मथुरा मूर्तिकला शैली विशेषताएं बताइये ?

 

उत्तर– मौर्योत्तर काल में मथुरा प्रमुख धार्मिक एवं व्यापारिक केंद्र था। यह कुषाणों की द्वितीय राजधानी थी। मथुरा मूर्तिकला शैली पूर्णतया स्वदेशी शैली है ।मौर्योत्तर काल में विकसित हुई इस मूर्ति निर्माण शैली में विभिन्न स्थानीय परंपराओं का सम्मिश्रण दृष्टिगत होता है |जिसमें बुद्ध की विलक्षण प्रतिमाएं निर्मित हुई। मथुरा शैली में मुख्यतः लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग किया गया। इसकी विषय – वस्तु का संबंध बौद्ध ,जैन एवं हिंदू तीनों धर्मों से हैं लेकिन अधिकांश मूर्तियां बौद्ध एवं जैन धर्म पर केंद्रित है।

मथुरा कला के प्रमुख केंद्र मथुरा के अतिरिक्त अहिछत्र, श्रावस्ती, वाराणसी कौशांबी आदि थे। मथुरा कला शैली के अंतर्गत बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियां प्राप्त हुई है। जिसमें बुध का आदर्शवादी रूपांकन ,अधिकतर प्रसन्नचित अवस्था, मुंडा हुआ सिर विभिन्न मुद्राओं में पद्मासन आदि में दिखाया गया है। बुद्ध की विभिन्न अवस्थाओं के साथ हिंदू धर्म से संबंधित सूर्य प्रतिमा, चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा ,संकर्षण मूर्ति आदि मथुरा शैली में निर्मित हैं । मथुरा कला शैली में गहन सामाजिक अवस्थाओं- श्रंगार, नृत्य, संगीत, मद्यपान आदि भावों को भी दर्शाया गया है।