता है । भारत में स्वतंत्रता-पश्चात् हो रहे सांप्रदायिक दंगों के परिप्रेक्ष्य में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनके हितों का संरक्षण संविधान सभा के सम्मुख एक ज्वलंत मुद्दा था । मौलाना आजाद चाहते थे कि सामान्य चुनाव क्षेत्र होते हुए भी मुसलमान तथा अन्य अल्पसंख्यकों के लिए सीटें आरक्षित की जाएं । सरदार पटेल इस प्रकार के आरक्षण के खिलाफ थे । संविधान सभा के दो अल्पसंख्यक सदस्य राजकुमारी अमृत कौर (ईसाई अल्पसंख्यक) और बेगम एजाज रसूल (मुस्लिम अल्पसंख्यक) ने आरक्षण का विरोध किया । बेगम एजाज ने कहा कि जो मुसलमान भारत में रह गए हैं वे राष्ट्र का अभिन्न अंग हैं, इसलिए उन्हें विशेष संरक्षण की आवश्यकता नहीं है ।

संविधान सभा ने मुसलमानों तथा अल्प-संख्यकों के लिए आरक्षण की मांग को तो नहीं माना किन्तु उसने अल्प-संख्यकों के विकास के लिए विशेष सुविधाएं देने का प्रावधान किया । संविधान के भाग 3 में मूल अधिकार के रूप में अल्प-संख्यकों को अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने तथा राज्य-निधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षा संस्था में किसी प्रकार का भेदभाव के बिना प्रवेश पाने का अधिकार दिया गया है । अनुच्छेद 30 में धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि की शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार प्रदान किया गया है । यह भी प्रावधान किया गया है कि शिक्षा-संस्थाओं को सहायता देने में राज्य किसी अल्पसंख्यक शिक्षा-संस्था के विरूद्ध कोई भेदभाव नहीं करेगा ।

उपर्युक्त प्रावधान इस बात को स्पष्ट करते हैं कि संविधान सभा अल्पसंख्यकों के हितों और अधिकारों के प्रति अत्यधिक सचेत और संवेदनशील थी और प्रतिकूल समाजिक वातावरण में भी । संविधान सभा ने अल्पसंख्यकों की समस्या का समाधान करने का प्रयास किया ।

5. वैचारिक भिन्नताः

यद्यपि संविधान सभा में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत प्राप्त था (कुल 296 में से 208 सदस्य) किन्तु इसमें मुस्लिम लीग तथा अनेक अन्य राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि भी निर्वाचित होकर आए थे जिनकी राजनैतिक विचारधारा कांग्रेस से बिल्कुल भिन्न थी । संविधान सभा में विभिन्न धर्मों, जातियों, क्षेत्रों और विभिन्न भाषाओं के बोलने वालों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था । इनकी विचारधाराओं तथा हितों में टकराव था ।

मोटेतौर पर संविधान सभा में उदारवादी, पूंजीवादी, समाजवादी, साम्यवादी, गांधीवादी, परंपरावादी और प्रगतिशील विचारधाराओं के समर्थक सदस्य थे जो संविधान को अपनी-अपनी    वैचारिकी के अनुसार बनाना चाहते थे । इन परस्पर विरोधी विचारध राओं के बीच सामंजस्य स्थापित करना संविधान सभा का सबसे बड़ा कारनामा था । यही कारण है कि भारतीय संविधान किसी एक राजनैतिक विचारधारा से जुड़ा हुआ नहीं है उसमें उपर्युक्त लगभग सभी विचारधाराओं के तत्व विद्यमान हैं । इन परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच सामंजस्य स्थापित करना संविधान बनाने वाले की विधिक क्षमता, दूरदर्शिता और इनकी सहनशीलता का परिचायक है ।

6. केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरणः

संविधान निर्मात्री सभा में गांधीवादी दर्शन के समर्थक गांधी जी के ग्राम स्वराज्य के सपने को साकार करने के लिए राजनैतिक सत्ता का अधिक से अधिक विकेन्द्रीकरण चाहते थे । उनका कहना था कि देश में पंचायती राजव्यवस्था को स्थापित करके शासन व्यवस्था में ग्रामीण जनता की भागीदारी को बढ़ाया जाना चाहिए । उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पंचायतों का चुनाव मताधिकार के अनुसार होना चाहिए और संसद का चुनाव पंचायतों के सदस्यों के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से किया जाना चाहिए । इस प्रकार ग्रामों को राजनैतिक सत्ता का वास्तविक केन्द्र बनाया जाना चाहिए ।

ग्राम स्तर पर सत्ता के विकेन्द्रीकरण के प्रबल समर्थकों के विरूद्ध पंडित जवाहर लाल नेहरू तथा डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ग्रामों को राजनैतिक सत्ता का केन्द्र बनाने के विरूद्ध थे । संविधान सभा ने इस समस्या के समाधान हेतु दोनों ही दृष्टिकोणों को संविध न में अपना लिया, उन्होंने शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना तो की ही लेकिन गांधीवादियों की मांग को भी नकारा नहीं । संविधान सभा ने पंचायाती राज व्यवस्था को नीति-निदेशक सिद्धांतों में शामिल करते हुए राज्यों से यह अपेक्षा की कि वे आवश्यकता और परिस्थितियों के अनुसार ग्राम पंचायतों की स्थापना करेंगे और स्थानीय स्वशासन की दृष्टि से उन्हें आवश्यक शक्तियां प्रदान करेंगे । उल्लेखनीय है कि 1993 में किए गए 73 वें संविधान संशोधन द्वारा पंचयाती राज व्यवस्था को शासन की तृतीय इकाई के रूप में सांविधानिक मान्यता दे दी गई है ।

7. संसदीय बनाम अध्यक्षीय शासन प्रणाली:

देश में कार्यपालिका का क्या स्वरूप होगा, यह एक मौलिक एवं महत्वपूर्ण प्रश्न था । संविधान सभा के समक्ष कार्यकारिणी के तीन मॉडल थे-इंग्लैण्ड की संसदीय प्रणाली, अमेरिका की अध्यक्षात्मक व्यवस्था और स्टिजरलैण्ड की बहुल कार्यपालिका । समुचित विचार विमर्श के बाद संविधान सभा ने भारत के लिए संसदीय शासन व्यवस्था का चयन किया क्योंकि अन्य कारणों के अतिरिक्त, भारतवासी इस प्रणाली से भलीभांति परिचित थे । कार्यपालिका के स्वरूप से ही जुड़ा हुआ दूसरा प्रश्न राष्ट्रपति की चुनाव प्रणाली का था । संविधान सभा के सदस्यों के कए वर्ग की यह प्रबल इच्छा थी कि भारतीय गणतंत्र, के प्रधान का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाए । विचारों के आदान-प्रदान     औरा समुचित तर्क-वितर्क के बाद संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति का चुनाव एक निर्वाचन मण्डल के द्वारा किए जाने का निर्णय लिया । राष्ट्रपति की शक्तियों के विषय में भी संविधान सभा में बड़ा वाद-विवाद रहा । कुछ सदस्यों ने यह विचार व्यक्त किया कि राष्ट्रपति को दी गई व्यापक शक्तियां, विशेषकर उसकी आपातकालीन शक्तियां राष्ट्रपति को आसानी से तानाशाह बना देंगी और यह शक्तियां जर्मनी के वेमार संविधान के समतुल्य हैं ।

8. कुछ अन्य विवादास्पद प्रश्नः

केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों के वितरण का प्रश्न गम्भीर विवाद का विषय रहा । संविधान सभा का एक वर्ग यह चाहता था कि राज्यों को अधिक शक्तियां प्रदान की जाए लेकिन निर्णय केन्द्र के पक्ष में ही हुआ और आम सहमति यही बनी कि तत्कालीन राजनैतिक अस्थिरता की परिस्थितियों में देश की एकता और अखण्डता को बनाए रखने के लिए केन्द्र को ज्यादा शक्तिशाली बनाया जाना चाहिए ।

नीति-निदेश सिद्धांतों को संविधान में समाहित करने के निर्णय का संविधान सभा में कुछ सदस्यों ने काफी मजाक उड़ाया । उनका तर्क यह था कि न्याय-योग्य न होने के कारण नीति-निदेशक सिद्धांतों की स्थिति नैतिक उपदेशों से ज्यादा नहीं है जिनका अनुपालन करना राज्य की इच्छा पर निर्भर करेगा । संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने यह मांग की कि नीति निदेशक सिद्धांतों को क्रियान्वित करना राज्यों के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए लेकिन अनेक कारणों से नीति-निदेशक सिद्धांतों को बाध्यकारी बनाना संभव नहीं पाया गया ।

उपर्युक्त महत्वपूर्ण बिन्दुओं के अतिरिक्त संविधान सभा में कुछ और मुद्दों पर भी जैसे भारतीय संघ में जम्मू और कश्मीर की स्थिति, उपराष्ट्रपति के चुनाव तथा वयस्क मताधिकार आदि के विषय में काफी वाद-विवाद हुआ । संविधान सभा ने परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच, हर वर्ग और हर सदस्य को अपने विचार व्यक्त करने का पूरा अवसर देते हुए पूरे संयम और सहनशीलता के साथ, ‘सहमति और समन्वय’ के आदर्श को अपनाकर स्वतंत्र भारत के संविधान की रचना की जो मौलिक न होते हुए भी अपनी अलग पहचान रखता है ।

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