संविधान की प्रमुख विशेषताएं (Salient Features of the Constitution)

संविधान की प्रमुख विशेषताएं (Salient Features of the Constitution): भारतीय संविधान तत्वों और मूल भावना के संबंध में अद्वितीय है। हालांकि इसके कई तत्व विश्व के विभिन्न संविधानों से उधार लिये गये हैं। भारतीय संविधान के कई ऐसे तत्व हैं, जो उसे अन्य देशों के संविधानों से अलग पहचान प्रदान करते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि सन 1949 में अपनाए गए संविधान के अनेक वास्तविक लक्षणों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। विशेष रूप से 7 वें, 42 वें, 44 वें, 73 वें, 74 वें एवं 97 वें संशोधन में।संविधान में कई बड़े परिवर्तन करने वाले 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 को ‘मिनी कॉन्स्टिट्यूशन’ कहा जाता है। केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को मिली संवैधानिक शक्ति संविधान के मूल ढांचे ‘को बदलने की अनुमति नहीं देती।

संविधान की प्रमुख विशेषताएं
संविधान की प्रमुख विशेषताएं

संविधान की प्रमुख विशेषताएं का नीचे वर्णन किया गया है

1. सबसे लंबा लिखित संविधान

संविधान को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-लिखित, जैसे अमेरिकी संविधान, और; अलिखित, जैसे-ब्रिटेन का संविधान।  भारत का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। यह  बहुत बृहद समग्र और विस्तृत दस्तावेज है। मूल रूप से (1949) संविधान में एक प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद (22 भागों में विभक्त) और 8 अनुसूचियां थीं। वर्तमान में (2016) इसमें एक प्रस्तावना, 465 अनुच्छेद (25 भागों में विभक्त) और 12 अनुसूचियां हैं। सन 1951 से हुए विभिन्न संशोधनों ने करीब 20 अनुच्छेद व एक भाग (भाग- VII) को हटा दिया और इसमें करीब 90 अनुच्छेद, चार भागों (4 क, 9 क, 9 ख और 14 क) और चार अनुसूचियों (9, 10, 11, 12) को जोड़ा गया। विश्व के किसी अन्य संविधान में इतने अनुच्छेद और अनुसूचियां नहीं हैं। भारत के संविधान को विस्तृत बनाने के पीछे निम्न चार कारण हैं: (अ) भौगोलिक कारण, भारत का विस्तार और विविधता। (ब) ऐतिहासिक, इसके उदाहरण के रूप में भारत शासन अधिनियम, 1935 के प्रभाव को देखा जा सकता है। वह अधिनियम बहुत विस्तृत था। (स) जम्मू-कश्मीर को छोड़कर केंद्र और राज्यों के लिए एकल संविधान। (द) संविधान सभा में कानून विशेषज्ञों का प्रभुत्व। संविधान में न सिर्फ शासन के मौलिक सिद्धांत बल्कि विस्तृत  रूप में प्रशासनिक प्रावधान भी विद्यमान हैं। इसके अलावा अन्य आधुनिक लोकतंत्रों में जिन विषयों को छोड़ दिया हैं , उन्हें भी भारत के संविधान में शामिल किया गया है।

2. विभिन्न स्रोतों से विहित

भारत के संविधान ने अपने अधिकतर उपबंध विश्व के कई देशों के संविधानों भारत-शासन अधिनियम, 1935 के उपबंधों से हैं। डॉ. अंबेडकर ने गर्व के साथ घोषणा की थी कि, “भारत के संविधान का निर्माण विश्व के विभित्र संविधानों को छानने के बाद किया गया है।” संविधान का अधिकांश ढांचागत हिस्सा भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया गया है। संविधान का दार्शनिक भाग (मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत) क्रमशः अमेरिका और आयरलैंड से प्रेरित है। भारतीय संविधान के राजनीतिक भाग (संघीय सरकार का सिद्धांत और कार्यपालिका और विधायिका के संबंध) का अधिकांश हिस्सा ब्रिटेन के संविधान से लिया गया है। संविधान के अन्य प्रावधान कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, यूएसएसआर (अब रूस), फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, जापान इत्यादि देशों के संविधानों से लिए गए हैं। भारत के संविधान पर सबसे बड़ा प्रभाव और भौतिक सामग्री का स्रोत भारत सरकार अधिनियम, 1935 रहा है। संघीय व्यवस्था, न्यायपालिका, राज्यपाल, आपातकालीन अधिकार, लोक सेवा आयोग और अधिकतर प्रशासनिक विवरण इसी से लिए गए हैं। संविधान के आने से अधिक प्रावधान या तो 1935 के इस अधिनियम के समान है या फिर इससे मिलते-जुलते हैं।

संविधान की प्रमुख विशेषताएं

स्रोत विशेषताए
1. भारत शासन अधिनियम, 1935 संघीय तंत्र, राज्यपाल का कार्यालय, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन उपबंध व प्रशासनिक विवरण।
2. ब्रिटेन का संविधान संसदीय शासन, विधिका शासन, विधायी प्रक्रिया, एकल नागरिकता, मंत्रिमण्डल प्रणाली, परमाधिकार लेख, संसदीय विशेषाधिकार और द्विसदनवाद।
3. संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान मूल अधिकार, न्यायापालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक पुनरावलोकन का सिद्धांत, उप-राष्ट्रपति का पद, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का पद से हटाया जाना और राष्ट्रपति पर महाभियोग।
4. आयरलैंड का संविधान राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत, राष्ट्रपति को निर्वाचन पद्धति और राज्य सभा के लिए सदस्यों का नामांकन।
5. कनाडाका संविधान सशक्त केन्द्र के साथ संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियों का केन्द्र में निहित होना, केन्द्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्शी न्याय निर्णयन।
6. ऑस्ट्रेलिया का संविधान समवर्ती सूनी, व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।
7. जर्मनी का वाइमर संविधान आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थगन।
8. सोवियत संघ (पूर्व) का संविधान मूल कर्तव्य और प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक) का आदर्श।
9. फ्रांस का संविधान गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श।
10. दक्षिणी अफ्रीकाका संविधान संविधान में संशोधन की प्रक्रिया और राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन।
11. जापान का संविधान विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।

3. नम्यता एवं अनम्यता का समन्वय

संविधानों को नम्यता और अनम्यता की दृष्टि से भी वर्गीकृत किया जाता है। कठोर वा अनम्य संविधान उसे माना जाता है, जिसमें संशोधन करने के लिए विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता हो। उदाहरण के लिए अमेरिकी संविधान।लचीला या नम्य संविधान वह कहलाता है, जिसमें संशोधन की प्रक्रिया वही हो, जैसी किसी आम कानूनों के निर्माण की, जैसे-ब्रिटेन का संविधान। भारत का संविधान न तो लचीला है और न ही कठोर, बल्कि यह दोनों का मिला-जुला रूप है। अनुच्छेद 368 में दो तरह के संशोधनों का प्रावधान है:

(अ). कुछ उपबंधों को संसद में विशेष बहुमत से संशोधित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत और प्रत्येक सदन में कुल सदस्यों का बहुमत (जो कि 50 प्रतिशत से अधिक है)।

(ब). कुछ अन्य प्रावधानों को संसद के विशेष बहुमत और कुल राज्यों के आधे से अधिक राज्यों के अनुमोदन से ही संशोधित किया जा सकता है। इसके अलावा संविधान के कुछ प्रावधान आम विधायी प्रक्रिया की तरह संसद में सामान्य बहुमत के माध्यम से संशोधित किए जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि ये संशोधन अनुच्छेद 368 के अंतर्गत नहीं आते।

4. एकात्मकता की ओर झुकाव के साथ संघीय व्यवस्था

भारत का संविधान संघीय सरकार की स्थापना करता है। इसमें संघ के सभी आम लक्षण विद्यमान हैं; जैसे-दो सरकार, शक्तियों का विभाजन, लिखित संविधान, संविधान की सर्वोच्चता, संविधान की कठोरता, स्वतंत्रा न्यायपालिका एवं द्विसदनीयता आदि। यद्यपि भारतीय संविधान में बड़ी संख्या में एकात्मकता और गैर-संघीय लक्षण भी विद्यमान हैं, जैसे-एक सशक्त केंद्र, एक संविधान, एकल नागरिकता, संविधान का लचीलापन, एकीकृत न्यायपालिका, केन्द्र द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति, अखिल भारतीय सेवाएं, आपातकालीन प्रावधान इत्यादि। फिर भी, संविधान में कहीं भी ‘संघीय’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। दूसरी ओर अनुच्छेद 1 में भारत का उल्लेख ‘राज्यों के संघ’ के रूप में किया गया है। इसके दो अभिप्राय हैं पहला, भारतीय संघ राज्यों के बीच हुए किसी समझौते का निष्कर्ष नहीं है, और दूसरा; किसी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। इसी वजह से भारतीय संविधान को निम्नांकित नाम दिए गए हैं, जैसे कि-एकात्मकता की भावना में संघ, अर्थ संघ, बारगेनिंग फेडरेलिज्म, को-ऑपरेटिव फेडरेलिज्म, फेडरेशन विद ए सेंट्रलाइजिंग टेंडेंसी’।

5. सरकार का संसदीय रूप

भारतीय संविधान ने अमेरिका की अध्यक्षीय प्रणाली की बजाए ब्रिटेन के संसदीय तंत्र को अपनाया है। संसदीय व्यवस्था विधायिका और कार्यपालिका के मध्य समन्वय व सहयोग के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि अध्यक्षीय प्रणाली दोनों के बीच शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है। संसदीय प्रणाली को सरकार के ‘वेस्टमिंस्टर रूप, उत्तरदायी सरकार और मंत्रिमंडलीय सरकार के नाम से भी जाना जाता है। संविधान केवल केंद्र में ही नहीं, बल्कि राज्य में भी संसदीय प्रणाली की स्थापना करता है। भारत में संसदीय प्रणाली की विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  1. वास्तविक व नाममात्र के कार्यपालकों की उपस्थिति,
  2. बहुमत वाले दल की सत्ता,
  3. विधायिका के समक्ष कार्यपालिका की संयुक्त जवाबदेही,
  4. विधायिका में मंत्रियों की सदस्यता,
  5. प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नेतृत्व,
  6. निचले सदन का विघटन (लोकसभा अथवा विधानसभा)

हालांकि भारतीय संसदीय प्रणाली बड़े पैमाने पर ब्रिटिश संसदीय प्रणाली पर आधारित है फिर भी दोनों में कुछ मूलभूत अंतर हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटिश संसद की तरह भारतीय संसद संप्रभु नहीं है। इसके अलावा भारत का प्रधान निर्वाचित व्यक्ति होता है (गणतंत्र), जबकि ब्रिटेन में उत्तराधिकारी व्यवस्था है। किसी भी संसदीय व्यवस्था में, चाहे वह भारत की हो अथवा ब्रिटेन की, प्रधानमंत्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। जैसा कि राजनीति के जानकार इसे’ प्रधानमंत्रीय सरकार ‘का नाम देते हैं।

6. संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता में में समन्वय

संसद की संप्रभुता का नियम ब्रिटिश संसद से जुड़ा हुआ है, जबकि न्यायपालिका की सर्वोच्चता का सिद्धांत, अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से लिया गया है। जिस प्रकार भारतीय संसदीय प्रणाली, ब्रिटिश प्रणाली से भिन है, ठीक उसी प्रकार भारत में सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा शक्ति अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय से कम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिकी संविधान में’ विधि की नियत प्रक्रिया ‘का प्रावधान है, जबकि भारतीय संविधान में विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ (अनुच्छेद 21) का प्रावधान है। इसलिए भारतीय संविधान निर्माताओं ने ब्रिटेन की संसदीय संप्रभुता और अमेरिका की न्यायपालिका सर्वोच्चता के बीच उचित संतुलन बनाने को प्राथमिकता दी। एक ओर जहां सर्वोच्च न्यायालय अपनी न्यायिक समीक्षा की शक्तियों के तहत संसदीय    कानूनों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है, वहीं दूसरी ओर संसद अपनी संवैधानिक शक्तियों के बल पर संविधान के बड़े भाग को संशोधित कर सकती है।

7. एकीकृत व स्वतंत्र न्यायपालिका

भारतीय संविधान एक ऐसी न्यायपालिका की स्थापना करता है, जो अपने आप में एकीकृत होने के साथ-साथ स्वतंत्र है। भारत की न्याय व्यवस्था में सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है। इसके नीचे राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय हैं। राज्यों में उच्च न्यायालय के नीचे क्रमवार अधीनस्थ न्यायालय हैं, जैसे-जिला अदालत व अन्य निचली अदालतें। न्यायालयों का एकल तंत्र, केंद्रीय कानूनों के साथ-साथ राज्य कानूनों को लागू करता है। हालांकि अमेरिका में संघीय कानूनों को संघीय न्यायपालिका और राज्य कानूनों को राज्य न्यायपालिका लागू करती है। सर्वोच्च न्यायालय, संघीय अदालत है। यह शीर्ष न्यायालय है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है और संविधान का संरक्षक है। इसलिए संविधान में इसकी स्वतंत्रता के लिए कई प्रावधान किए गए हैं; जैसे-न्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा, न्यायाधीशों के लिए निर्धारित सेवा शर्ते, भारत की संचित निधि से सर्वोच्च न्यायालय के सभी खचों का वहन, विधायिका में न्यायाधीशों के कामकाज पर चर्चा पर रोक, सेवानिवृत्ति के बाद अदालत में कामकाज पर रोक, अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति, कार्यपालिका से न्यायपालिका को अलग रखना इत्यादि।

8. मौलिक अधिकार

संविधान के तीसरे भाग में छह मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। ये अधिकार हैं:

  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)
  5. सांस्कृतिक व शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

मौलिक अधिकार का उद्देश्य वस्तुतः राजनीतिक लोकतंत्र की भावना को प्रोत्साहन देना है। यह कार्यपालिका और विधायिका के मनमाने कानूनों पर निरोधक की तरह काम करते हैं। उल्लंघन की स्थिति में इन्हें न्यायालय के माध्यम से लागू किया जा सकता है। जिस व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन हुआ है, वह सीधे सर्वोच न्यायालय की शरण में जा सकता है, जो अधिकारों की  रक्षा के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा व उत्प्रेषण जैसे अभिलेख या रिट जारी कर सकता है। हालांकि मौलिक अधिकार कुछ सीमाओं के दायरे में आते हैं लेकिन वे अपरिवर्तनीय भी नहीं हैं। संसद इन्हें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से समाप्त कर सकती है अथवा इनमें कटौती भी कर सकती है। अनुच्छेद 20-21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छोड़कर राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान इन्हें स्थगित किया जा सकता है।

9. राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत

डॉ. बी.आर. अंबेडकर के अनुसार, राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता है। इनका उल्लेख संविधान के चौथे भाग में किया गया है। इन्हें मोटे तौर पर तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-सामाजिक, गांधीवादी तथा उदार- बौद्धिका नीति-निदेशक तत्वों का कार्य सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना है। इनका उद्देश्य भारत में एक ‘कल्याणकारी राज्य’ की स्थापना करना है। हालांकि मौलिक अधिकारों की तरह इन्हें कानून रूप में लागू नहीं किया जा सकता। संविधान में कहा गया है कि देश की शासन व्यवस्था में ये सिद्धांत मौलिक हैं और यह देश की जिम्मेदारी है कि वह कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को अपनाए। इसलिए इन्हें लागू करना राज्यों का नैतिक कर्तव्य है किंतु इनकी पृष्ठभूमि में वास्तविक शक्ति राजनैतिक है, अर्थात् जनमत। मिनर्वा मिल्स मामले (1980) “में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि,” भारतीय संविधान की नींव मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक सिद्धांतों के संतुलन पर रखी गई है। ”

10. मौलिक कर्तव्य

मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख नहीं किया गया है। इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश के आधार पर 1976 के 42 वें संविधान संशोधन के माध्यम से आंतरिक आपातकाल (1975-77) के दौरान शामिल किया गया था। 2002 के 86 वें संविधान संशोधन ने एक और मौलिक कर्तव्य को जोड़ा। संविधान के 4 ए भाग में 1 मौलिक कर्तव्यों का जिक्र किया गया है (जिसमें केवल एक अनुच्छेद 51-क है)। इसके तहत प्रत्येक भारतीय का यह कर्तव्य होगा कि वह-संविधान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे, राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें; हमारी मिश्रित संस्कृति की समृद्ध धरोहर का अनुरक्षण करें; सभी लोगों में आपसी भाईचारे की भावना का विकास करें, इत्यादि। मौलिक कर्तव्य नागरिकों को वह बाद दिलाते हैं कि अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते समय उन्हें याद रखना चाहिए कि उन्हें अपने समाज, देश व अन्य नागरिकों के प्रति कुछ जिम्मेदारियों का निर्वाह भी करना है। नीति-निदेशक तत्वों की तरह कर्तव्यों को भी कानून रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

11. एक धर्मनिरपेक्ष राज्य

भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। इसलिए यह किसी धर्म विशेष को भारत के धर्म के तौर पर मान्यता नहीं देता। संविधान के निम्नलिखित प्रावधान भारत के धर्मनिरपेक्ष लक्षणों को दर्शाते हैं:

  1. वर्ष 1976 के 42 वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष ‘शब्द को जोड़ा गया।
  2. प्रस्तावना हर भारतीय नागरिक की आस्था, पूजा-अर्चना व विश्वास की स्वतन्त्रता की रक्षा करती है।
  3. किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समान समझा जाएगा और उसे कानून को समान सुरक्षा प्रदान की जाएगी (अनुच्छेद -14)।
  4. धर्म के नाम पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद -15)।
  5. सार्वजनिक सेवाओं में सभी नागरिकों को समान अवसर दिए जाएंगे (अनुच्छेद -16)।
  6. हर व्यक्ति को किसी भी धर्म को अपनाने व उसके अनुसार पूजा-अर्चना करने का समान अधिकार है (अनुच्छेद 25)।
  7. हर धार्मिक समूह अथवा इसके किसी हिस्से को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार है (अनुच्छेद 26)।
  8. किसी भी व्यक्ति को किसी भी धर्म विशेष के प्रचार के लिए किसी प्रकार का कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद 27)
  9. किसी भी सरकारी शैक्षिक संस्थान में किसी प्रकार के धार्मिक निर्देश नहीं दिए जाएंगे (28)। 10. नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी भाषा, लिपि अथवा संस्कृति को संरक्षित रखने का अधिकार है (अनुच्छेद 29)।
  10. अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थानों की स्थापना करने और उन्हें संचालित करने का अधिकार है (अनुच्छेद 30)।
  11. राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने के लिए प्रयास करेगा (अनुच्छेद -44)।

धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी अवधारणा धर्म (चर्च) और राज्य (राजनीति) के बीच पूर्ण अलगाव रखती है। धर्मनिरपेक्षता की यह नकारात्मक अवधारणा भारतीय परिवेश में में लागू नहीं हो सकती क्योंकि यहां का समाज बहु धर्मवादी है। इसलिए भारतीय संविधान में सभी धर्मों को समान आदर अथवा सभी धर्मों की समान रूप से रक्षा करते हुए धर्मनिरपेक्षता के सकारात्मक पहलू को शामिल किया गया है। इसके अलावा संविधान ने विधायिका में धर्म के आधार पर कुसौं का आरक्षण देने वाले पुराने धर्म आधारित प्रतिनिधित्व को भी समाप्त कर दिया है। हालांकि संविधान अनुसूचित जाति और जनजाति को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए अस्थायी आरक्षण प्रदान करता है।

12.सार्वभौम वयस्क मताधिकार

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान-सभा में कहा था कि संसदीय प्रणाली से हमारा अभिप्राय एक व्यक्ति एक वोट से है, जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार करके संविधान के रचनाकारों ने साफ वयस्क मताधिकार (Universal Aduit Franchise) की पद्धति अपनाई थी, ताकि प्रत्येक भारतीय को बिना किसी भेदभाव के मतदान के समान अधिकार प्राप्त हों।

इसीलिए भारतीय संविधान में बिना किसी भेदभाव के 18 वर्ष की अवस्थी वाले प्रत्येक नागरिक- चाहे वह स्त्री हो या पुरुष को मताधिकार दिया गया है। सन् 1935 के सुधार कानून के अंतर्गत केवल 14 प्रतिशत भारतीयों को मताधिकार प्राप्त थी, जबकि वर्तमान संविधान के अंतर्गत देश का प्रत्येक 18 वर्षीय स्त्री अथवा पुरुष नागरिक वयस्क मताधिकार पा लेता है। वह बिना किसी भेदभाव के स्थानीय निकायों, विधानमंडल, लोकसभा आदि के निर्वाचनों के लिए मतदान कर सकता है।

भारतीय संविधान द्वारा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव के आधारस्वरूप सार्वभौम वयस्क मताधिकार को अपनाया गया है। हर वह व्यक्ति जिसकी उम्र कम से कम 18 वर्ष है, उसे धर्म, जाति, लिंग, साक्षरता अथवा संपदा इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना मतदान करने का अधिकार है। वर्ष 1989 में 61 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 के द्वारा मतदान करने की उम्र को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया था। देश के वृहद आकार, जनसंख्या, उच्च गरीबी, सामाजिक असमानता, अशिक्षा आदि को देखते हुए संविधान निर्माताओं द्वारा सार्वभौम वयस्क मताधिकार को संविधान में शामिल करना एक साहसिकवसराहनीय प्रयोग था। ” वयस्क मताधिकार लोकतंत्र को बड़ा आधार देने के साथ साथ आम जनता के स्वाभिमान में वृद्धि करता है, समानता के सिद्धांत को लागू करता है, अल्पसंख्यकों को अपने हितों की रक्षा करने का अवसर देता है तथा कमजोर वर्गों के लिए नई आशाएं और प्रत्याशा जगाता है।

13. एकल नागरिकता

यद्यपि भारतीय संविधान फेडरल है और दो लक्षणों (एकल व संघीय) का प्रतिनिधित्व करता है मगर इसमें केवल एकल नागरिकता का प्रावधान है अर्थात भारतीय नागरिकता।    दूसरी ओर, अमेरिका जैसे देशों में प्रत्येक व्यक्ति के पास न केवल देश की नागरिकता होती है बल्कि वह जिस राज्य में रहता है उसकी भी नागरिकता होती है। इसलिए वह अधिकारों के दो समूहों का लाभ उठाता है- पहला, राष्ट्रीय सरकार द्वारा प्रदत्त, तथा; दूसरा, राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त। भारत में, सभी नागरिकों को चाहे वो किसी भी राज्य में पैदा हुए हो या रहते हों, संपूर्ण देश में नागरिकता के समान राजनीतिक और नागरिक अधिकार प्राप्त होते हैं और उनमें कोई भेदभाव नहीं किया जाता, सिवाए कुछ मामलों के, जैसे-जनजातीय क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर इत्यादि।सभी नागरिकों के लिए एकल नागरिकता और समान अधिकारों के संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद भारत में सांप्रदायिक दंगे, वर्ग संघर्ष, जातिगत युद्ध, भाषायी विवाद और नृजातीय विवाद होते रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि, संविधान के निर्माताओं ने एकीकृत और संगठित भारत राष्ट्र के निर्माण का जो सपना देखा था, वह पूरी तरह पूरा नहीं हो पाया है।

14. स्वतंत्र निकाय

भारतीय संविधान केवल विधाविका, कार्यपालिका व सरकार (केन्द्र और राज्य) न्यायिक अंग ही उपलब्ध कराता है। बल्कि वह कुछ स्वतंत्र निकायों की स्थापना भी करता है। इन्हें संविधान ने भारत सरकार के लोकतांत्रिक तंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में परिकल्पित किया है। ऐसे कुछ स्वतंत्र निकाय निम्नलिखित हैं: अ. संसद, राज्य विधानसभाओं भारत के राष्ट्रपति और भारत के उप-राष्ट्रपति के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने हेतु निर्वाचन आयोग। ब. राज्य और केंद्र सरकार के खातों के अंकेक्षण के लिए भारत का नियंत्रक एवं महालेखाकार। ये जनता के पैसे के संरक्षक होते हैं और सरकार द्वारा किए गए खचों की वैधानिकता और उनके उचित होने पर टिप्पणी करते हैं। स. संघ लोक सेवा आयोग। यह अखिल भारतीय सेवाओं व उच्च स्तरीय केंद्रीय सेवाओं के लिए भर्ती हेतु परीक्षाओं का आयोजन करता है तथा अनुशासनात्मक मामलों पर राष्ट्रपति को सलाह देता है। द. राज्य लोक सेवा आयोग, जिसका काम हर राज्य में राज्य सेवाओं के लिए भर्ती हेतु परीक्षाओं का आयोजन करना व अनुशासनात्मक मामलों पर राज्यपाल को सलाह देना है। विभिन्न प्रावधानों, यथा-कार्यकाल की सुरक्षा, निर्धारित सेवा शर्ते, भारत की संचित निधि पर भारित विभिन्न व्यय आदि  के माध्यम से संविधान इन निकायों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है।

15.आपातकालीन प्रावधान

आपातकाल की स्थिति से प्रभावशाली ढंग से निपटने के लिए भारतीय संविधान में राष्ट्रपति के लिए बृहद आपातकालीन प्रावधानों की व्यवस्था है। इन प्रावधानों को संविधान में शामिल करने का उद्देश्य है-देश की संप्रभुता, एकता, अखण्डता और सुरक्षा, संविधान एवं देश के लोकतांत्रिक ढांचे को सुरक्षा प्रदान करना। संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल की विवेचना की गई है।

  1. राष्ट्रीय आपातकालः युद्ध, आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह पैदा हुई राष्ट्रीय अशांति की अवस्था (अनुच्छेद -352)।
  2. राज्य में आपातकाल (राष्ट्रपति शासन) राज्यों में संवैधानिक तंत्र की असफलता (अनुच्छेद 356) वा केन्द्र के निदेशों का अनुपालन करने में असफलता (अनुच्छेद 365)।
  3. वित्तीय आपातकाल: भारत की वित्तीय स्थिरता या प्रत्यय संकट में हो (अनुच्छेद 360)।

आपातकाल के दौरान देश की पूरी सत्ता केंद्र सरकार के हाथों में आ जाती है और राज्य केंद्र के नियंत्रण में चले जाते हैं। इससे संविधान में संशोधन किए बगैर देश का ढांचा संघीय से एकात्मक हो जाता है। राजनीतिक तंत्र का संघीय (सामान्य परिस्थितियों के दौरान) से एकात्मक (आपातकाल के दौरान) में परिवर्तित होना भारतीय संविधान की एक अद्वितीय विशेषता है।

16. त्रिस्तरीय सरकार

मूल रूप से अन्य संघीय संविधानों की तरह भारतीय संविधान में दो स्तरीय राजव्यवस्था (केंद्र व राज्य) और संगठन के संबंध में प्रावधान तथा केंद्र एवं राज्यों की शक्तियां अंतर्विष्ट थीं। बाद में वर्ष 1992 में 73 वें एवं 74 वें संविधान संशोधन ने तीन स्तरीय (स्थानीय) सरकार का प्रावधान किया गया, जो विश्व के किसी और संविधान में नहीं है। संविधान में एक नए भाग (9 वें) एवं नई अनुसूची (11 वीं) जोड़कर वर्ष 1992 के 73 वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायतों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। इसमें एक नया भाग “जोड़ा गया। इसी प्रकार से 74 वें संविधान संशोधन विधेयक, 1992 ने एक नए भाग 9 ए” तथा नई अनुसूची 12 वीं को जोड़कर नगरपालिकाओं (शहरी स्थानीय सरकारें) को संवैधानिक मान्यता प्रदान की।

17. सहकारी समितियां

97 वां संविधान संशोधन अधिनियम 2011 ने सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा और संरक्षण प्रदान किया। इस संदर्भ में निम्न तीन परिवर्तन संविधान में इसने किए

  1. इसने सहकारी समिति गठित करने के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया (अनुच्छेद 19)।
  2. इसने एक नया राज्य का नीति निदेशक तत्व जोड़ा सहकारी समितियों के प्रोत्साहन देने के लिए (अनुच्छेद 43-B)
  3. इसने संविधान में एक नया भाग 1X-B जोड़ा- “सहकारी समितियां” (The Co-operative Societies) शीर्षक से (अनुच्छेद 243 (a) से लेकर अनुच्छेद 243(o) नया भाग IXB के अंतर्गत अनेक ऐसे प्रावधानों के द्वारा सुनिश्चित किया गया है कि देश भर में सहकारी समितियां लोकतांत्रिक, व्यावसायिक, स्वायत्त ढंग से तथा आर्थिक मजबूती के साथ कार्य करें। यह संसद को अंतर-राज्य सहकारी समितियों तथा राज्य विधायिकाओं को अन्य सहकारी समितियों के लिए उपयुक्त कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है।

18. जनसत्तात्मकता

भारतीय संविधान लोकतंत्र के सिद्धांत पर जनता का, जनता द्वारा तथा जनता के हित के लिए रचा गया है। संविधान में स्पष्टत: यह उल्लिखित है कि भारतीय संघ एवं उसकी समस्त इकाइयों में अंतिम सत्ता जनता के हाथों में रहेगी।

19. नर-नारियों की समानता का पोषक

भारतीय समाज में नारियाँ सदियों से शोषित और पीड़ित रही हैं। उन्हें प्रायः ऐसा कोई अधिकार नहीं दिया गया था, जिसके आधार पर वे अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रख पाती। भारतीय संविधान में उन्हें विना किसी भेदभाव के पुरुषों के समान अधिकार दिए गए हैं।

अव संविधान के अनुसार, सरकारी नौकरियों में भी पुरुषों एवं नारिणों में कोई भेदभाव नहीं बरता जाता। पुरुषों के समान महिलाओं को भी जन-प्रतिनिधि चुनने का वयस्क मताधिकार प्राप्त है। यहाँ तक कि महिलाओं के लिए पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के निवचिन में एक-तिहाई सीटों पर आरक्षण है।

भारतीय संविधान की आलोचनाएँ

भारतीय संविधान में जहाँ इतनी विशेषताएँ हैं, वहीं विद्वानों ने इसमें कुछ कमियाँ भी खोजी हैं। इसी संदर्भ में आलोचकों ने भारतीय संविधान की तुलना ऐसी महिला से की है, जो अपने प्रेमियों के मनोभावों के अनुसार प्रशंसा अथवा निंदा पाती है। सामान्यतः भारतीय संविधान के निम्नलिखित कमजोर पक्ष उद्घाटित किए गए हैं

1. उधार का संविधान

आलोचक कहते हैं कि भारतीय संविधान में नया और मौलिक कुछ भी नहीं है। वे इसे ‘उधार का संविधान’ कहते हैं और ‘उधारी को एक बोरी’ अथवा एक ‘हॉच पांच कन्स्टीच्युशन’ दुनिया के संविधानों के लिए विभिन्न दस्तावेजों की ‘पैबन्दगिरी।’ लेकिन ऐसी आलोचना पक्षपातपूर्ण एवं अंतार्किक है। ऐसा इसलिए कि संविधान बनाने वालों ने अन्य संविधान के आवश्यक संशोधन करके ही भारतीय परिस्थितियों में उनकी उपयुक्तता के आधार पर उनकी कमियों को दरकिनार करके ही स्वीकार किया उपरोक्त।, आलोचना का उत्तर देते हुए डा. वी.आर. अम्बेदकर ने संविधान सभा में कहा- “कोई पूछ सकता है कि इस घड़ी दुनिया के इतिहास में बनाए गए संविधान में नया कुछ हो सकता है। सौ साल से अधिक हो गए जबकि दुनिया का पहला लिखित    संविधान बना। इसका अनुसरण अनेक देशों ने किया और अपने देश के संविधान को लिखित बनाकर उसे छोटा बना दिया। किसी संविधान का विषय क्षेत्र क्या होना चाहिए। यह पहले ही तय हो चुका है, उसी प्रकार किसी संविधान के मूलभूत तत्वों की जानकारी और मान्यता आज पूरी दुनिया में है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सभी संविधानों में मुख्य प्रावधानों में समानता दिख सकती है। केवल एक नई चीज यह हो सकती है किसी संविधान में जिसका निर्माण इतने विलंब से हुआ है कि उसमें गलतियों को दूर करने और देश की जरूरतों के अनुरूप उसको टालने की विविधता उसमें मौजूद रहे। यह दोषारोपण कि यह संविधान अन्य देशों के संविधानों की हू-ब-हू नकल है, मैं समझता हूं, संविधान के यथेष्ट अध्ययन पर आधारित नहीं है।

2. 1935 के अधिनियम की कार्बन कॉपी

आलोचकों ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने बड़ी संख्या में भारत सरकार अधिनियम 1935 के प्रावधान भारत के संविधान में डाल दिए। इससे संविधान 1935 के अधिनियम को कार्बन कॉपी बनकर रह गया या फिर उसका ही संशोधित रूप उदाहरण के लिए एन. श्रीनिवासन का कहना है कि भारतीय संविधान भाषा और वस्तु दोनों ही तरह से 1935 के अधिनियम की नकल है। उसी प्रकार सर आइबर जेनिंग्स, ब्रिटिश संविधानवेता ने कहा कि संविधान भारत सरकार अधिनियम 1935 से सीधे निकलता है, जहां से वास्तव में अधिकांश प्रावधानों के पाठ बिल्कुल उतार लिए गए हैं। पुनः पी.आर. देशमुख, संविधान सभा सदस्य ने टिप्पणी की कि “संविधान अनिवार्यतः भारत सरकार अधिनियम 1935 ही है, बस वयस्क मताधिकार उसमें जुड़ गया है।” उपरोक्त आलोचनाओं का उत्तर संविधान सभा में बी.आर. अम्बेदकर ने इस प्रकार दिया-“जहां तक इस आरोप की बात है कि प्रारूप संविधान में भारत सरकार अधिनियम 1935 का अच्छा-खासा हिस्सा शामिल कर लिया गया है, मैं क्षमा याचना नहीं करूंगा। उधार लेने में कुछ भी लज्जास्पद नहीं है। इसमें साहित्यिक चोरी शामिल नहीं है। संविधान के मूल विचारों पर किसी का एकस्व अधिकार (Patent Rights) नहीं है। मुझे खेद इस बात के लिए है भारत सरकार अधिनियम, 1935 से लिए गए प्रावधान अधिकतर प्रशासनिक विवरणों से सम्बन्धित हैं।”

3. अभारतीय अथवा भारतीयता विरोधी

आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान ‘अ-भारतीय’ या ‘भारतीयता विरोधी’ है क्योंकि यह भारत की राजनीतिक परम्पराओं अथवा भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता। उनका कहना है कि संविधान की प्रकृति विदेशी है जिससे यह भारतीय परिस्थितियों के लिए अनुपयुक्त एवं अकारण है। इस संदर्भ में के. हनुमथैव्या, संविधान सभा सदस्य ने टिप्पणी को- “हम वीणा या सितार का संगीत चाहते थे, लेकिन यहां हम एक इंग्लिश बैंड का संगीत सुन रहे हैं। ऐसा इसलिए कि हमारे संविधान निर्माता उसी प्रकार से शिक्षित हुए।” उसी प्रकार लोकनाथ मिश्रा, एक अन्य संविधान सभा सदस्य ने संविधान को आलोचना करते हुए इसे “पश्चिम का दासवत अनुकरण, बल्कि पश्चिम को दासवत आत्मसमर्पण कहा। लक्ष्मीनारायण साहू. एक अन्य संविधान सभा सदस्य का कहना था-” जिन आदशों पर यह प्रारूप संविधान गढ़ा गया है भारत को मूलभूत उनमें प्रगट नहीं होती। यह संविधान उपयुक्त सिद्ध नहीं होगा और लागू होने के फौरन बाद ही टूट जाएगा। ‘

4. गांधीवाद से दूर संविधान

आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान गांधीवादी दर्शन और मूल्यों को प्रतिबिम्बित नहीं करता, जबकि गांधी जी हमारे राष्ट्रपिता है। उनका कहना था कि संविधान ग्राम पंचायत तथा जिला पंचायतों के आधार पर निर्मित होना चाहिए था। इस संदर्भ में, वही सदस्य के. हनुमंथैय्या ने कहा-” यह वही संविधान है जिसे महात्मा गांधी कभी नहीं चाहते, न ही संविधान को उन्होंने विचार किया होगा। टी. प्रकाशम संविधान के एक और सदस्य इस कमी का कारण गांधीजी के आंदोलन में अम्बेदकर को सहभागिता नहीं होना, साथ ही गांधीवाद विचारों के प्रति उनका तीव्र विरोध को बताते हैं।

5. महाकाय आकार

आलोचक कहते हैं कि भारत का संविधान बहुत भीमकाय और बहुत विस्तृत है जिसमें अनेक अनावश्यक तत्व भी सम्मिलित है। सर आइवर जेनिंग्स, एक ब्रिटिश संविधानवेत्ता के विचार में जो प्रावधान बाहर से लिए गए हैं उनका चयन बेहतर नहीं है    और संविधान सामान्य रूप से कहें, तो बहुत लंबा और जटिल है। ” इस संदर्भ में एच.वी. कामथ, संविधान सभा के सदस्य ने टिप्पणी की-” प्रस्तावना, जिस किरीट का हमने अपनी सभा के लिए चयन किया है, वह एक हाथी है। यह शायद इस तथ्य के अनुरूप ही है कि हमारा संविधान भी दुनिया में बने तमाम संविधानों में सबसे भीमकाय है। ‘उन्होंने यह भी कहा-” मुझे विश्वास है, सदन इस पर सहमत नहीं होगा कि हमने एक हाथीनुमा संविधान बनाया है। ”

6. वकीलों का स्वर्ग

आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान अत्यंत विधिवादितापूर्ण तथा बहुत जटिल है। उनके विचार में जिस कानूनी भाषा और मुहावरों को शामिल किया है उनके चलते संविधान एक जटिल दस्तावेज बन गया है। वही सर आइवर जेनिम्स इसे’ वकीलों का स्वर्ग ‘कहते हैं। इस संदर्भ में एच.के. माहेश्वरी, संविधान सभा के सदस्य का कहना था-” प्रारूप लोगों को अधिक मुकदमेबाज बनाता है, अदालतों की ओर अधिक उन्मुख होंगे, वे कम सत्यनिष्ठ होंगे, और सत्य और अहिंसा के तरीकों का पालन वे नहीं करेंगे। यदि में ऐसा कह सकू तो यह प्रारूप वास्तव में वकीलों का स्वर्ग ‘ है। यह वाद या मुकदमों की व्यापक संभावना खोलता है और हमारे योग्य और बुद्धिमान वकालों के हाथ में बहुत सारा काम देने वाला है।  उसी प्रकार संविधान सभा के एक अन्य सदस्य पी.आर. देशमुख ने कहा-” मैं यह कहना चाहूंगा कि सदन के समक्ष डा. अम्बेदकर ने जो अनुच्छेदों का प्रारूप प्रस्तुत किया है, मेरी समझ से अत्यंत भारी-भरकम है, जैसा कि एक भारी-भरकम जिल्दवाला विधि-ग्रंथ हो। संविधान से सम्बन्धित कोई दस्तावेज इतना अधिक अनावश्यक विस्तार तथा शब्दाडम्बर का इस्तेमाल नहीं करता। शायद उनके लिए ऐसे दस्तावेज को तैयार करना कठिन था जिसे, मेरी समझ से एक विधि ग्रंथ नहीं बल्कि एक सामाजिक राजनीतिक दस्तावेज होना था, एक जीवंत स्पंदनयुक्त, जीवनदायी दस्तावेज। लेकिन हमारा दुर्भाग्य कि। नहीं हुआ और हम शब्दों और शब्दों से लद गए हैं जिन्हें बहुत आसानी से हटाया जा सकता था।

7. राज्यों की स्वायत्तता पर नियंत्रण

भारतीय संविधान में राज्य सरकारों की अपेक्षा केंद्र सरकार को अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, जिससे वह संघात्मक से अधिक एकात्मक हो गया है। भारतीय संविधान पर टिप्पणी करते हुए डॉ. जेनिन्स का कथन है कि यह संविधान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक संविधान है। जिस प्रकार अमेरिकी संविधान जॉर्ज तृतीष के विरुद्ध जनप्रतिक्रियाओं का प्रतिफल थी, उसी प्रकार भारतीय संविधान बॉण्डविन, मैकडोनाल्ड, वरलेन, पापिल आदि के प्रति प्रतिक्रियाओं की देन है।

8. राष्ट्रपति बनाम तानाशाह

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को व्यापक संकटकालीन अधिकार दिए गए हैं, जिससे राष्ट्रपति के पद में तानाशाही तत्त्वों का समावेश हो गया है। शंकर राय देव के शब्दों में, “राष्ट्रपति पद में जर्मन संविधान के समान तानाशाही शक्तियाँ निहित हैं।

9. नीति-निदेशक तत्त्वों की निस्सारता

राज्यों के नीति-निदेशक तत्वों को व्यावहारिक रूप में लागू करना आसान नहीं है। कुछ मामलों में तो न्यायालय भी असमर्थता जाहिर कर बैठते हैं। अतः वे तत्व व्यर्थ और निस्सार हैं।

10. भारतीयता का अभाव

कुछ आलोचकों की दृष्टि में भारतीय संविधान भारतीयता से सर्वथा रहित है, क्योंकि इसकी आत्मा सन् 1935 के अधिनियम में बसती है और इसके शरीर के लिए इंग्लौंड, अमेरिका, फ्रांस, कनाडा आदि के संविधानों से मसाला जुटाया गया है।

11. अनावश्यक केंद्रीयकरण

भारतीय संविधान में अनावश्यक रूप से शासन का केंद्रीयकरण किया गया है, जो संघ के सिद्धांतों के प्रतिकूल है।

 

 

2 thoughts on “संविधान की प्रमुख विशेषताएं (Salient Features of the Constitution)”

  1. भारतीय संविधान की मूलभूत विशेषताएं भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताओं का हम निम्न शिर्षकों के अन्तर्गत वर्णन कर सकते हैं:

    (1) विशालतम लिखित संविधान– भारत का संविधान विश्व का विशालतम लिखित संविधान है। इस संविधान को हमारी संविधान सभा ने निश्चित अवधि में एकत्रित करके उसे लिखित स्वरुप प्रदान किया है। भारत के संविधान में 398 अनुच्छेद तथा , परिशिष्ट हैं जबकि अमेरिका के संविधान में केवल 7 अनुच्छेद तथा आस्ट्रेलिया के संविधान में 128 अनुच्छेद हैं।

    (2) संविधान की सर्वोच्च्ता– वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अन्तर्गत भारत का संविधान सर्वोच्च है। केन्द्र व राज्यों की विधानपालिकाएं तथा कार्यपालिकाएं संविधान का उल्लंघन नहीं कर सकती हैं।

    (3) कठोर संविधान– भारत का संविधान कठोर है, परन्तु अमेरिकन संविधान की भांति अति कठोर नहीं है। संविधान के कुछ प्रावधानों को संसद 2/3 बहुमत से ही संशोधित कर सकती है तथा कुछ विशेष प्रावधानों के संशोधन पर 1/2 राज्य विधानमण्डलों द्वारा पुष्टि भी अनिवार्य है।

    (4) लोकप्रिय सम्प्रभुताः भारत एक संम्प्रभु लोकतान्त्रिक गणतन्त्र है। संविधान की प्रस्तावना के प्रारम्भिक शब्द ‘जनता की सत्ता पर बल देते हैं। जनता ही संविधान का स्रोत है। लोकप्रिय संम्प्रभुता का प्रथम अभिप्राय है कि सभी सरकारी संस्थाओं की अंतिम सत्ता जनता की इच्छा से उत्पन्न होती है जो संविध न में अभिव्यक्त की गयी है। दूसरे, समय-समय पर होने वाले लोकप्रिय चुनावों द्वारा इस सत्ता का नवीनीकरण होता रहता है। जहां इंग्लैण्ड तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में मताधिकार लोगों को धीरेगरे प्रदान किया गया और लोगों को यह प्राप्त करने में एक शताब्दी से भी अधिक समय लगा वहीं भारत में यह एक ही साथ एवं एक ही समय में सभी को प्रदान कर दिया गया। परिणामस्वरुप गरीबी से ग्रस्त, पिछड़े एवं अशिक्षित भारतीयों को स्वतंत्रता की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रुप में मत देने का अधिकार प्राप्त हो गया। 1950 के बाद से स्वतंत्र भारत में 14 आम चुनाव हो चुके हैं और इन चुनावों में गरीबी, व्यापक अशिक्षा तथा अल्प संचार जैसी बाधाओं के बावजूद जनता ने सामान्यतः अपने विवेक का प्रयोग करते हुए अपनी पसन्द के प्रतिनिधियों का निर्वाचन किया है और एक लोकतांत्रिक, उत्तरदायी सरकार के गठन में अपनी सर्वोच्च सत्ता की पुष्टि की है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि उन विद्यमान परिस्थितियों में भारत में लोकतन्त्र को अपनाना एक अनूठा प्रयोग था और राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से यह एक साहसपूर्ण एवं विश्वसनीय निर्णय को अभिव्यक्ति थी।

    (5) संसदात्मक सरकारः भारत में लोकतान्त्रिक संसदात्मक सरकार अपनाई गई जो ब्रिटेन के प्रारुप पर आधारित था। सामान्यतः यह विश्वास किया जाता है कि अंग्रजी शासन के दौरान भारतीय नेताओं ने इस प्रणाली के अन्तर्गत कुछ अनुभव प्राप्त किया था इसलिये संसदात्मक प्रारुप को अपनाया गया। लेकिन इसको अपनाने के अन्य दो महत्त्वपूर्ण कारण भी थे। जैसा कि डा. अम्बेडकर ने बताया, प्रथम कारण यह था कि लोकतांत्रिक कार्यपालिका को दो शर्ते अवश्य पूरी करनी चाहिए : स्थायित्व एवं उत्तरदायित्व। अमेरिकी एवं स्वीस प्रणालियां अधिक स्थायित्व को सुनिश्चित करती है लेकिन उत्तरदायित्व को नहीं। गैर संसदात्मक प्रणाली के अंतर्गत कार्यपालिका के उत्तरदायित्वों का निर्वाह मियादी रुप में होता है और इसको चुनावों के समय ही निर्वाचकों द्वारा किया जाता है। लेकिन ठीक इसके विपरीत संसदात्मक प्रणाली के अन्तर्गत यह अवलोकन मियादी एवं दैनिक दोनों होता है। संसद के सदस्यों द्वारा प्रश्नों, प्रस्तावों एवं अविश्वास प्रस्तावों द्वारा यह अवलोकन निरन्तर किया जाता है। मियादी अवलोकन निर्वाचकों द्वारा चुनाव के माध्यम से किया जाता है। संविधान सभा ने स्थायित्व की अपेक्षा उत्तरदायित्व को अधिक महत्व दिया। संसदात्मक प्रणाली को अपनाने का दूसरा महत्वपूर्ण कारण था भारतीय समाज को बहुलवादी प्रकृति। इस प्रणाली के अन्तर्गत निर्णय करने की प्रक्रिया में बहुत से समूहों एवं हितों को स्थान देने के दृष्टिकोण को भी उचित माना गया था। इन कारणों के साथ-साथ औपनिवेशिक शासन के दौरान नेतृत्व का प्रशिक्षण भी इस प्रणाली के अन्तर्गत हुआ था तथा उनकी अनुकूलता भी इसके प्रति बन गयी थी। हालांकि सरकार को संसदात्मक प्रणाली में मुख्यतः ब्रिटेन की परम्पराओं की लिखित रुप प्रदान किया गया, फिर भी भारतीय प्रणाली ब्रिटेन से दो प्रकार से भिन्न थी। ब्रिटेन में संसद सर्वोच्च है। ब्रिटेन की संसद द्वारा पारित किये गये किसी भी कानून की वैधता को कोई भी अदालत चुनौती नहीं दे सकती। किन्तु भारत में संसद सर्वोच्च न होकर संविधान सर्वोच्च है। इसलिये भारतीय न्यायलयों को संसद द्वारा पारित कानूनों की संवैधानिकता पर निर्णय करने की शक्ति निहित है। दूसरे ब्रिटेन किा राज्याध्यक्ष पैतृक होता है, किन्तु भारत में संघीय प्रसंग में राज्याध्यक्ष का अप्रत्यक्ष तरीके से चुनाव होता है।

    (6) मूलभूत अधिकार एवं नीति निर्देशक सिद्धान्त : संविधान के जिन उद्देश्यों का उल्लेख प्रस्तावना में | किया गया है उनमें महत्वपूर्ण उद्देश्य है, “सभी नागरिकों के लिए न्याय : सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, श्रद्धा एवं पूजा की स्वतंत्रता, स्तर तथा अवसर की समानता” इनकी स्पष्ट अभिव्यक्ति अध्याय (II) तथा (iv) की धाराओं में की गयी है। इन्हें मौलिक अधिकार तथ नीति निर्देशक सिद्धांत कहा गया है। मौलिक अधिकारों के अध्याय में संविधान स्वीकार करता है कि प्रत्येक व्यक्ति कुछ अधिकारों को उपयोग करने का अधिकारी है। इस प्रकार के अधिकारों का उपय का उपयोग किसी बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक की इच्छा पर निर्भर नहीं करता। इन अधिकारों में भाष । इच्छा पर निर्भर नहीं करता। इन अधिकारों में भाषण तथा संगठन की स्वतंत्रता, कानून समानता एव कानूनों की समान सुरक्षा, विश्वास की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक एव ना और सांस्कतिक एवं शैक्षिक स्वतंत्रतार शामिल हैं। संवैधानिक समाधान के अधिकार की व्यवस्था ‘ क समाधान के अधिकार की व्यवस्था भी संविधान में है जिसके अनुसार कोई भी पीडित व्यक्ति अपने मूलभूत अधिकार की बहाली के लिये उच्चतर न्यायलय के पास का बहाली के लिये उच्चतर न्यायलय के पास जा सकता है। इन अधिकारों का महत्व इस तथ्य में निहित है। कारा का महत्व इस तथ्य में निहित है कि इन स्वतंत्राओं का अस्तित्व बहुसंख्या की इच्छा नहा करता। अस्पृष्यता की समाप्ति (अनु. 17) शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनु. 23, 24) तथा समानता और न्याय के अधिकार (अनु. 14, 15, 23) विशेष रुप से सामाजिक न्याय को प्राप्त करन य संबंधित है। लेकिन इसी के साथ-साथ इस पर भी बल दिया गया है कि संविधान द्वारा सुरक्षित किये गये मूलभत आधकार असीमित नहीं है। दूसरे शब्दों में यद्यपि मूलभूत अधिकार स्वयं में मौलिक हैं, लेकिन वे राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सामूहिक लोकहित से ऊपर नहीं है। राष्टीय सुरक्षा के हित में संविधान में ऐसी व्यवस्थाये को गर्दा है जिससे कि मूलभूत अधिकारों को सीमित रखा जा सके। संविधान में यह व्यवस्था भा की गयी है कि जा अपन मौलिक अधिकारों को अपयोग कर रहे हैं वे अपने उत्तरदायित्वों को भी पूरा करें। संसद के पास अधिकार भी है कि मूलभूत अधिकारों का सीमित या रद्द करने के लिये संविधान में संशोधन कर सक। मूलभूत अधिकारों के उपयोग को सीमित करने के लिये संविधान में बहुत से संशोधन किये गये हैं। ऐसा माना जाता है कि विकासशील देश में लोकतंत्र जनसाधारण के लिये तभी अर्थपूर्ण हो सकता जब इसके साथ सामाजिक परिवर्तन भी हो। इसलिये नवीन भारत ने उदित होते लोकतंत्र के मूलभूत आधार के रुप में आर्थिक कार्यक्रमों की योजनाएं तैयार की और इनमें से कई को राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांनी के रुप में शामिल किया गया। सामाजिक हित में धन के एकाधिकार तथा संचयन को सीमित करना, बच्चों के लिये मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा जैसे कार्यक्रमों को निति निर्देशक सिद्धांतों में शामिल किया गया है। कुछ निश्चित मौलिक सिद्धांतों का अनसरण करने के लिये नीति निर्देशक सिद्धांतों को राज्य एवं इसकी प्रत्येक संस्था के लिए मार्ग निर्देशक माना गया है। नीति निर्देशक सिद्धान्तों को मूलभूत अधिकारों की भांति कानून के रुप में लागू नहीं किया जा सकता लेकिन इसके बावजूद भी देश का शासन संचालित करने के लिये उन्हें आधारभूत घोषित किया गया है। 25वें संविधान संशोधन के बाद उन्हें मौलिक अधिकारों की अपेक्षा प्राथमिकता भी प्रदान की जाने लगी है। इस प्रकार संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित सभी लक्ष्यों को प्राप्त करने की व्यवस्था की गयी है। ग्रानवियल आस्टिन का कहना है कि भारतीय संविधान एक सामाजिक दस्तावेज है। इसका अधिकतर धारायें या तो सामाजिक क्रान्ति को आगे बढ़ाने के लिये आवश्यक परिस्थितियों की स्थापना करता हैं या इस क्रान्ति को गति को और अधिक तीव्र करने का प्रयास करती है। सामाजिक क्रान्ति के प्रति कटिबद्धता मूलभूत अधिकारों तथा नीति निर्देशक सिद्धांतों में निहित है। ये संविधान के विवेक है। लेकिन समाज की उदार प्रकृति, लोकतंत्र के कुछ विरोधाभासों एवं आधुनिक राज्यों पर पड़ने वाले दबावों के कारण सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने में निश्चित तौर पर कुछ स्पष्ट सीमायें हैं। यही कारण है कि वास्तविक व्यवहार में भारत में परिवर्तन की प्रक्रिया ने जहां एक ओर पुनर्निर्माण तथा सामाजिक गतिशिलता की एक शानदार प्रक्रिया को जन्म दिया है वहीं इससे सामाजिक व्यवस्था में असंतुलन भी उत्पन्न हुआ है।

    (7) धर्मनिरपेक्षता ! आधुनिक युग में धर्मनिरपेक्षता एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अवधारणा है। भारतीय लोकतंत्र में इसका महत्व और अधिक हो गया है क्योंकि सामाजिक विविधता तथा सांस्कृतिक भिन्नताओं के कारण भारत को स्वतंत्रता के समय विशिष्ट समस्याओं का सामना करना पड़ा। ये एक स्वस्थ, उदार, समतावादा अनेकतावादी, लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये अनुकुल न थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि विकास केवन ऐसे वातावरण में ही हो सकता है जबकि सामाजिक स्थिति सौहादपूर्ण हो न कि विनाशकारी। इस प्रस” में सामाजिक सौहार्द तथा सामाजिक शांति के लिये धर्मनिरपेक्ष समाज एवं धर्मनिरपेक्ष राज्य को अनिवाब माना गया। लेकिन संविधान निर्माण के समय विचित्र भारतीय परिस्थितियों एवं स्थितियों के कारण उस समय धर्मनिरपेक्ष के सिद्धांत के विषय में कुछ संदिग्धता भी व्याप्त थी। इसी कारणवश इसे सावधान की प्रस्तावना में उदत नहीं किया गया। संविधान सभा में कई सदस्यों ने भारत को एक धमानरपा समाजवादी राज्य घोषित करने की मांग की। परन्तु इस मांग को यह तर्क देते हुए मानने से इकार का दिया गया कि धर्मनिरपेक्ष संविधान में अन्तर्निहित है। इसी तरह समाजवाद तत्कालिक लक्ष्य नहीं था। बाद में 1976 में 42 वें सविंधान संशोधन द्वारा धर्मनिरपेक्षता तथा समाजवाद दोनों को प्रस्तावना में शामिल कर लिया गया। भारत में धर्मनिरपेक्षता के विचार की उत्पत्ति मूलभूत अधिकारों से होती है और इसका अभिप्राय है ” धार्मिक पूजा को स्वतंत्रता, धार्मिक सहिष्णुता तथा साम्प्रदायिक सौहार्द। इसमें अन्तर्निहित है विद्यमान तथा नवीन धर्मों को समृद्ध होने की स्वतंत्रता, धार्मिक गतिविधियों के प्रति राज्यों का तटस्थ बने रहना। निष्ठाओं की एकता के आधार पर नवीन राष्ट्र के निर्माण के लिये धर्मनिरपेक्षता की इस उदारवादी परिभाषा द्वारा भारत की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित एवं रक्षित करने की आशा की गयी थी। जैसा कि नेहरु ने बल देते हुए कहा है कि स्थायित्व तथा सौहार्द को बनाये रखने के लिये धर्मनिरपेक्षता एक व्यवहारिक एवम् आवश्यक दृष्टिकोण है। लेकिन व्यवहार में राजनीतिज्ञों ने सत्ता के स्वार्थ पूर्ण उपयोग हेतु धर्मनिरपेक्षता का दुरुपयोग किया है और चुनावों के लिये लामबन्दि हेतु धर्म का इस्तेमाल किया है। इस प्रकार की गतिविधियों के कारण धार्मिक कट्टरवाद, रुढ़िवाद एवं समाज विरोधी तत्वों का सामूहिक रुप से उद्भव हुआ है। इससे साम्प्रदायिकता बढ़ रही है तथा इसने उदार धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को चुनौती दी है जिसके कारण आर्थिक विकास गम्भीर रुप से प्रभावित हो रहा है।

    (8) संघवाद: भारत की पृष्ठभूमि बहुभाषायी, बहुसांस्कृतिक एवं बहुजातीय होने के कारण संविधान निर्माताओं ने प्रस्तावना के अन्तगत व्यक्गित गरिमा सुनिश्चित करते हुए भ्रातृत्व एवं राष्ट्र की अखण्डता तथा एकता प्रोत्साहित करने के लक्ष्य को रखा। इन सामान्य विचारों को न केवल समानता, स्वतंत्रता, नागरिक अधि कारों एवं अल्पसंख्यक अधिकारों की मूलभूत धाराओं द्वारा कार्यशील बनाया गया अपितु ‘सहयोगी एवं अर्ध-संघवाद के माध्यम से भी इनकी सक्रिय भूमिका सुनिश्चित की गयी। उद्देश्य प्रस्ताव में संविधान सभा ने भारत में एक ऐसे संघवाद के निर्माण की घोषणा की जिसके अन्तर्गत राज्य-ईकाईयों के पास अवशिष्ट शक्तियां तथा सरकार संचालित करने के अधिकारों के साथ-साथ स्वायत्ता होगी। परन्तु भारत का विभाजन हो जाने के कारण भविष्य में भारत की एकता के सवाल से नेतृत्व के एक भाग में कुछ संदेह उत्पन्न हो गये थे। नेतृत्व का एक भाग पहले से ही एक शक्तिशाली केन्द्र के पक्ष में था। परिणामस्वरुप संविधान निर्माताओं ने एक ऐसी संघीय व्यवस्था की स्थापना की जिसका झुकाव एक शक्तिशाली केंद्र की तरफ था। संविधान का प्रथम अनुच्छेद घोषित करती है कि भारत ‘राज्यों का संघ’ है। ‘राज्यों के संघ’ शब्द के महत्व की व्याख्या करते हुए बी.आर. अम्बेडकर ने कहा कि इसके अन्तर्गत दो चीजें अन्तर्निहित हैं : प्रथम, भारतीय संघ इकाईयों के मध्य समझौते का परिणाम नहीं है। द्वितीय किसी भी इकाई को संघ से होने की स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है। भारत में शक्तियों का विभाजन तीन स्तरों पर है : विधायी, प्रशासनीय एवं वित्तिय। लेकिन केंद्र के पास न केवल अधिक एवं महत्वपूर्ण शक्तियां हैं अपितु वह राज्यों के शक्ति क्षेत्रों में भी हस्तक्षेप कर सकता है। अवशिष्ट शक्तियां केंद्र के पास हैं न कि राज्यों के। वास्तव में भारत को 1935 के अधिनियम से संघीय ढांचा उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ था। 1935 का अधिनियम असंतुष्ट इकाईयों की बढ़ती मांगों तथा उनकी परम्पराओं एवं निष्ठाओं के अनुरुप उनकी जीवन प्रणालियों के तौर-तरीकों को उचित स्थान प्रदान करने के लिये पर्याप्त लचीला नही था। केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति के बावजूद राज्यों को यह संतुष्टि अवश्य थी कि उनके विषयों की एक सुनिश्चित सूची थी जिस पर कानून बनाने की शक्ति पूर्णतः उनकी थी। लेकिन व्यवहार में दल व्यवस्था की प्रकृति, योजनाबद्ध विकास की प्रक्रिया तथा केंद्र में राजनीतिक नेतृत्व की शैली ने शक्तियों के केंद्रीयकरण की लगातार बढ़ती प्रक्रिया एवं राज्य स्तर की राजनीति में केंद्र के हस्तक्षेप को काफी बढ़ाया। इसी के साथ-साथ केंद्रीयकरण की प्रक्रिया के फलस्वरुप क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक समूहों की चेतना एवं दावे का विकास हो रहा है। इस प्रकार केंद्र-राज्य के संबंधों में तनाव एवं टकराव उत्पन्न हुआ है। केन्द्रविमुख तथा केंद्राभिमुखी प्रवृतियों का विरोध कर अनेकता में समन्वय द्वारा एकता लाने के लिए संविधान द्वारा उपलब्ध संघीय मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता है।

    (9) स्वतंत्र न्यायपालिका : उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि संविधान निर्माता बहुत से क्षेत्रों में न्याय के विचार के प्रति चितिंत थे। यह क्षेत्र थे व्यक्तिगत अधिकार, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, प्रादेशिक क्षेत्रों के लिये शक्तियां, पीड़ित तथा शोषित आदि का उत्थान। इनके लिये मूलभूत अधिकारों, नीति निर्देशक सिद्धान्तों, चुनाव, संघवाद, कानून का शासन आदि की व्यवस्था की गयी। लेकिन संविधान निर्माताओं के सम्मुख औपनिवेशिक शासन के दौरान सर्वधिकारवादी एवं निरंकुश राज्य के कार्य करने का अनुभव था। वे जानते थे कि व्यक्ति, समूहों, तथा राज्यों के अधिकारों की सुरक्षा के लिये उचित तंत्र के बगैर उनके आशीर्वाद मात्र बने रहने की सम्भावना प्रबल थी इसलिये आवश्यक था कि समूहों सहित व्यक्गित रुप में अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिये पर्याप्त वैध संस्थायें प्रदान की जाये। इसी के लिये संविधान में स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा को शामिल किया गया। यहां यह भी उद्धृत किया जा सकता है कि भारत में संयुक्त राज्य अमेरीका की भांति और ब्रिटेन की अपेक्षा न्यायपालिका को अधिक शक्ति प्रदान की गई है। इस संदर्भ में न्यायपालिका को चार कार्य सौंपे गये हैं:
    1) मौलिक अधिकारों की रक्षा एवं गारन्टी
    2) संघीय संतुलन बनाये रखना
    3) कार्यकारी तथा विधायिका पर नियंत्रण रखना एवं कानून के शासन को लागू करना और
    4) निर्वाचन पद्धति अपनाई थी परन्तु स्वतंत्रता के पश्चात् भारत के संविधान निर्माताओं ने संयुक्त निर्वाचन पद्धति अपनाई और साम्प्रदायिक मताधिकार को समाप्त कर दिया।

  2. सामान्य रूप से विविध संविधानों के अध्ययन एवं अनुभव के आधार पर हमारे संविधान की प्रमुख विशेषताएं निम्न प्रकार है
    1. कुछ विद्वानों का विचार है कि संविधान जितना संक्षिप्त हो उतना ही अच्छा है। संविधान के अंतर्गत देश की शासन-व्यवस्था में सम्बन्धित मूल बातों का ही वर्णन किया जाना चाहिए और दिन-प्रतिदिन के राजनीतिक जीवन से सम्बन्धित विस्तार की बातें लिखकर संविधान की गरिमा को आघात नहीं पहुंचाया जाना चाहिए।
    2. संविधान द्वारा व्यक्ति-व्यक्ति, शक्ति एवं सरकार और सरकार के विविध अंगों के पारस्परिक सम्बन्धों को निश्चित किया जाता है। स्पष्टता के अभाव में संविधान से सम्बन्धित इन विविध पक्षों में निरन्तर विवाद उत्पन्न होने की संभावना रहती है।
    3. संविधान का एक प्रमुख उद्देश्य शासन की मर्यादा सुनिश्चित करना और दूसरे व्यक्तियों एवं राज्यों के हस्तक्षेप से नागरिकों के अधिकारों एवं हितों की रक्षा करना होता है। नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लेख होने से नागरिकों की स्वतंत्रता एवं हित अधिक सुरक्षित हो जाते हैं और व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका नागरिकों के अधिकार के साथ मनचाहा खिलवाड़ नहीं कर पाते।
    4. शासन के विभिन्न विभागों को अपनी सीमा में रखने और इन विभागों के बीच उत्पन्न होने वाले विवादों के हल के लिए स्वतंत्र न्यायालयों का अस्तित्त्व न केवल उपयोगी वरन् आवश्यक है। नागरिकों के मौलिक अधिकारों के लिए भी स्वतंत्र न्यायालयों का अस्तित्त्व अनिवार्य है।

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