मौलिक कर्तव्य कितने है

मौलिक कर्तव्य कितने है: जहाँ संविधान को इस आधार पर आलोचना की जा रही है कि इसमें सामाजिक-आर्थिक न्याय प्राप्ति के आदर्श दिखावटो अधिक और बास्तविक कम है वहाँ आलोचना का दूसरा पहलू यह भी रहा है कि संविधान ने केवल नागरिकों के अधिकारों का हो वर्णन किया गया है। नागरिकों को देश तथा समाज के प्रति ज्या कला है तथा देश के विकास में उन्हें किस प्रकार की भूमिका निभानी है। इस संबंध में सविधान कछ भी नहीं कहता प्रेक्षकों का मत रहा है कि राष्ट्र निमाण के लिए आवश्यक है कि नागारिक कुछ सामान्य मुल्यों के आधार पर देशप्रेम तथा राष्ट्रवाद का अनुकरण करें। उपरोक्त आलोचना से बचने के लिए सविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्य से सम्बन्धित अनुच्छेद-2 और भाग चार (क) व संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा जोडे गए ये मौलिक कर्तव्य इस प्रकार हैं।

11 मौलिक कर्तव्य कौन-कौन से हैं

भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्य को अनुच्छेद 51 के तथा भाग 4 में जुड़ गया है। मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों की संख्या 10 थी। परंतु 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 धारा 11 मौलिक कर्तव्य जोड़ दिया गया। अतः वर्तमान में भारतीय संविधान में 11 मौलिक कर्तव्य है. 11 मौलिक कर्तव्य को नीचे बताया गया है।

  1. भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तब्य होगा कि –
  2. वह संविधान का पालन करे और राष्ट्रीय जज एक राष्ट्रीय गान का आदर करे।
  3. स्वतंत्रताग्राहो राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरणा देने वाले उच्च आदशों का आदर तथा पालन करे।
  4. भारत को प्रभुसता, एकता और अखंडता की रक्षा करे। से राष्ट्र और राष्ट्र को समत्ति को रक्षा करे।
  5. भारत के लोगों के बीच भाइचारे की भावना का विकास करे।
  6. अपने देश को मिली-जलो साकतिक विरासत का संरक्षण करे।
  7. प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण और विकास करें।
  8. बैज्ञानिक दृष्टिकोण और जांच पड़ताल को भावना का विकास करे।
  9. सावजनिक सम्पत्ति को रक्षा करे।
  10. व्यक्तिगत एवं सामूहिक कार्यकलपों के सभी क्षेत्रों में सर्वोत्कृष्टता करने का प्रयत्न करे।
  11. 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों के माता-पिता या अभिभावक या सरक्षक को अपने बच्चे को शिक्षा दिलाने का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए।( यह मौलिक कर्तव्य 86 सविधान संशोधन अधिनियम 2000 द्वारा जोड़ा गया।)

मौलिक कर्तव्य को राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के अध्याय में जोड़ने का अर्थ है कि निर्देशक नीति निर्देशक तत्व की तरह यह भी बातें योग्य नहीं है. वास्तव में संविधान में इसकी व्याख्या नहीं की गई कि इन्हें कैसे लागू किया जाए और नहीं इनको आंवला करने पर किसी प्रकार की सजा या बाद कार्य व्यवस्था की गई है इसके अतिरिक्त कर्तव्य विवरण में भी अस्पष्टता है.

यहां पर इस बात का भी उल्लेख किया जा सकता है कि संविधान के 42 वें संविधान संशोधन आंतरिक आपातकाल के दौरान किया गया था। जिस समय सरकार के प्रत्येक कार्रवाई संदेहात्मक थी इसलिए इसकी पृष्ठभूमि कोई सिद्धांत नहीं होने के कारण उस समय के राजनीतिक दल और उदारवादी संविधान में इसे सकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा।

मौलिक कर्तव्य कितने है

एम सी मेहता बनाम भारत संघ के मामले में न्यायाधीश न्यायालय से यह निर्णय लिया गया कि अनुच्छेद 51 के अधीन केंद्रीय सरकार का यह कर्तव्य कि वे देश के शिक्षण संस्थानों में  सप्ताह के 1 घंटे पर्यावरण संरक्षण को शिक्षा देने का निर्देश दें दूसरी बात जो मैच की है वह यह कि अनुच्छेद 51 के की भाषा और इसके अर्थ तथा विस्तार के बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता किंतु इतना तो स्पष्ट है कि इस अनुच्छेद की भाषा की परिधि के अंतर्गत राज्य किसी भी नागरिक को दंडित इस स्थिति का यथाशीघ्र निराकरण आवश्यक है.  इसके अभाव में मूल कर्तव्य पवित्र घोषणा मात्र रह जाएंगे

मौलिक कर्तव्य की उपयोगिता

मौलिक कर्तव्य की उपयोगिता निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है

निर्विवाद है- इन मौलिक कर्तव्य के प्रति इस प्रकार की है कि विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं की बहू को इनमें कोई विवाद की बात नहीं लगती वास्तव में यह दलगत राजनीति से ऊपर है इनका आदर्श देश हित की भावना को नागरिकों के हृदय में जागृत करना है

आदर्श और पथ प्रदर्शक-  आदर्श आत्मा के नागरिक का पथ प्रदर्शन करते हैं भारत में आज सर्वत्र स्वार्थ दवा तोड़ दिखाई देता है व्यक्ति व  समाज के हितों का उचित सामंजस नहीं है धीरे-धीरे समाज हित गण होता जा रहा है यह कर्तव्य जनता का मार्गदर्शन करेंगे और व्यवहार के लिए आदर्श उपस्थित करेंगे

जागृति उत्पन्न करेंगे- इन कर्तव्य की पूर्ति का आधार स्वविवेक है दवा के शक्ति नहीं है धीरे-धीरे समाज में कर्तव्य पूर्ति की भावना को जागृत कर दी श्रेष्ठ आचरण संभव होगा स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी ने संसद में कहा था कि अगर मौलिक कर्तव्य को केवल अपने दिमाग में रख लेते हैं तो हम तुरंत एक शांतिपूर्ण क्रांति देखेंगे

मौलिक कर्त्तव्यों की आलोचना

मोलिक कर्तव्यों के रुप और उनकी प्रकृति की आलोचना की गई है। इस आलोचना के मुख्य आधार निम्नलिखित हैं:

(1) आपात्काल में सृजन हुआ- इन मौलिक कर्तव्यों की प्रमुख आलोचना यह कह कर की जाती है कि आन्तरिक आपात्काल के दौरान जबकि देश के विचारक, विद्वान, विधिवेत्ता तथा राजनीतिक दलों के नेता व कार्यकर्ता जेलों में बन्द थे, उस समय 42 वें संशोधन ने इन कर्त्तव्यों को एकांगी रूप में संविधान में जोड़ दिया। इस सम्बध में जनता, उसके नेताओं को व समाज के बुद्धिवादी वर्ग को इस पर विचार करने का अवसर ही प्राप्त नहीं हुआ और सत्तारुढ़ दल के द्वारा मनमाने ढंग से इनकी रचना कर दी गई। किन्तु इस आलोचना में अधिक तथ्य दिखलाई नहीं देता क्योंकि ये कर्त्तव्य अत्यन्त विवाद रहित तथा सामान्य प्रकृति के हैं। इतना ही नहीं आपात्काल के पश्चात बनी जनता सरकार ने भी इनकी उपयोगिता समझकर इन्हें संविधान में से निकाल बाहर करने का कोई प्रयास नहीं किया।

(2) न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र से बाहर- ये न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखे गए हैं अतः नागरिकों में इनके पालन करने की इच्छा की जागृति सम्भव नहीं है। दूसरे, यदि किसी समय इनको न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में देने की बात सोची जाएगी तो इनकसा रुप ऐसा है कि इनका उल्लंघन किया गया है या पूर्ति की गई है यह निश्चित करना कठिन है। जैसे तीसरे कर्त्तव्य में कहा गया है कि नागरिकों का कर्त्तव्य होगा कि वे भारत की प्रभुता, एकता व अखण्डता की रक्षा करें। यह निश्चित कर पाना कि देश की प्रभुता की रक्षा नहीं की गई, सम्भव नहीं है।

(3) कर्त्तव्य का रुप अस्पष्ट है- कहा जाता है कि यदि नागरिक हृदय से इन कर्त्तव्यों की पूर्ति करना भी चाहें तो भी उनके लिए यह सम्भव नहीं होगा। उनके सामने प्रश्न होगा कि वह क्या करें, देश की प्रभुता, एकता व अखण्डता की रक्षा कैसे करें। गौरवशाली परम्परा का परीक्षण कैसे करें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करें, अर्थात क्या करें? आदि। वास्तव में ये कर्त्तव्य अस्पष्ट हैं और नागरिक का मार्ग-दर्शन करने में असमर्थ हैं। सत्य बात यह है कि ये कर्त्तव्य राष्ट्रीय मूल्यों को उजागर करते हैं और सामान्य नागरिकों को उन्हें व्यावहार में लाने के लिए प्रेरित करते हैं।

(4) कुछ कर्त्तव्यों को मात्र दोहराया गया है- कुछ कर्त्तव्य ऐसे हैं जिनका आदर्श के रुप में संविधान में अन्यत्र वर्णन किया जा चुका है अतः उनका वर्णन दोहराना मात्र है और अनुपयोगी है। जैसे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले आदशों का हृदय में समझ में और पालन करे वास्तव में इन आदर्शों को राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में मूर्त रुप दिया गया है। इसी प्रकार देश की प्रभुता, एकता व अखण्डता की रक्षा करना और उसे अक्षुण्ण बनाए रखना, जैसे आदर्शों का भी संविधान की प्रस्तावना में वर्णन किया हुआ है। इस प्रकार मौलिक कर्त्तव्यों में मौलिकता का अभाव दिखाई देता है।

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