6 मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं

6 मौलिक अधिकार कौन कौन से हैं || 7 मौलिक अधिकार कौन कौन से हैं || मौलिक अधिकार कितने प्रकार के होते हैं || मौलिक अधिकार किस देश से लिया गया है

मूल अधिकार एक लोकतांत्रिक देश में व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होता है, किसी भी कल्याणकारी राज्य की आधारशिला ये मूल अधिकार ही है। एक तरफ तो ये अधिकार जनता को नैतिक बल प्रदान करते है, दूसरी ओर व्यवस्थापिका और कार्यपालिका शक्तियों पर प्रतिबन्ध लगाते हैं। भारतीय संविधान में शुरुआत में 7 मौलिक अधिकार दिए गए थे परंतु वर्तमान स्थिति में 6 मौलिक अधिकार है.

6 मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं

  1. समानता का अधिकार
  2. स्‍वतंत्रता का अधिकार
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार
  5. संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार

व्यक्ति के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक विकास के लिए मूल अधिकार अनिवार्य है। व्यक्ति एवं समुदाय विशेष कर शोषण से सुरक्षा प्रदान करने में मूल अधिकारों की अहम भूमिका है। मूल अधिकार ही बच्चों, महिलाओं एवं समाज के कमजोर वर्गों का कल्याण सुनिश्चित करते हैं तथा सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने में सहायक होते हैं।

मूल अधिकार द्वारा जनता में समानता एवं स्वतंत्रता स्थापित होती है। अल्पसंख्यकों में सुरक्षा की भावना जागृत होती है तथा उस देश के धर्म निरपेक्ष के स्वरूप की रक्षा होती है। यदि सरकार या अन्य इन अधिकारों का अतिक्रमण करता है तो प्रभावित व्यक्ति सीधे सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय की शरण ले सकता है।

नोट- मूल अधिकार नागरिकों को विधायिका, कार्यपालिका और व्यक्ति के विरूद्ध प्राप्त है। जिसकों अनु. 32 से न्यायालय से संरक्षण प्राप्त है।

6 मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं
6 मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं

(1) समानता का अधिकार (अनु. 14-18)

समानता के अधिकार से तात्पर्य है कि भारत भूमि पर निवास करने वाले सभी नागरिकों को समान अधिकार और समान अवसर प्राप्त है। देश में व्याप्त सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक असमानताओं को दूर करने के उद्देश्य से भारतीय संविधान में अनु. 14 से 18 के अन्तर्गत व्यवस्था की गई है।

अनु. 14 विधि के समक्ष समानता

विधि के समक्ष समानता का तात्पर्य यह है कि किसी भी व्यक्ति को कोई विशेष अधिकार नहीं प्राप्त होंगे अर्थात् कानून की दृष्टि से सभी समान है। विधि के समक्ष समानता शब्द ब्रिटिश संविधान से लिया गया है जिसे विधि का शासन (Rule of Law) भी कहा जाता है। विधि के शासन का अर्थ है, कि कोई भी व्यक्ति विधि के ऊपर नहीं है।

अपवाद

विधि के समक्ष समानता के सम्बन्ध में निम्नलिखित अपवाद भी स्वीकार किये गये है

  1. राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल अपने पद पर रहते हुए पद की शक्तियों का प्रयोग करने एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए . किये गये कार्यों का न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होंगे।
  2. राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल के विरूद्ध उसकी पदावधि के समय न्यायालय में किसी भी प्रकार की दाण्डिक (फौजदारी) कार्यवाही नहीं की जा सकती है।
  3. राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा व्यक्तिगत रूप से किये गये किसी कार्य (दीवानी) के विरूद्ध न्यायालय में कार्यवाही के लिए दो माह की पूर्व सूचना देना आवश्यक होगा (Art 361)।
  4. इसके अतिरिक्त मंत्री, सांसद, विधायक, न्यायाधीश आदि को भी विशेषाधिकार तथा उन्मुक्तियां प्रदान की गयी है।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय कानून के आधार पर विदेशी अतिथियों, राजदूतों, उच्चायुक्तों आदि को भी विशेषाधिकार प्रदान किया जा सकता है।

उपर्युक्त अपवादों के अतिरिक्त सरकार कानून बनाते समय व्यक्तियों में उनकी प्रकृति, परिस्थिति एवं योग्यता के आधार पर भेद कर सकती है।

  • अनु. 14 में उल्लिखित दूसरे उपवाक्य विधि के समान संरक्षण अपेक्षाकृत सकारात्मक संकल्पना है इसका अभिप्राय है कि समान लोगों में समान विधि होगी अर्थात् समान लोगों के साथ समान व्यवहार होगा। चूंकि व्यक्तियों की परिस्थितयाँ भिन्न-भिन्न होती है अतः विशेष परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के लिए राज्य अलग से कानून बना सकता है। विधि के समान संरक्षण (Protection of Law) शब्दावली अमेरिकी संविधान से लिया गया है।
  • अमेरिका में बिल आफ राइट प्रथम दस संशोधन द्वारा जोड़ा गया।
  • विधि के शासन (Rule of Law) को प्रक्रियात्मक न्याय भी कहा जाता है। विधि का शासन ब्रिटिश विद्वान डायसी द्वारा आधुनिक रूप से प्रतिपादित किया गया।

अनु. 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग व जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा

इस आधार पर दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में राज्य निधि से पारित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नान घाटों, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों के उपयोग प्रतिबन्ध के अधीन नहीं होगें।

राज्य अपनी जनता के कल्याण हेतु धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग व जन्मस्थान के अतिरिक्त भेदभाव कर सकती है इससे संविधान का उल्लंघन नहीं होगा। भारत एक कल्याणकारी राज्य होने के कारण सबका कल्याण सुनिश्चित करता है इसलिए आवश्यक हो जाता है कि अक्षम को भी सक्षम बनाया जाए।

अनु. 15(4)-राज्य सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबन्ध या आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है।

महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपबन्ध अनु. 15(3) जैसे०

  • महिला स्कूल
  • बच्चों के लिए कम किराया या मुफ्त किराया।
  • निःशुल्क शिक्षा।
  • शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण अनु. 15(5)से दिया जाता है।
  • अनु. 15(6) सामान्य वर्ग

अनु. 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता।

भारतीय संविधान में लोक नियोजन में समानता प्रदान की गई है। किन्तु सरकार पिछड़े हुए नागरिकों के किन्ही वर्ग के पक्ष में जिसका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों व पदों के लिए आरक्षण कर सकती है। [अनु.16(4)]

महत्वपूर्ण तथ्य अनु. 14,15 व 16 को मिलाकर समाजवाद की संकल्पना प्रकट होती है।

  • पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण- अनु.16(4)
  • पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक है, आर्थिक नहीं।
  • पिछड़े वर्गों के लिए प्रथम आयोग काका कालेलकर आयोग, जिसका गठन 1953 में हुआ।

पिछड़े वर्गों के लिए मण्डल आयोग का गठन 1977 में मोरार जी देसाई के शासन काल में हुआ था, जो प्रधानमंत्री वी. पी.सिंह के समय लागू (1989) हुआ।

  • OBC आयोग का गठन अनु. 340 के द्वारा किया जाता है।
  • ST के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान अनु. 335 में है।
  • SC, ST के लिए आयोग का गठन अनु. 338 द्वारा किया जाता है।
  • आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता एक भ्रम है।

अनु. 17 अस्पृश्यता का अंत

अस्पृश्यता से उपजी किसी भी प्रकार के भेदभाव को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दण्डनीय है। जन अधिकार सुरक्षा अधिनियम (1955) के तहत छुआछूत को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है। इसके तहत 6 माह का कारावास या 500रू. का दण्ड अथवा दोनों शामिल है। जो व्यक्ति इसके तहत् दोषी ठहराया जाए उसे चुनाव के लिए अयोग्य करार देने की व्यवस्था की गई है।

यह अधिनियम अपराध के तहत निम्नलिखित घोषणा करता है

  1. किसी व्यक्ति को सार्वजनिक, पूजा स्थल में प्रवेश से रोकना या कहीं पर पूजा से रोकना।
  2. परम्परागत, धार्मिक, दार्शनिक या अन्य आधार पर छुआ-छूत को न्यायोचित ठहराना।
  3. किसी दुकान, होटल या सार्वजनिक मनोरंजन स्थल के प्रयोग को प्रतिबन्धित करना।
  4. छुआ-छूत के आधार पर अनुसूचित जाति के किसी व्यक्ति को बेईज्जत करना।
  5. अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थाओं या हास्टल में सार्वजनिक हित के लिए प्रवेश से रोकना।
  6. प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से छुआ-छूत को मानना।
  7. किसी व्यक्ति द्वारा सामान बिक्री या ठेला लगाने को नकारना।

अनु. 18 उपाधियों का अंत

  1. यह प्रतिबन्ध केवल राज्य के विरूद्ध है अन्य सार्वजनिक संस्थाओं जैसे विश्वविद्यालयों अपने नेताओं या गुरूजनों आदि का सम्मान करने के लिए उन्हें उपाधियाँ या सम्मान दे सकता है।
  2. राज्य को सेना या विद्या सम्बन्धी सम्मान देने से नहीं रोका गया है। यद्यपि उसका उपयोग उपाधि के रूप में किया जा सकता है।
  3. राज्य को सामाजिक सेवा के लिए कोई सम्मान या पुरस्कार देने से मना नहीं किया गया है। इस सम्मान का उपाधि के रूप में अर्थात् अपने नाम के साथ जोड़कर उपयोग नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार भारत रत्न या पदम विभूषण का प्राप्त करता उपाधि के रूप में प्रयोग नहीं कर सकता है।

महत्वपूर्ण तथ्य

1954 में भारत सरकार ने निम्न 4 पुरस्कार प्रारम्भ किए

  1. भारत रत्न
  2. पद्म विभूषण
  3. पद्म भूषण
  4. पद्म श्री

26वें संविधान संशोधन 1971 द्वारा प्रीतिपर्स (रजवाड़ा) व्यवस्था समाप्त कर दिया गया।

राष्ट्रपति की अनुमति के बिना कोई भारतीय नागरिक विदेशी पुरस्कार ग्रहण नहीं कर सकता है।

(2.) स्वतंत्रता का अधिकार (अनु. 19-22)

अनु. 19-वाक् स्वतंत्रता आदि कुछ अधिकारों का संरक्षण। मूल संविधान में अनु. 19(1) में सात स्वतंत्रताएँ थी किन्तु उनमें से एक अर्थात् सम्पत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन का अधिकार 44वें संविधान संशोधन द्वारा निकाल दिया गया है। अब इस अनुच्छेद के अन्तर्गत भारत के नागरिकों को निम्नलिखित 6 स्वतंत्रताएँ प्राप्त हैं

19(1-क)- वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

इसके अन्तर्गत बोलने की आजादी, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया, समाचार-पत्र, प्रेस, विज्ञापन, रेडियो, दूरदर्शन चैनल, सिनेमा, नुक्कड़ नाटक, शान्तिपूर्ण प्रदर्शन या धरना (हड़ताल नहीं), फैशन, ध्वज फहराना, सूचना का अधिकार (2005 से) मौन रहना इत्यादि।

(1) वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतान्त्रिक देश की आधारशिला होता है |

(2) * विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निम्न प्रमुख आधारों पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है

  1. मानहानि
  2. न्यायालय का अपमान
  3.  शिष्टाचार
  4. लोक व्यवस्था
  5. अपराध उद्दीपन
  6. अलगाववाद का प्रचार
  7. राज्य की सुरक्षा एवं भारत की सम्प्रभुता व अखण्डता।
  8. विदेशी राज्यों के साथ मैत्री पूर्ण सम्बन्ध।

19(1-ख)- शान्तिपूर्ण निरायुद्ध सम्मेलन ।

19(1-ग)- संगम, संघ या सहकारी समितियाँ बनाने की स्वतंत्रता।

19(1-घ)- भारत में अबाध संचरण।

19(1-ड.)- भारत में कहीं भी निवास की स्वतंत्रता।  (प्रदेश सरकार अपने यहाँ आदिवासी की रक्षा के लिए जमीन खरीदने पर रोक लगा सकती है ।)

19(1-च)- सम्पत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन का अधिकार (44वें संविधान संशोधन द्वारा इसे निकाल दिया गया है।)

19(1-छ)- आजीविका, व्यापार, करोबार की स्वतंत्रता। (इसमे फुटपाथ पर दुकान लगाना भी सम्मिलित है ।) उपर्युक्त सभी स्वतंत्रताओं पर युक्तियुक्त निर्बन्धन लगाया जा सकता है ।

युक्तियुक्त निर्बन्धन की अवधारणाः

युक्तियुक्त निर्बन्धन की अवधारणा इस तथ्य पर आधारित है कि किसी भी देश में नागरिकों के असीमित अधिकार नहीं हो सकते। इसके अलावा नागरिकों को ऐसे अधिकार भी नहीं प्रदान किए जा सकते, जो पूरे समाज के लिए अहितकर हो। वास्तव में विधि द्वारा नियन्त्रित स्वतंत्रता का ही अस्तित्व सम्भव है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए संविधान के अनु. 19(2–6) के तहत राज्य को भारत की संप्रभुता और अखण्डता की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार आदि हितों की रक्षा के लिए निर्बन्ध लगाने की शक्ति दी गई है। उच्चतम न्यायालय ने निर्बन्धनों की युक्ति-युक्तता की जाँच के लिए निम्नलिखित सामान्य नियम निर्धारित किए हैं

  1. युक्तियुक्त का कोई निश्चित मापदण्ड निर्धारित नहीं किया जा सकता है। इसका निर्धारण जिस अधिकार का उल्लंघन हुआ उसकी प्रकृति, बुराई की मात्रा और उसे दूर करने की अनिवार्यता एवं समकालीन परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है।
  2. कोई भी निर्बन्धन युक्तियुक्त है कि नहीं यह निर्णय देने की शक्ति न्यायालय को है; विधान मण्डल को नहीं।
  3. राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में शामिल उद्देश्यों को पाने के लिए लगाए गए निर्बन्धनों को युक्ति-युक्त माना जा सकता है।
  4. न्यायालय का काम सिर्फ निर्बन्धनों की युक्ति-युक्तता का निर्धारण करना है। विधि की युक्ति–युक्तता का निर्धारण करना नहीं।

नोट– मूल अधिकार नागरिकों को सशर्त प्रदान किया गया है।

अनु. 20 अपराधों के दोष सिद्ध के सम्बन्ध में संरक्षण

(A) किसी व्यक्ति को किसी अपराध (कार्येतर विधि से संरक्षण) के लिए तब तक दोषी नहीं ठहराया जाएगा जब तक कि उसने उस सम लाग किसी विधि का उल्लंघन न किया हो।

(B) किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक दण्डित नहीं किया जाएगा। यह व्यवस्था अमेरिका से ली गयी है। (दोहरे दण्ड से संरक्षण)

(C) किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति(अभियुक्त) को स्वयं अपने विरूद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। (आत्म अभिसंसन के विरूद्ध संरक्षण)

अनु. 21 प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से संरक्षण

इस अनु. में जीवन के अधिकार को मान्यता प्रदान की गई है इसमें कहा गया है किकिसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। जीने के अधिकार को शारीरिक बन्धनों में ही नहीं बाँधा गया है; बल्कि इसमें मानवीय गरिमा और इससे जुड़े अन्य पहलुओं को रखा गया है।

नोट- 44 वें संविधान संशोधन द्वारा प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को और अधिक महत्व दिया गया, अब आपातकाल में भी प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता को समाप्त नहीं किया जा सकता है। वर्तमान समय में प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकारों को शामिल किया गया हैं

  1. विदेश जाने या विदेश भ्रमण का अधिकार।
  2. निःशुल्क विधिक सहायता का अधिकार।
  3. पुलिस की क्रूरता के विरूद्ध अधिकार ।
  4. मानवीय गरिमा का अधिकार ।
  5. दोष मुक्ति के बाद अवैध रूप से कारागार में निरूद्ध रखने पर प्रतिकार का अधिकार ।
  6. यात्रा का अधिकार।
  7. एकांतता का अधिकार (फोन टेपिंग न करना।)
  8. निरूद्ध व्यक्ति द्वारा अपने विधिक सलाहकार तथा कुटुम्ब के सदस्यों और मित्रों के साथ मुलाकात करने का अधिकार।
  9. अपील करने का कानूनी अधिकार ।
  10. जीविकोपार्जन का अधिकार।
  11. आवास का अधिकार।
  12. शिक्षा का अधिकार ।

नोट-(1) 86वें संविधान संशोधन 2002 द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार को अनु. 21(A) में समाहित कर मूलाधिकार बना दिया गया है। (2) जीवन जीने के अधिकार में जीने का अधिकार है मरने का नहीं इसलिए आत्महत्या अपराध है।

अनु. 22 कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण

संविधान के अनु. 22 में गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कुछ व्यवस्थाएँ दी गई है, जो निम्न है

(1) किसी व्यक्ति को जो गिरफ्तार किया गया है गिरफ्तारी के कारणों से यथा शीघ्र अवगत कराए बिना संरक्षण में नहीं रखा जाएगा और अपनी रूचि के विधि व्यवसायी से परामर्श करने तथा प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा।

(2) गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्टेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोडकर ऐसी गिरफ्तारी से 24 घण्टे की अवधि में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा और ऐसे व्यक्ति को बिना मजिस्ट्रेट की आज्ञा के 24 घंटे से अधिक अवधि के लिए हवालात में बंद नहीं किया जा सकता है।

निवारक निरोध से सम्बन्धित प्रावधान

(A) निवारक निरोध के अधीन गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को यह अधिकार तथा संरक्षण नहीं प्रदान किया जाएगा, जो । सामान्य विधि के अन्तर्गत गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को प्राप्त होता है।

(B) निवारक निरोध के अधीन गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को दो माह तक रखा जा सकता है। यदि इससे अधिक समय तक रखने की आवश्यकता हुई तो सलाहकार बोर्ड की अनुमति आवश्यक होती है। बोर्ड निवारक निरोध के पर्याप्त कारण के आधार पर मंजूरी प्रदान करती है।

(C) निवारक निरोध के अन्तर्गत गिरफ्तार व्यक्ति को उसके गिरफ्तारी की तत्काल सूचना दे दी जाती है।

(D) हिरासत का आधार सम्बन्धित व्यक्ति को बताया जाना चाहिए। हालांकि सार्वजनिक हितों के विरुद्ध इसे बताना जरूरी नहीं है।

(3.) शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनु. 23-24)

अनु. 23- मानव के दुर्व्यापार और बालात् श्रम पर रोक

मानव का दुर्व्यापार (वेश्यावृत्ति, बंधुआ मजदूर) और बेगार तथा इसी प्रकार अन्य जबरदस्ती लिया जाने वाला श्रम प्रतिसिद्ध किया जाता है और इस उपबन्ध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा, किन्तु राज्य सार्वजनिक कार्यों के लिए व्यक्तियों से अनिवार्य सेवा ले सकती है और राज्य ऐसी सेवा आरोपित करते समय व्यक्तियों के बीच धर्म, मूल वंश, जाति वर्ग के आधार पर भेद नहीं करेगी।

नोट- बन्धुआ मजदूर उन्मूलन अधिनियम-1975

अनु. 24 कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिशेध

14वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखानों या खानों में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा।

नोट- बाल श्रम समाधान के रूप में

  1. अनिवार्य शिक्षा
  2. मिड-डे-मिल योजना
  3. आँगनबाड़ी कार्यक्रम
  4. रोजगार गारण्टी कार्यक्रम ।

(4.) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनु. 25-28)

संविधान के अधीन भारत पंथनिरपेक्ष राज्य है अर्थात् ऐसा राज्य जो प्रत्येक धर्म व सम्प्रदाय के प्रति समान दृष्टि रखता है। राज्य | कोई धर्म न अपनाते हुए भी सभी धर्मों के विश्वासों को फलने-फूलने का समान अवसर प्रदान करेगा।

अनु. 25- अंतःकरण को और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता। [धर्मान्तरण की स्वतंत्रता (25-1)]

नोट– यदि कोई व्यक्ति या संस्था प्रलोभन द्वारा धर्मान्तरण करता है तो दण्ड का भागी होगा।

अनु. 26- धार्मिक कार्यों में प्रबन्ध की स्वतंत्रता।

अनु. 27- किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के बारें में स्वतंत्रता।

किसी भी व्यक्ति को ऐसा कर या चन्दा देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा, जिस धन को किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक सम्प्रदाय की अभिवृद्धि या प्रचार में लगाया जाए।

अनु. 28- कुछ शिक्षण संस्थओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता। पूर्णतः राज्य निधि से पोषित किसी शिक्षण संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।

(5.) संस्कृति तथा शिक्षा का अधिकार (अनु. 29-30)

भारत विभिन्नताओं में एकता वाला विशाल देश है। इसके निवासियों का धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा एवं लिपियाँ आदि भिन्न-भिन्न है तथा ये लोग अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करते है। इसलिए आवश्यक हो जाता है कि संस्कृति भाषा एवं लिपि की विभिन्नता को बनाया रखा जा सके। जहाँ तक अल्पसंख्यक वर्गों का सम्बन्ध है उनकी भाषा का परिरक्षण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

अल्पसंख्यकों का निर्धारण-

देश में अल्पसंख्यकों के निर्धारण के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय ने अपनी व्याख्या में कहा है कि अल्पसंख्यकों का निर्धारण अलग-अलग राज्य में उनकी जनसंख्या में अलग-अलग समुदायों के अनुपात के आधार पर किया जाएगा। चूंकि भारत में राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर हुआ है; इसलिए अल्पसंख्यकों का निर्धारण देश स्तर पर नहीं किया जा सकता है। किसी भी समुदाय की अल्पसंख्यक के रूप में पहचान सम्बन्धित राज्य में उनके जनसंख्या के अनुपात के आधार पर की जाएगी।

केन्द्र सरकार ने 5 समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित किया है

1. मुस्लिम 2. ईसाई 3.सिख 4. बौद्ध 5.पारसी

नोट– सर्वोच्च न्यायालय ने जैन धर्म को मनाने के कारण हिन्दू माना, इसलिए अल्पसंख्यक की मान्यता रद्द कर दी है।

अनुच्छेद 29 –भारत के राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के प्रत्येक ऐसे वर्ग को जिसकी अपनी विशेष भाषा लिपि या संस्कृति है; उसे बनाए रखने का अधिकार होगा। । राज्य द्वारा पोषित या राज्यनिधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षण संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता है।

अनुच्छेद 30– शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार | धर्म या भाषा के आधार पर सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।

(6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनु. 32 )

संविधान के अनु. 32 में इन संवैधानिक उपचारों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। भारतीय संविधान द्वारा मूल अधिकारों को कार्यपालिका और विधायिका दोनों की कार्यवाही के विरूद्ध प्रत्याभूत किया गया है। संविधान में मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए 5 प्रकार के लेख रीट निकालने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को प्रदान की गई है, इन्हीं विशेषताओं के कारण डॉ. अम्बेडकर ने इस अधिकार को संविधान की आत्मा कहा है।

सम्पत्ति का अधिकार (अनु. 31)

44वें संविधान संशोधन द्वारा अनु. 19(1-च) का निरसन कर दिया गया तथा अनु. 31 (1) को भाग 3 से स्थानान्तरित कर एक पृथक अनु. 300 (क) बना दिया गया है। यह इस प्रकार है

किसी व्यक्ति को उसकी सम्पत्ति से विधि के प्राधिकार से ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। इसका तात्पर्य है कि यदि किसी व्यक्ति की सम्पत्ति किसी लोक अधिकारी द्वारा बिना विधिक प्राधिकार के ली जाती है तो अनु. 32 के अधीन सीधे उच्चतम न्यायालय से न्याय नहीं मिलेगा; बल्कि साधारण वाद द्वारा उपचार की खोज करनी होगी, क्योंकि सम्पत्ति का अधिकार अब मूलाधिकार नहीं रहा।

नोट– सम्पत्ति का अधिकार से मोरारजी देसाई के शासन काल में निकाला गया। सम्पत्ति का अधिकार अब नहीं बल्कि संवैधानिक अधिकार है:10 जुलाई, 2008 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा कि सम्पत्ति रखना एक संवैधानिक अधिकार है। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि सम्पत्ति रखने का अधिकार मौलिक अधिकार भले ही न हो पर संवैधानिक अधिकार जरूर है, इस कारण से यह मानवीय अधिकार भी है।

नोट- 44वें संविधान संशोधन द्वारा सम्पत्ति के मूल अधिकार को कानूनी अधिकार बना दिया गया था, किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय (10 जुलाई, 2008) से सम्पत्ति का अधिकार, अव संवैधानिक अधिकार हो गया है। संविधान में मूल अधिकारों की घोषणा निरर्थक है जब तक कि उसका प्रवर्तन कराने के लिए संवैधानिक उपचार न हो।

नोट- भारतीय संविधान की आत्मा प्रस्तावना में निवास करती है।

  1. भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार कितने हैं?

    वर्तमान में भारतीय संविधान में छह मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। प्रारंभ में मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार दिए गए थे। 42 वें संविधान संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से कानूनी अधिकार बना दिया गया है।

  2. मौलिक अधिकार कब लागू हुआ?

    26 जनवरी 1950 को मौलिक अधिकार लागू हो गए थे। क्योंकि भारतीय संविधान में 26 जनवरी 1950 को सारे अनुच्छेद प्रभावी रूप से लागू कर दिए गए थे। मौलिक अधिकारों का निलंबन केवल आपातकाल में राष्ट्रपति द्वारा किया जा सकता है।

  3. मौलिक अधिकार कहाँ से लिया गया है?

    मौलिक अधिकारों को भारतीय संविधान में अमेरिकी संविधान से लिया गया है.

  4. 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान में कुल कितने मौलिक अधिकार थे?

    26 जनवरी 1950 को मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे। परंतु वर्तमान में 6 मौलिक अधिकार है। क्योंकि 86 वें संविधान संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया है।

Leave a Comment