6 मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं

6 मौलिक अधिकार कौन कौन से हैं || 7 मौलिक अधिकार कौन कौन से हैं || मौलिक अधिकार कितने प्रकार के होते हैं || मौलिक अधिकार किस देश से लिया गया है

मूल अधिकार एक लोकतांत्रिक देश में व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक होता है, किसी भी कल्याणकारी राज्य की आधारशिला ये मूल अधिकार ही है। एक तरफ तो ये अधिकार जनता को नैतिक बल प्रदान करते है, दूसरी ओर व्यवस्थापिका और कार्यपालिका शक्तियों पर प्रतिबन्ध लगाते हैं। भारतीय संविधान में शुरुआत में 7 मौलिक अधिकार दिए गए थे परंतु वर्तमान स्थिति में 6 मौलिक अधिकार है

व्यक्ति के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक विकास के लिए मूल अधिकार अनिवार्य है। व्यक्ति एवं समुदाय विशेष कर शोषण से सुरक्षा प्रदान करने में मूल अधिकारों की अहम भूमिका है। मूल अधिकार ही बच्चों, महिलाओं एवं समाज के कमजोर वर्गों का कल्याण सुनिश्चित करते हैं तथा सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने में सहायक होते हैं।

मूल अधिकार द्वारा जनता में समानता एवं स्वतंत्रता स्थापित होती है। अल्पसंख्यकों में सुरक्षा की भावना जागृत होती है तथा उस देश के धर्म निरपेक्ष के स्वरूप की रक्षा होती है। यदि सरकार या अन्य इन अधिकारों का अतिक्रमण करता है तो प्रभावित व्यक्ति सीधे सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय की शरण ले सकता है।

नोट- मूल अधिकार नागरिकों को विधायिका, कार्यपालिका और व्यक्ति के विरूद्ध प्राप्त है। जिसकों अनु. 32 से न्यायालय से संरक्षण प्राप्त है।

6 मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं
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6 मौलिक अधिकार कौन-कौन से हैं

  1. समता का अधिकार (समानता का अधिकार)
  2. स्‍वतंत्रता का अधिकार
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  4. धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार
  5. संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार

(1) समानता का अधिकार (अनु. 14-18)

समानता के अधिकार से तात्पर्य है कि भारत भूमि पर निवास करने वाले सभी नागरिकों को समान अधिकार और समान अवसर प्राप्त है। देश में व्याप्त सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक असमानताओं को दूर करने के उद्देश्य से भारतीय संविधान में अनु. 14 से 18 के अन्तर्गत व्यवस्था की गई है।

अनु. 14 विधि के समक्ष समानता

विधि के समक्ष समानता का तात्पर्य यह है कि किसी भी व्यक्ति को कोई विशेष अधिकार नहीं प्राप्त होंगे अर्थात् कानून की दृष्टि से सभी समान है। विधि के समक्ष समानता शब्द ब्रिटिश संविधान से लिया गया है जिसे विधि का शासन (Rule of Law) भी कहा जाता है। विधि के शासन का अर्थ है, कि कोई भी व्यक्ति विधि के ऊपर नहीं है।

अपवाद

विधि के समक्ष समानता के सम्बन्ध में निम्नलिखित अपवाद भी स्वीकार किये गये है

  1. राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल अपने पद पर रहते हुए पद की शक्तियों का प्रयोग करने एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए . किये गये कार्यों का न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं होंगे।
  2. राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल के विरूद्ध उसकी पदावधि के समय न्यायालय में किसी भी प्रकार की दाण्डिक (फौजदारी) कार्यवाही नहीं की जा सकती है।
  3. राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा व्यक्तिगत रूप से किये गये किसी कार्य (दीवानी) के विरूद्ध न्यायालय में कार्यवाही के लिए दो माह की पूर्व सूचना देना आवश्यक होगा (Art 361)।
  4. इसके अतिरिक्त मंत्री, सांसद, विधायक, न्यायाधीश आदि को भी विशेषाधिकार तथा उन्मुक्तियां प्रदान की गयी है।
  5. अन्तर्राष्ट्रीय कानून के आधार पर विदेशी अतिथियों, राजदूतों, उच्चायुक्तों आदि को भी विशेषाधिकार प्रदान किया जा सकता है।

उपर्युक्त अपवादों के अतिरिक्त सरकार कानून बनाते समय व्यक्तियों में उनकी प्रकृति, परिस्थिति एवं योग्यता के आधार पर भेद कर सकती है।

  • अनु. 14 में उल्लिखित दूसरे उपवाक्य विधि के समान संरक्षण अपेक्षाकृत सकारात्मक संकल्पना है इसका अभिप्राय है कि समान लोगों में समान विधि होगी अर्थात् समान लोगों के साथ समान व्यवहार होगा। चूंकि व्यक्तियों की परिस्थितयाँ भिन्न-भिन्न होती है अतः विशेष परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के लिए राज्य अलग से कानून बना सकता है। विधि के समान संरक्षण (Protection of Law) शब्दावली अमेरिकी संविधान से लिया गया है।
  • अमेरिका में बिल आफ राइट प्रथम दस संशोधन द्वारा जोड़ा गया।
  • विधि के शासन (Rule of Law) को प्रक्रियात्मक न्याय भी कहा जाता है। विधि का शासन ब्रिटिश विद्वान डायसी द्वारा आधुनिक रूप से प्रतिपादित किया गया।

अनु. 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग व जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा

इस आधार पर दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों और सार्वजनिक मनोरंजन के स्थानों में राज्य निधि से पारित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाबों, स्नान घाटों, सड़कों और सार्वजनिक स्थलों के उपयोग प्रतिबन्ध के अधीन नहीं होगें।

राज्य अपनी जनता के कल्याण हेतु धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग व जन्मस्थान के अतिरिक्त भेदभाव कर सकती है इससे संविधान का उल्लंघन नहीं होगा। भारत एक कल्याणकारी राज्य होने के कारण सबका कल्याण सुनिश्चित करता है इसलिए आवश्यक हो जाता है कि अक्षम को भी सक्षम बनाया जाए।

अनु. 15(4)-राज्य सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्हीं वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबन्ध या आरक्षण की व्यवस्था कर सकती है।

महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष उपबन्ध अनु. 15(3) जैसे०

  • महिला स्कूल
  • बच्चों के लिए कम किराया या मुफ्त किराया।
  • निःशुल्क शिक्षा।
  • शिक्षण संस्थाओं में आरक्षण अनु. 15(5)से दिया जाता है।
  • अनु. 15(6) सामान्य वर्ग

अनु. 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता।

भारतीय संविधान में लोक नियोजन में समानता प्रदान की गई है। किन्तु सरकार पिछड़े हुए नागरिकों के किन्ही वर्ग के पक्ष में जिसका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों व पदों के लिए आरक्षण कर सकती है। [अनु.16(4)]

महत्वपूर्ण तथ्य अनु. 14,15 व 16 को मिलाकर समाजवाद की संकल्पना प्रकट होती है।

  • पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण- अनु.16(4)
  • पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक है, आर्थिक नहीं।
  • पिछड़े वर्गों के लिए प्रथम आयोग काका कालेलकर आयोग, जिसका गठन 1953 में हुआ।

पिछड़े वर्गों के लिए मण्डल आयोग का गठन 1977 में मोरार जी देसाई के शासन काल में हुआ था, जो प्रधानमंत्री वी. पी.सिंह के समय लागू (1989) हुआ।

  • OBC आयोग का गठन अनु. 340 के द्वारा किया जाता है।
  • ST के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान अनु. 335 में है।
  • SC, ST के लिए आयोग का गठन अनु. 338 द्वारा किया जाता है।
  • आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता एक भ्रम है।

अनु. 17 अस्पृश्यता का अंत

अस्पृश्यता से उपजी किसी भी प्रकार के भेदभाव को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दण्डनीय है। जन अधिकार सुरक्षा अधिनियम (1955) के तहत छुआछूत को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है। इसके तहत 6 माह का कारावास या 500रू. का दण्ड अथवा दोनों शामिल है। जो व्यक्ति इसके तहत् दोषी ठहराया जाए उसे चुनाव के लिए अयोग्य करार देने की व्यवस्था की गई है।

यह अधिनियम अपराध के तहत निम्नलिखित घोषणा करता है

  1. किसी व्यक्ति को सार्वजनिक, पूजा स्थल में प्रवेश से रोकना या कहीं पर पूजा से रोकना।
  2. परम्परागत, धार्मिक, दार्शनिक या अन्य आधार पर छुआ-छूत को न्यायोचित ठहराना।
  3. किसी दुकान, होटल या सार्वजनिक मनोरंजन स्थल के प्रयोग को प्रतिबन्धित करना।
  4. छुआ-छूत के आधार पर अनुसूचित जाति के किसी व्यक्ति को बेईज्जत करना।
  5. अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थाओं या हास्टल में सार्वजनिक हित के लिए प्रवेश से रोकना।
  6. प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से छुआ-छूत को मानना।
  7. किसी व्यक्ति द्वारा सामान बिक्री या ठेला लगाने को नकारना।

अनु. 18 उपाधियों का अंत

  1. यह प्रतिबन्ध केवल राज्य के विरूद्ध है अन्य सार्वजनिक संस्थाओं जैसे विश्वविद्यालयों अपने नेताओं या गुरूजनों आदि का सम्मान करने के लिए उन्हें उपाधियाँ या सम्मान दे सकता है।
  2. राज्य को सेना या विद्या सम्बन्धी सम्मान देने से नहीं रोका गया है। यद्यपि उसका उपयोग उपाधि के रूप में किया जा सकता है।
  3. राज्य को सामाजिक सेवा के लिए कोई सम्मान या पुरस्कार देने से मना नहीं किया गया है। इस सम्मान का उपाधि के रूप में अर्थात् अपने नाम के साथ जोड़कर उपयोग नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार भारत रत्न या पदम विभूषण का प्राप्त करता उपाधि के रूप में प्रयोग नहीं कर सकता है।

महत्वपूर्ण तथ्य

1954 में भारत सरकार ने निम्न 4 पुरस्कार प्रारम्भ किए

  1. भारत रत्न
  2. पद्म विभूषण
  3. पद्म भूषण
  4. पद्म श्री

26वें संविधान संशोधन 1971 द्वारा प्रीतिपर्स (रजवाड़ा) व्यवस्था समाप्त कर दिया गया।

राष्ट्रपति की अनुमति के बिना कोई भारतीय नागरिक विदेशी पुरस्कार ग्रहण नहीं कर सकता है।

(2.) स्वतंत्रता का अधिकार (अनु. 19-22)

अनु. 19-वाक् स्वतंत्रता आदि कुछ अधिकारों का संरक्षण। मूल संविधान में अनु. 19(1) में सात स्वतंत्रताएँ थी किन्तु उनमें से एक अर्थात् सम्पत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन का अधिकार 44वें संविधान संशोधन द्वारा निकाल दिया गया है। अब इस अनुच्छेद के अन्तर्गत भारत के नागरिकों को निम्नलिखित 6 स्वतंत्रताएँ प्राप्त हैं

19(1-क)- वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

इसके अन्तर्गत बोलने की आजादी, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया, समाचार-पत्र, प्रेस, विज्ञापन, रेडियो, दूरदर्शन चैनल, सिनेमा, नुक्कड़ नाटक, शान्तिपूर्ण प्रदर्शन या धरना (हड़ताल नहीं), फैशन, ध्वज फहराना, सूचना का अधिकार (2005 से) मौन रहना इत्यादि।

(1) वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतान्त्रिक देश की आधारशिला होता है |

(2) * विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निम्न प्रमुख आधारों पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है

  1. मानहानि
  2. न्यायालय का अपमान
  3.  शिष्टाचार
  4. लोक व्यवस्था
  5. अपराध उद्दीपन
  6. अलगाववाद का प्रचार
  7. राज्य की सुरक्षा एवं भारत की सम्प्रभुता व अखण्डता।
  8. विदेशी राज्यों के साथ मैत्री पूर्ण सम्बन्ध।

19(1-ख)- शान्तिपूर्ण निरायुद्ध सम्मेलन ।

19(1-ग)- संगम, संघ या सहकारी समितियाँ बनाने की स्वतंत्रता।

19(1-घ)- भारत में अबाध संचरण।

19(1-ड.)- भारत में कहीं भी निवास की स्वतंत्रता।  (प्रदेश सरकार अपने यहाँ आदिवासी की रक्षा के लिए जमीन खरीदने पर रोक लगा सकती है ।)

19(1-च)- सम्पत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन का अधिकार (44वें संविधान संशोधन द्वारा इसे निकाल दिया गया है।)

19(1-छ)- आजीविका, व्यापार, करोबार की स्वतंत्रता। (इसमे फुटपाथ पर दुकान लगाना भी सम्मिलित है ।) उपर्युक्त सभी स्वतंत्रताओं पर युक्तियुक्त निर्बन्धन लगाया जा सकता है ।

युक्तियुक्त निर्बन्धन की अवधारणाः

युक्तियुक्त निर्बन्धन की अवधारणा इस तथ्य पर आधारित है कि किसी भी देश में नागरिकों के असीमित अधिकार नहीं हो सकते। इसके अलावा नागरिकों को ऐसे अधिकार भी नहीं प्रदान किए जा सकते, जो पूरे समाज के लिए अहितकर हो। वास्तव में विधि द्वारा नियन्त्रित स्वतंत्रता का ही अस्तित्व सम्भव है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए संविधान के अनु. 19(2–6) के तहत राज्य को भारत की संप्रभुता और अखण्डता की सुरक्षा, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार आदि हितों की रक्षा के लिए निर्बन्ध लगाने की शक्ति दी गई है। उच्चतम न्यायालय ने निर्बन्धनों की युक्ति-युक्तता की जाँच के लिए निम्नलिखित सामान्य नियम निर्धारित किए हैं

  1. युक्तियुक्त का कोई निश्चित मापदण्ड निर्धारित नहीं किया जा सकता है। इसका निर्धारण जिस अधिकार का उल्लंघन हुआ उसकी प्रकृति, बुराई की मात्रा और उसे दूर करने की अनिवार्यता एवं समकालीन परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है।
  2. कोई भी निर्बन्धन युक्तियुक्त है कि नहीं यह निर्णय देने की शक्ति न्यायालय को है; विधान मण्डल को नहीं।
  3. राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में शामिल उद्देश्यों को पाने के लिए लगाए गए निर्बन्धनों को युक्ति-युक्त माना जा सकता है।
  4. न्यायालय का काम सिर्फ निर्बन्धनों की युक्ति-युक्तता का निर्धारण करना है। विधि की युक्ति–युक्तता का निर्धारण करना नहीं।

नोट– मूल अधिकार नागरिकों को सशर्त प्रदान किया गया है।

अनु. 20 अपराधों के दोष सिद्ध के सम्बन्ध में संरक्षण

(A) किसी व्यक्ति को किसी अपराध (कार्येतर विधि से संरक्षण) के लिए तब तक दोषी नहीं ठहराया जाएगा जब तक कि उसने उस सम लाग किसी विधि का उल्लंघन न किया हो।

(B) किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक दण्डित नहीं किया जाएगा। यह व्यवस्था अमेरिका से ली गयी है। (दोहरे दण्ड से संरक्षण)

(C) किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति(अभियुक्त) को स्वयं अपने विरूद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। (आत्म अभिसंसन के विरूद्ध संरक्षण)

अनु. 21 प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से संरक्षण

इस अनु. में जीवन के अधिकार को मान्यता प्रदान की गई है इसमें कहा गया है किकिसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। जीने के अधिकार को शारीरिक बन्धनों में ही नहीं बाँधा गया है; बल्कि इसमें मानवीय गरिमा और इससे जुड़े अन्य पहलुओं को रखा गया है।

नोट- 44 वें संविधान संशोधन द्वारा प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को और अधिक महत्व दिया गया, अब आपातकाल में भी प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता को समाप्त नहीं किया जा सकता है। वर्तमान समय में प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता के अन्तर्गत निम्नलिखित अधिकारों को शामिल किया गया हैं

  1. विदेश जाने या विदेश भ्रमण का अधिकार।
  2. निःशुल्क विधिक सहायता का अधिकार।
  3. पुलिस की क्रूरता के विरूद्ध अधिकार ।
  4. मानवीय गरिमा का अधिकार ।
  5. दोष मुक्ति के बाद अवैध रूप से कारागार में निरूद्ध रखने पर प्रतिकार का अधिकार ।
  6. यात्रा का अधिकार।
  7. एकांतता का अधिकार (फोन टेपिंग न करना।)
  8. निरूद्ध व्यक्ति द्वारा अपने विधिक सलाहकार तथा कुटुम्ब के सदस्यों और मित्रों के साथ मुलाकात करने का अधिकार।
  9. अपील करने का कानूनी अधिकार ।
  10. जीविकोपार्जन का अधिकार।
  11. आवास का अधिकार।
  12. शिक्षा का अधिकार ।

नोट-(1) 86वें संविधान संशोधन 2002 द्वारा 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार को अनु. 21(A) में समाहित कर मूलाधिकार बना दिया गया है। (2) जीवन जीने के अधिकार में जीने का अधिकार है मरने का नहीं इसलिए आत्महत्या अपराध है।

अनु. 22 कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण

संविधान के अनु. 22 में गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए कुछ व्यवस्थाएँ दी गई है, जो निम्न है

(1) किसी व्यक्ति को जो गिरफ्तार किया गया है गिरफ्तारी के कारणों से यथा शीघ्र अवगत कराए बिना संरक्षण में नहीं रखा जाएगा और अपनी रूचि के विधि व्यवसायी से परामर्श करने तथा प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा।

(2) गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्टेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोडकर ऐसी गिरफ्तारी से 24 घण्टे की अवधि में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा और ऐसे व्यक्ति को बिना मजिस्ट्रेट की आज्ञा के 24 घंटे से अधिक अवधि के लिए हवालात में बंद नहीं किया जा सकता है।

निवारक निरोध से सम्बन्धित प्रावधान

(A) निवारक निरोध के अधीन गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को यह अधिकार तथा संरक्षण नहीं प्रदान किया जाएगा, जो । सामान्य विधि के अन्तर्गत गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को प्राप्त होता है।

(B) निवारक निरोध के अधीन गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को दो माह तक रखा जा सकता है। यदि इससे अधिक समय तक रखने की आवश्यकता हुई तो सलाहकार बोर्ड की अनुमति आवश्यक होती है। बोर्ड निवारक निरोध के पर्याप्त कारण के आधार पर मंजूरी प्रदान करती है।

(C) निवारक निरोध के अन्तर्गत गिरफ्तार व्यक्ति को उसके गिरफ्तारी की तत्काल सूचना दे दी जाती है।

(D) हिरासत का आधार सम्बन्धित व्यक्ति को बताया जाना चाहिए। हालांकि सार्वजनिक हितों के विरुद्ध इसे बताना जरूरी नहीं है।

(3.) शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनु. 23-24)

अनु. 23- मानव के दुर्व्यापार और बालात् श्रम पर रोक

मानव का दुर्व्यापार (वेश्यावृत्ति, बंधुआ मजदूर) और बेगार तथा इसी प्रकार अन्य जबरदस्ती लिया जाने वाला श्रम प्रतिसिद्ध किया जाता है और इस उपबन्ध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा, किन्तु राज्य सार्वजनिक कार्यों के लिए व्यक्तियों से अनिवार्य सेवा ले सकती है और राज्य ऐसी सेवा आरोपित करते समय व्यक्तियों के बीच धर्म, मूल वंश, जाति वर्ग के आधार पर भेद नहीं करेगी।

नोट- बन्धुआ मजदूर उन्मूलन अधिनियम-1975

अनु. 24 कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिशेध

14वर्ष से कम आयु के किसी बालक को किसी कारखानों या खानों में काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाएगा।

नोट- बाल श्रम समाधान के रूप में

  1. अनिवार्य शिक्षा
  2. मिड-डे-मिल योजना
  3. आँगनबाड़ी कार्यक्रम
  4. रोजगार गारण्टी कार्यक्रम ।

(4.) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनु. 25-28)

संविधान के अधीन भारत पंथनिरपेक्ष राज्य है अर्थात् ऐसा राज्य जो प्रत्येक धर्म व सम्प्रदाय के प्रति समान दृष्टि रखता है। राज्य | कोई धर्म न अपनाते हुए भी सभी धर्मों के विश्वासों को फलने-फूलने का समान अवसर प्रदान करेगा।

अनु. 25- अंतःकरण को और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता। [धर्मान्तरण की स्वतंत्रता (25-1)]

नोट– यदि कोई व्यक्ति या संस्था प्रलोभन द्वारा धर्मान्तरण करता है तो दण्ड का भागी होगा।

अनु. 26- धार्मिक कार्यों में प्रबन्ध की स्वतंत्रता।

अनु. 27- किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के बारें में स्वतंत्रता।

किसी भी व्यक्ति को ऐसा कर या चन्दा देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा, जिस धन को किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक सम्प्रदाय की अभिवृद्धि या प्रचार में लगाया जाए।

अनु. 28- कुछ शिक्षण संस्थओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता। पूर्णतः राज्य निधि से पोषित किसी शिक्षण संस्था में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।

(5.) संस्कृति तथा शिक्षा का अधिकार (अनु. 29-30)

भारत विभिन्नताओं में एकता वाला विशाल देश है। इसके निवासियों का धर्म, संस्कृति, रीति-रिवाज, भाषा एवं लिपियाँ आदि भिन्न-भिन्न है तथा ये लोग अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करते है। इसलिए आवश्यक हो जाता है कि संस्कृति भाषा एवं लिपि की विभिन्नता को बनाया रखा जा सके। जहाँ तक अल्पसंख्यक वर्गों का सम्बन्ध है उनकी भाषा का परिरक्षण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

अल्पसंख्यकों का निर्धारण-

देश में अल्पसंख्यकों के निर्धारण के मुद्दे पर उच्चतम न्यायालय ने अपनी व्याख्या में कहा है कि अल्पसंख्यकों का निर्धारण अलग-अलग राज्य में उनकी जनसंख्या में अलग-अलग समुदायों के अनुपात के आधार पर किया जाएगा। चूंकि भारत में राज्यों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर हुआ है; इसलिए अल्पसंख्यकों का निर्धारण देश स्तर पर नहीं किया जा सकता है। किसी भी समुदाय की अल्पसंख्यक के रूप में पहचान सम्बन्धित राज्य में उनके जनसंख्या के अनुपात के आधार पर की जाएगी।

केन्द्र सरकार ने 5 समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित किया है

1. मुस्लिम 2. ईसाई 3.सिख 4. बौद्ध 5.पारसी

नोट– सर्वोच्च न्यायालय ने जैन धर्म को मनाने के कारण हिन्दू माना, इसलिए अल्पसंख्यक की मान्यता रद्द कर दी है।

अनुच्छेद 29 –भारत के राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के प्रत्येक ऐसे वर्ग को जिसकी अपनी विशेष भाषा लिपि या संस्कृति है; उसे बनाए रखने का अधिकार होगा। । राज्य द्वारा पोषित या राज्यनिधि से सहायता पाने वाली किसी शिक्षण संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता है।

अनुच्छेद 30– शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार | धर्म या भाषा के आधार पर सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार होगा।

सम्पत्ति का अधिकार (अनु. 31)

44वें संविधान संशोधन द्वारा अनु. 19(1-च) का निरसन कर दिया गया तथा अनु. 31 (1) को भाग 3 से स्थानान्तरित कर एक पृथक अनु. 300 (क) बना दिया गया है। यह इस प्रकार है

किसी व्यक्ति को उसकी सम्पत्ति से विधि के प्राधिकार से ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं। इसका तात्पर्य है कि यदि किसी व्यक्ति की सम्पत्ति किसी लोक अधिकारी द्वारा बिना विधिक प्राधिकार के ली जाती है तो अनु. 32 के अधीन सीधे उच्चतम न्यायालय से न्याय नहीं मिलेगा; बल्कि साधारण वाद द्वारा उपचार की खोज करनी होगी, क्योंकि सम्पत्ति का अधिकार अब मूलाधिकार नहीं रहा।

नोट– सम्पत्ति का अधिकार से मोरारजी देसाई के शासन काल में निकाला गया। सम्पत्ति का अधिकार अब नहीं बल्कि संवैधानिक अधिकार है:10 जुलाई, 2008 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा कि सम्पत्ति रखना एक संवैधानिक अधिकार है। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि सम्पत्ति रखने का अधिकार मौलिक अधिकार भले ही न हो पर संवैधानिक अधिकार जरूर है, इस कारण से यह मानवीय अधिकार भी है।

नोट- 44वें संविधान संशोधन द्वारा सम्पत्ति के मूल अधिकार को कानूनी अधिकार बना दिया गया था, किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय (10 जुलाई, 2008) से सम्पत्ति का अधिकार, अव संवैधानिक अधिकार हो गया है। संविधान में मूल अधिकारों की घोषणा निरर्थक है जब तक कि उसका प्रवर्तन कराने के लिए संवैधानिक उपचार न हो।

(6) संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनु. 32 )

संविधान के अनु. 32 में इन संवैधानिक उपचारों का स्पष्ट वर्णन किया गया है। भारतीय संविधान द्वारा मूल अधिकारों को कार्यपालिका और विधायिका दोनों की कार्यवाही के विरूद्ध प्रत्याभूत किया गया है। संविधान में मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए 5 प्रकार के लेख रीट निकालने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को प्रदान की गई है, इन्हीं विशेषताओं के कारण डॉ. अम्बेडकर ने इस अधिकार को संविधान की आत्मा कहा है।

नोट- भारतीय संविधान की आत्मा प्रस्तावना में निवास करती है।

  1. भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार कितने हैं?

    वर्तमान में भारतीय संविधान में छह मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। प्रारंभ में मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार दिए गए थे। 42 वें संविधान संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से कानूनी अधिकार बना दिया गया है।

  2. मौलिक अधिकार कब लागू हुआ?

    26 जनवरी 1950 को मौलिक अधिकार लागू हो गए थे। क्योंकि भारतीय संविधान में 26 जनवरी 1950 को सारे अनुच्छेद प्रभावी रूप से लागू कर दिए गए थे। मौलिक अधिकारों का निलंबन केवल आपातकाल में राष्ट्रपति द्वारा किया जा सकता है।

  3. मौलिक अधिकार कहाँ से लिया गया है?

    मौलिक अधिकारों को भारतीय संविधान में अमेरिकी संविधान से लिया गया है.

  4. 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान में कुल कितने मौलिक अधिकार थे?

    26 जनवरी 1950 को मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे। परंतु वर्तमान में 6 मौलिक अधिकार है। क्योंकि 86 वें संविधान संशोधन द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया है।

मौलिक कर्तव्य कितने है

मौलिक कर्तव्य कितने है: जहाँ संविधान को इस आधार पर आलोचना की जा रही है कि इसमें सामाजिक-आर्थिक न्याय प्राप्ति के आदर्श दिखावटो अधिक और बास्तविक कम है वहाँ आलोचना का दूसरा पहलू यह भी रहा है कि संविधान ने केवल नागरिकों के अधिकारों का हो वर्णन किया गया है। नागरिकों को देश तथा समाज के प्रति ज्या कला है तथा देश के विकास में उन्हें किस प्रकार की भूमिका निभानी है। इस संबंध में सविधान कछ भी नहीं कहता प्रेक्षकों का मत रहा है कि राष्ट्र निमाण के लिए आवश्यक है कि नागारिक कुछ सामान्य मुल्यों के आधार पर देशप्रेम तथा राष्ट्रवाद का अनुकरण करें। उपरोक्त आलोचना से बचने के लिए सविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्य से सम्बन्धित अनुच्छेद-2 और भाग चार (क) व संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा जोडे गए ये मौलिक कर्तव्य इस प्रकार हैं।

11 मौलिक कर्तव्य कौन-कौन से हैं

भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्य को अनुच्छेद 51 के तथा भाग 4 में जुड़ गया है। मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों की संख्या 10 थी। परंतु 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 धारा 11 मौलिक कर्तव्य जोड़ दिया गया। अतः वर्तमान में भारतीय संविधान में 11 मौलिक कर्तव्य है. 11 मौलिक कर्तव्य को नीचे बताया गया है।

  1. भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तब्य होगा कि –
  2. वह संविधान का पालन करे और राष्ट्रीय जज एक राष्ट्रीय गान का आदर करे।
  3. स्वतंत्रताग्राहो राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरणा देने वाले उच्च आदशों का आदर तथा पालन करे।
  4. भारत को प्रभुसता, एकता और अखंडता की रक्षा करे। से राष्ट्र और राष्ट्र को समत्ति को रक्षा करे।
  5. भारत के लोगों के बीच भाइचारे की भावना का विकास करे।
  6. अपने देश को मिली-जलो साकतिक विरासत का संरक्षण करे।
  7. प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण और विकास करें।
  8. बैज्ञानिक दृष्टिकोण और जांच पड़ताल को भावना का विकास करे।
  9. सावजनिक सम्पत्ति को रक्षा करे।
  10. व्यक्तिगत एवं सामूहिक कार्यकलपों के सभी क्षेत्रों में सर्वोत्कृष्टता करने का प्रयत्न करे।
  11. 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों के माता-पिता या अभिभावक या सरक्षक को अपने बच्चे को शिक्षा दिलाने का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए।( यह मौलिक कर्तव्य 86 सविधान संशोधन अधिनियम 2000 द्वारा जोड़ा गया।)

मौलिक कर्तव्य को राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के अध्याय में जोड़ने का अर्थ है कि निर्देशक नीति निर्देशक तत्व की तरह यह भी बातें योग्य नहीं है. वास्तव में संविधान में इसकी व्याख्या नहीं की गई कि इन्हें कैसे लागू किया जाए और नहीं इनको आंवला करने पर किसी प्रकार की सजा या बाद कार्य व्यवस्था की गई है इसके अतिरिक्त कर्तव्य विवरण में भी अस्पष्टता है.

यहां पर इस बात का भी उल्लेख किया जा सकता है कि संविधान के 42 वें संविधान संशोधन आंतरिक आपातकाल के दौरान किया गया था। जिस समय सरकार के प्रत्येक कार्रवाई संदेहात्मक थी इसलिए इसकी पृष्ठभूमि कोई सिद्धांत नहीं होने के कारण उस समय के राजनीतिक दल और उदारवादी संविधान में इसे सकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा।

मौलिक कर्तव्य कितने है

एम सी मेहता बनाम भारत संघ के मामले में न्यायाधीश न्यायालय से यह निर्णय लिया गया कि अनुच्छेद 51 के अधीन केंद्रीय सरकार का यह कर्तव्य कि वे देश के शिक्षण संस्थानों में  सप्ताह के 1 घंटे पर्यावरण संरक्षण को शिक्षा देने का निर्देश दें दूसरी बात जो मैच की है वह यह कि अनुच्छेद 51 के की भाषा और इसके अर्थ तथा विस्तार के बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता किंतु इतना तो स्पष्ट है कि इस अनुच्छेद की भाषा की परिधि के अंतर्गत राज्य किसी भी नागरिक को दंडित इस स्थिति का यथाशीघ्र निराकरण आवश्यक है.  इसके अभाव में मूल कर्तव्य पवित्र घोषणा मात्र रह जाएंगे

मौलिक कर्तव्य की उपयोगिता

मौलिक कर्तव्य की उपयोगिता निम्न रूप में व्यक्त किया जा सकता है

निर्विवाद है- इन मौलिक कर्तव्य के प्रति इस प्रकार की है कि विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं की बहू को इनमें कोई विवाद की बात नहीं लगती वास्तव में यह दलगत राजनीति से ऊपर है इनका आदर्श देश हित की भावना को नागरिकों के हृदय में जागृत करना है

आदर्श और पथ प्रदर्शक-  आदर्श आत्मा के नागरिक का पथ प्रदर्शन करते हैं भारत में आज सर्वत्र स्वार्थ दवा तोड़ दिखाई देता है व्यक्ति व  समाज के हितों का उचित सामंजस नहीं है धीरे-धीरे समाज हित गण होता जा रहा है यह कर्तव्य जनता का मार्गदर्शन करेंगे और व्यवहार के लिए आदर्श उपस्थित करेंगे

जागृति उत्पन्न करेंगे- इन कर्तव्य की पूर्ति का आधार स्वविवेक है दवा के शक्ति नहीं है धीरे-धीरे समाज में कर्तव्य पूर्ति की भावना को जागृत कर दी श्रेष्ठ आचरण संभव होगा स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी ने संसद में कहा था कि अगर मौलिक कर्तव्य को केवल अपने दिमाग में रख लेते हैं तो हम तुरंत एक शांतिपूर्ण क्रांति देखेंगे

मौलिक कर्त्तव्यों की आलोचना

मोलिक कर्तव्यों के रुप और उनकी प्रकृति की आलोचना की गई है। इस आलोचना के मुख्य आधार निम्नलिखित हैं:

(1) आपात्काल में सृजन हुआ- इन मौलिक कर्तव्यों की प्रमुख आलोचना यह कह कर की जाती है कि आन्तरिक आपात्काल के दौरान जबकि देश के विचारक, विद्वान, विधिवेत्ता तथा राजनीतिक दलों के नेता व कार्यकर्ता जेलों में बन्द थे, उस समय 42 वें संशोधन ने इन कर्त्तव्यों को एकांगी रूप में संविधान में जोड़ दिया। इस सम्बध में जनता, उसके नेताओं को व समाज के बुद्धिवादी वर्ग को इस पर विचार करने का अवसर ही प्राप्त नहीं हुआ और सत्तारुढ़ दल के द्वारा मनमाने ढंग से इनकी रचना कर दी गई। किन्तु इस आलोचना में अधिक तथ्य दिखलाई नहीं देता क्योंकि ये कर्त्तव्य अत्यन्त विवाद रहित तथा सामान्य प्रकृति के हैं। इतना ही नहीं आपात्काल के पश्चात बनी जनता सरकार ने भी इनकी उपयोगिता समझकर इन्हें संविधान में से निकाल बाहर करने का कोई प्रयास नहीं किया।

(2) न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र से बाहर- ये न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखे गए हैं अतः नागरिकों में इनके पालन करने की इच्छा की जागृति सम्भव नहीं है। दूसरे, यदि किसी समय इनको न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र में देने की बात सोची जाएगी तो इनकसा रुप ऐसा है कि इनका उल्लंघन किया गया है या पूर्ति की गई है यह निश्चित करना कठिन है। जैसे तीसरे कर्त्तव्य में कहा गया है कि नागरिकों का कर्त्तव्य होगा कि वे भारत की प्रभुता, एकता व अखण्डता की रक्षा करें। यह निश्चित कर पाना कि देश की प्रभुता की रक्षा नहीं की गई, सम्भव नहीं है।

(3) कर्त्तव्य का रुप अस्पष्ट है- कहा जाता है कि यदि नागरिक हृदय से इन कर्त्तव्यों की पूर्ति करना भी चाहें तो भी उनके लिए यह सम्भव नहीं होगा। उनके सामने प्रश्न होगा कि वह क्या करें, देश की प्रभुता, एकता व अखण्डता की रक्षा कैसे करें। गौरवशाली परम्परा का परीक्षण कैसे करें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करें, अर्थात क्या करें? आदि। वास्तव में ये कर्त्तव्य अस्पष्ट हैं और नागरिक का मार्ग-दर्शन करने में असमर्थ हैं। सत्य बात यह है कि ये कर्त्तव्य राष्ट्रीय मूल्यों को उजागर करते हैं और सामान्य नागरिकों को उन्हें व्यावहार में लाने के लिए प्रेरित करते हैं।

(4) कुछ कर्त्तव्यों को मात्र दोहराया गया है- कुछ कर्त्तव्य ऐसे हैं जिनका आदर्श के रुप में संविधान में अन्यत्र वर्णन किया जा चुका है अतः उनका वर्णन दोहराना मात्र है और अनुपयोगी है। जैसे राष्ट्रीय आन्दोलन को प्रेरित करने वाले आदशों का हृदय में समझ में और पालन करे वास्तव में इन आदर्शों को राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में मूर्त रुप दिया गया है। इसी प्रकार देश की प्रभुता, एकता व अखण्डता की रक्षा करना और उसे अक्षुण्ण बनाए रखना, जैसे आदर्शों का भी संविधान की प्रस्तावना में वर्णन किया हुआ है। इस प्रकार मौलिक कर्त्तव्यों में मौलिकता का अभाव दिखाई देता है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना

प्रत्येक संविधान के प्रारंभ में सामान्यतया एक प्रस्तावना होती है जिसके द्वारा  संविधान के मूल उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को स्पष्ट किया जाता है। संविधान की प्रस्तावना उन राजनैतिक, नैतिक, आर्थिक और धार्मिक मूल्यों को व्यक्त करती है जिन्हें प्रोत्साहित करने के लिए हमारा संविधान प्रतिबद्ध है। यह सत्ता के स्रोत, सरकारी प्रणाली और राजनैतिक व्यवस्था के लिए वांछनीय प्रयोजनों की विशिष्ट रूप से पहचान करती है। इसमें एक ऐसा दर्शन अंतर्निहित है जो उन आदर्शों और आकांक्षाओं को अपनी परिधि के अंदर समाहित किए हुए है जिनके प्रति राष्ट्रीय आंदोलन ने अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी थी। किसी संविधान की प्रस्तावना से यह आशा की जाती है कि जिन मूलभूत मूल्यों तथा दर्शन पर संविधान आधारित हो तथा जिन लक्ष्यों तथा उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास करने के लिए संविधान निर्माताओं ने राज्य व्यवस्था को निर्देशित किया हो उसका प्रस्तावना में समावेश हो। संविधान की प्रस्तावना में उन महान आदर्शों, मौलिक उद्देश्यों व व लक्ष्यों का उल्लेख किया गया है, जिनके आधार पर भविष्य के भारत का निर्माण किया जाना था। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में जिस मौलिक दर्शन का उल्लेख मिलता है, वास्तव में विभिन्न संविधान प्रावधान उन्हीं की पूर्ति का प्रयास है। भारतीय संविधान में निहित दर्शन, जिसकी अभिव्यक्ति प्रस्तावना में की गई है, वास्तव में उस युग का राजनीतिक दर्शन कल्याणकारी राज्य की ओर उन्मुख उदारवादी लोकतंत्र का दर्शन के अनुरूप था, जिसमें संविधान का निर्माण किया गया।

प्रस्तावना के प्रमुख तत्त्व (Principal Elements of the Preamble)

हम भारत के लोग-इसका अर्थ है भारतीय संविधान भारतीय जनता को समर्पित है।

सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न (Sovereign)-इसका अर्थ है भारत अपने आंतरिक एवं वैदेशिक मामलों में बिना किसी बाह्य दबाव एवं प्रतिबद्धता के स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम होगा।

समाजवादी (Socialistic)-संविधान की प्रस्तावना में इस शब्द का उल्लेख 42 वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा किया गया। इसका उद्देश्य सभी उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण करना नहीं है, अपितु आर्थिक शोषण को समाप्त करने से है। भारतीय संविधान में समाजवादी, शब्द के साथ लोकतंत्र शब्द जुड़ा है। अर्थात् जहाँ लोकतंत्रीय समाजवाद की अवधारणा है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुरूप अपना आर्थिक विकास कर सकता है। राज्य द्वारा इस उत्थान में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाली जाएगी। राज्य कमजोर तबके के लोगों के आर्थिक उत्थान के लिए सहयोग प्रदान करेगा।

पंथ निरपेक्षता (Secular)-राज्य यथासंभव राजकीय कार्यों जैसे अर्थव्यवस्था, शिक्षा, राजनीति तथा कानून आदि में धर्म का प्रयोग नहीं करेगा तथा सभी व्यक्तियों का कल्याण सुनिश्चित करेगा और सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करेगा। भारत में पंथ निरपेक्ष राज्य की स्थापना की गई है।

एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामला 1994 में सर्वोच्च न्यायालय  द्वारा पंथनिरपेक्षता को संविधान के आधारभूत ढाँचे का अंग बताया गया। प्रस्तावना में इस शब्द को 42 वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा शामिल किया गया। पंथनिरपेक्ष भारतीय राज्य में:

  1. सरकार न किसी धर्म के मानने वाले को प्रोत्साहन देगी और न ही किसी को हतोत्साहित करेगी।
  2. भारत सरकार का कोई भी धर्म, राज्य धर्म नहीं होगा एवं सरकार सभी धर्मों एवं मतों का समान रूप से सम्मान करेगी तथा उन्हें अपने धर्म को पल्लवित एवं पुष्पित करने में बाधा उत्पन्न नहीं करेगी।
  3. सरकारी विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी तथा सरकार से सहायता प्राप्त करने वाले शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा अनिवार्य नहीं की जायेगी।
  4. अल्पसंख्यकों को अपनी रूचि की शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार होगा तथा वे अपनी भाषा-संस्कृति की रक्षा के लिए भी प्रयास कर सकते हैं।

लोकतंत्रात्मक (Democratic)-इसका अभिप्राय यह है कि शासन की सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित है। इसके अंतर्गत बिना किसी भेद-भाव के प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार है। इस प्रकार की व्यवस्था में जनता के द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के द्वारा सरकार की स्थापना की जाती है और सरकार का संचालन जनता के हित में किया जाता है।

गणराज्य (Republic)-ऐसा राज्य जिसका प्रमुख निर्वाचित होता है वंशानुगत नहीं। भारत में संसदीय सरकार की स्थापना करके तथा निर्वाचित राष्ट्रपति को राज्य का प्रमुख बनाकर प्रस्तावना में शामिल ‘लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ शब्द की अभिपुष्टि की गई है।

प्रस्तावना के उद्देश्य

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में पांच उद्देश्यों (न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व तथा राष्ट्रीय एकता व अखंडता) को स्पष्ट किया गया है। प्रस्तावना में भारत के समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय की प्राप्ति की बात कही गयी है। इसके अंतर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करने का अधिकार होगा।

सामाजिक न्याय (Social Justice)-जिसमें व्यक्ति-व्यक्ति में जाति व पंथ के आधार पर भेदभाव न हो, ऊँच-नीच की भावना न हो तथा समाज के सभी वर्गों के लोगों को अपने व्यक्तित्त्व के विकास का पूर्ण अवसर प्राप्त हो।

आर्थिक न्याय (Economic Justice)-जिसमें देश की संपत्ति का नागरिकों में यथासम्भव समान वितरण हो ताकि अधिकाधिक व्यक्तियों को उनका अधिकाधिक लाभ प्राप्त हो सके। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यतानुसार धनोपार्जन के साधन उपलब्ध हों, किंतु किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का आर्थिक शोषण करने का अधिकार न हो।

राजनैतिक न्याय (Political Justice)-जिसमें देश के नागरिकों को अपने देश की शासन व्यवस्था में भाग लेने का अधिकार हो। अर्थात् राज्य के अंतर्गत समस्त नागरिकों को समान रूप से नागरिक और राजनैतिक अधिकार प्राप्त हों।

स्वतंत्रता (Freedom)-लोकतंत्र की वास्तविक स्थापना तभी हो सकेगी जब स्वतंत्र और सभ्य जीवन के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिकार समाज के प्रत्येक सदस्य को सुनिश्चित हो जाते हैं। साथ ही नागरिकों के व्यक्तित्त्व के पूर्ण विकास के लिए भी विभिन्न स्वतंत्रताओं का प्राप्त होना आवश्यक है। प्रस्तावना में व्यक्ति के इन आवश्यक अधिकारों का ‘विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता’ के रूप में उल्लेख किया गया है।

प्रतिष्ठा अवसर की समता (Equality of Opportunity) यहाँ समता से अभिप्राय है सामाजिक संरचना से, असमानता को दूर करना और प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिष्ठा व अवसर की समानता सुनिश्चित कराना, जिससे उसका सर्वोत्तम विकास हो सके। संविधान में इस उद्देश्य को सुनिश्चित करने के लिए एक नागरिक और दूसरे नागरिक के बीच राज्य द्वारा किए जाने वाले सभी विभेदों को अवैध घोषित किया गया है।

बंधुता (Fraternity)-प्रस्तावना में व्यक्ति की गरिमा को सुनिश्चित करने के लिए बंधुता को बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया गया है। ज्ञातव्य है कि सर्वप्रथम फ्रांसिसी अधिकारों के घोषणापत्र में और फिर संयुक्त राष्ट्रसंघ में मानव अधिकारों में बंधुता पर बल दिया गया।

भारतीय संविधान की उद्देशिका में बंधुत्व की यही भावना दृष्टिगोचर होती है। यह भारत जैसे देश के लिए और भी आवश्यक है क्योंकि यहाँ के लोग विभिन्न मूलवंश, धर्म, भाषा और संकृति वाले हैं।

राष्ट्र की एकता और अखंडता (Unity and Intergrity of the Nation) -42 वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा उद्देशिका में ‘और अखंडता’ शब्दों को जोड़कर अलगाववादी शक्तियों पर अंकुश स्थापित किया गया है और इस भावना का विकास किया गया है कि भारत के लोग सम्पूर्ण देश को अपनी मातृभूमि समझे।

प्रस्तावना का महत्त्व

भारतीय राजव्यवस्था लोकतंत्रात्मक है, जिसमें लोगों के मूल अधिकारों तथा स्वतंत्रता की गारंटी दी गयी है तथा राष्ट्र की एकता सुनिश्चित की गयी है। प्रस्तावना में उस आधारभूत दर्शन और राजनीतिक, धार्मिक व नैतिक मूल्यों का उल्लेख हैं जो हमारे संविधान के आधार है। सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य के वाद में न्यायमूर्ति मधोलकर ने कहा था कि उद्देशिका पर ‘गहन विचार विमर्श’ की छाप है तथा उद्देशिका ‘संविधान की विशेषताओं का निचोड़’ है। गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के मामले में न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह ने भी विचार व्यक्त किया कि ‘संविधान की उद्देशिका उन सिद्धांतों का निचोड़ है जिनके आधार पर सरकार को कार्य करना है’ वह ‘संविधान की मूल आत्मा है, शाश्वत है, अपरिवर्तनीय है। ‘भले ही प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग माना जाता है (केशवानंद भारतीय बनाम केरल राज्य), फिर भी यह भी अपनी जगह सत्य है कि यह न तो किसी शक्ति का स्त्रोत है और न ही उसको किसी प्रकार सीमित करता है।

प्रस्तावना को न्यायालय में प्रवर्तित नहीं किया जा सकता किंतु लिखित संविधान की उद्देशिका में वे उद्देश्य लेखबद्ध किये जाते हैं, जिनकी स्थापना और संप्रवर्तन के लिए संविधान की रचना होती है। प्रस्तावना का महत्त्व यह भी है कि जब कोई अनुच्छेद अस्पष्ट हो और उसका ठीक-ठीक अर्थ जानने में कठिनाई हो तो स्पष्टीकरण के लिए प्रस्तावना की भाषा का सहारा लिया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, प्रस्तावना में संविधान निर्माताओं के आशय को समझने के लिए प्रस्तावना का सहारा लिया जा सकता है। प्रस्तावना संविधान की आत्मा है। सभी संवैधानिक और संसदीय अधिनियमों की इसके प्रकाश में व्याख्या की जा सकती है। प्रस्तावना का महत्त्व इस कारण भी स्पष्ट होता है कि यह संविधान के स्वरूप, कार्यप्रणाली तथा राजनीतिक व्यवस्था को प्रकट करने के साथ-साथ भावी भारत के स्वरूप को भी चित्रित करती है। प्रस्तावना में’ हम क्या करेंगे, हमारा ध्येय क्या है और किस दिशा में जा रहे हैं ‘का उल्लेख है। वस्तुतः संविधान की प्रस्तावना से दो प्रयोजन स्पष्ट होते हैं-प्रथम, प्रस्तावना यह स्पष्ट करती है कि संविधान के प्राधिकार के स्त्रोत क्या हैं और द्वितीय, संविधान किन उद्देश्यों को संवर्धित या प्राप्त करना चाहता है

प्रस्तावना में संशोधन

केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य के वाद में यह प्रश्न सर्वप्रथम न्यायालय के समक्ष विचार के लिए उपस्थित हुआ था कि क्या अनुच्छेद 368 के तहत प्रस्तावना में संशोधन किया जा सकता है अथवा नहीं? इस संदर्भ में सरकार का यह तर्क था कि चूंकि प्रस्तावना संविधान का एक अंग है, अतएव अनुच्छेद 368 के अंतर्गत उसमें संशोधन किया जा सकता है। अपीलार्थी की ओर से यह कहा गया कि अनुच्छेद 368 द्वारा प्रदत्त संशोधन की शक्ति सीमित है। प्रस्तावना में संविधान का आधारभूत ढांचा निहित है, जिसे संशोधन करके नष्ट नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इससे संवैधानिक ढाँचे का चरमरा जाना निश्चित है। उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से इस मामले में यह निर्धारित किया है कि प्रस्तावना संविधान का भाग है, अतः इसमें संशोधन किया जा सकता है। किन्तु न्यायालय ने इसके साथ यह भी निर्धारित किया है कि प्रस्तावना के उस भाग में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता है जो आधारभूत ढाँचे से सम्बन्धित है। संविधान के 42 वें संशोधन अधिनियम, 1976 के पश्चात् यह स्पष्ट हो चुका है कि संसद को प्रस्तावना में संशोधन की शक्ति प्राप्त है, किन्तु जब तक केशवानंद भारती का निर्णय उलट नहीं दिया जाता, प्रस्तावना में किए गए संशोधन को कभी भी न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है कि वह उसमें निहित आधारभूत ढाँचे में परिवर्तन है।

  • भारतीय शासन व्यवस्था के आधारभूत मूल्यों का वर्णन संविधान के प्रस्तावना में किया गया है।
  • संविधान की आधारशिला उद्देश्य प्रस्ताव संविधान का दर्शन प्रस्तावना (अम्बेडकर के अनुसार संविधान की आत्मा अनुच्छेद 32 है।)
  • प्रायः प्रत्येक अधिनियम के प्रारम्भ में एक उद्देशिका होती है जिसमें कि उन उद्देश्यों का उल्लेख किया जाता जिनकी प्राप्ति के लिए उक्त अधिनियम पारित किया गया है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने’ इन री वेरूबारी यूनियन (1960) ‘के वाद में इसे संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी बताया है। लेकिन यह भी कहा कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं हैं। 1973 में केशवानंद भारती वाद में प्रस्तावना को संविधान का अंग मान लिया गया और कहा गया कि यह संविधान की व्याख्या में सहायक है (यही वर्तमान में स्थिति है)।
  • प्रस्तावना का आरम्भ’ हम भारत के लोग ‘शब्द से होता है। यह स्पष्ट करता है कि भारतीय संविधान का स्रोत भारतीय जनता है।
  • समाजवादी शब्द 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा 2 जनवरी, 1977 को जोड़ा गया है।
  • पंथनिरपेक्षता 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा 3 जनवरी, 1977 को प्रस्तावना में जोड़ा गया है।
  • संविधान की प्रस्तावना में अखण्डता शब्द भी 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा 3 जनवरी, 1977 को जोड़ा गया।
  • प्रस्तावना को न्यायालय द्वारा परिवर्तित नहीं कराया जा सकता है। इस बात की घोषणा सर्वोच्च न्यायालय ने यूनियन ऑफ इण्डिया बनाम मदन गोपाल (1957) के केस में की थी।
  • प्रस्तावना किसी संविधान का सबसे अधिक मूल्यवान अंग होता है। यह संविधान की आत्मा होती है। इसे हम संविधान की कुंजी के रूप में जानते हैं। यह एक उचित मानदण्ड है, जिसके आधार पर संविधान का मूल्यांकन किया जा सकता है। प्रायः प्रत्येक संविधान के प्रारम्भ में एक प्रस्तावना होती है जिसके आधार पर संविधान का मूल्यांकन किया जा सकता है तथा जिसके द्वारा संविधान के मूल उददेश्यों व लक्ष्यों को स्पष्ट किया जाता है।
  • ‘प्रभुत्व सम्पन्न’ शब्द इस बात का द्योतक है, कि भारत आंतरिक या बाह्य दृष्टि से किसी भी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं है, यह संप्रभुता भारत के लोगों में निहित है।
  • हमारे संविधान में शासन की पद्धति के रूप में प्रतिनिधिक लोकतंत्र की कल्पना की गयी है।
  • राजनैतिक न्याय से तात्पर्य है कि व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के समान राजनैतिक अधिकार प्राप्त थे।

संविधान का निर्माण कैसे हुआ

संविधान का निर्माण: संविधान सभा द्वारा संविधान की मांग की गई थी: महात्मा गांधी ने बहुत पहले 1922 में यह मांग की थी कि भारत का राजनैतिक भाग्य भारतीय स्वयं बनाएंगे ।

कानूनी आयोग और राउंड टेबल कांफ्रेंस की असफलता के कारण भारतवासियों को आकांक्षाओं की पुष्टि के लिए भारत शासन अधिनियम, 1935 अधिनियमित किया गया । इससे भारत के लोगों की इस मांग ने जोर पकड़ा कि वे बाहरी हस्तक्षेप के बिना संविधान बनाना चाहते हैं । इस मांग को कांग्रेस ने 1935 में प्रस्तुत किया । 1938 में पंडित नेहरू ने संविधान सभा की मांग को स्पष्ट रूप से रखी ।

साइमन आयोग (1928)

सुधार की लगातार मांग और असहयोग आन्दोलन से उत्पन्न स्थिति के कारण ब्रिटिश सरकार ने 1928 में एक कानूनी आयोग नियुक्त किया । इसकी नियुक्ति के बारे में भारत शासन अधिनियम, 1919 में उपबन्ध था (धारा 84 क) । इस आयोग को अधिनियम के कार्यकरण की जांच करके उस पर अपना प्रतिवेदन देना था । 1929 में ब्रिटिश सरकार ने यह घोषणा की भारतीय राजनैतिक विकास का उद्देश्य डोमिनियन प्रास्थिति है । आयोग ने, जिसके अध्यक्ष सर जान साइमन थे, 1930 में अपना प्रतिवेदन दिया । इस प्रतिवेदन पर एक गोलमेज परिषद में विचार किया गया जिसमें ब्रिटिश सरकार के, ब्रिटिश भारत के और देशी रियासतों के शासकों के प्रतिनिधि थे (क्योंकि स्कीम में एक परिसंघ बनाकर देशी रियासतों को शेष भारत से जोड़ना था । इस सम्मेलन की परिणति पर तैयार किए गए एक श्वेत पत्र की ब्रिटिश पार्लियामेंट की एक संयुक्त प्रवर समिति द्वारा परीक्षा की गई और प्रवर समिति की सिफारिशों के अनुसार भारत शासन विधेयक का प्रारूप तैयार करके उसे कुछ संशोधनों के साथ भारत शासन अधिनियम, 1935 के रूप में पारित किया गया ।

सांप्रदायिक अधिनिर्णय (1932) एवं 1935 का अधिनियम

इस अधिनियम ने मुस्लिम और गैर मुस्लिम समुदायों के बीच सांप्रदायिक वैमनस्य को और अधिक बढ़ा दिया क्योंकि इसमें ब्रिटिश प्रधान मंत्री रामरामसे मैकडोनाल्ड द्वारा 4-8-1932 को दिए गए “सांप्रदायिक आधिनिर्णय” के आधार पर पृथक् निर्वाचन मंडलों की व्यवस्था की गई । इसका आधार यह बताया गया कि दो मुख्य संप्रदाय सहमत नहीं हो सके है । इसके आगे दोनों धार्मिक समुदायों के बीच करार को प्रत्येक राजनैतिक कदम के लिए पुरोभावी शर्त के रूप में बताया जाता रहा । 1935 के अधिनियम में मुसलमानों के लिए पृथक् प्रतिनिधित्व तो था ही, सिखों के लिए, यूरोपीय लोगों के लिए, ईसाइयों के लिए और एंग्लो इंडियन लोगों के लिए भी पृथक् प्रतिनिधित्व था । इसके कारण राष्ट्रीय एकता के निर्माण में गम्भीर बाधाएं उपस्थित हुई । मुसलमानों के पृथक् राज्य के लिए विभाजन हो जाने के बाद भी भावी संविधान के निर्माता इस कठिनाई को पार नहीं कर सके ।

1935 के अधिनियम द्वारा जिस शासन प्रणाली की व्यवस्था की गई थी, उसके मुख्य लक्षण निम्नलिखित थे:

(क) परिसंघ ओर प्रान्तीय स्वायत्त-इसके पहले के भारत शासन अधिनियमों में भारत सरकार ऐकिक थी किन्तु 1935 के अधिनियम में परिसंघ की स्थापना की गई जिसमें इकाइयां थी प्रान्त और देशी रियासतें । देशी रियासतों के लिए परिसंघ में सम्मिलित होने का विकल्प था । देशी रियासतों के शासकों ने अपनी सहमति नहीं दी थी इसलिए 1935 के अधिनियमों में जिस परिसंघ की व्यवस्था थी वह कभी नहीं बन सका ।

यद्यपि परिसंघ से सम्बन्धित भाग निष्प्रभावी रहे फिर भी प्रान्तीय स्वायत्त से सम्बन्धित भाग को भारत के लिए 1937 में प्रभावी किया गया । इस अधिनियम ने विधायी शक्तियों को प्रान्तीय और केन्द्रीय विधान मंडलों के बीच विभाजित किया । प्रांत उपने परिवेश में केन्द्रीय सरकार के प्रत्यायोजिती नही थे बल्कि प्रशासन की स्वतंत्र इकाइयों के रूप में थे । इस सीमा के भीतर भारत सरकार, प्रान्तीय सरकारों के परिप्रेक्ष में परिसंघ की भूमिका निभाने लगी, यद्यपि देशी रियासतों के न आने के कारण परिसंघ की स्कीम पूरी न हो सकी । गवर्नर, सम्राट की ओर से प्रान्त को कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करता था । वह गवर्नर-जनरल के अधीन नहीं था । गवर्नर से यह अपेक्षा थी कि वह मंत्रियों की सलाह से काम करेगा और मंत्री विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी थे ।

किन्तु प्रान्तीय स्वतंत्रता के प्रारम्भ किए जाने पर भी 1935 के अधिनियम में केन्द्रीय सरकार का एक विशेष क्षेत्र में प्रान्तों पर नियंत्रण बना रहा । कुद विषयों में गवर्नर से “स्वविवेकानुसार” या “अपने स्वयं के विवेकानुसार” कार्य करने की अपेक्षा थी । ऐसे विषयों में गवर्नर, मंत्रिमंडल की सलाह के बिना कार्य करता था । ऐसे कार्य गवर्नर-जनरल के और उसके माध्यम से सेक्रेटरी आफ स्टेट के नियंत्रण और निदेश से होते थे ।

(ख) केन्द्र में द्वैध शासन – केन्द्र की कार्यपालिका शक्ति (सम्राट के निमित्त) गवर्नर-जनरल में निहित थी, जिसके कृत्यों को दो समूहों में बांटा गया था

(1) प्रतिरक्षा, विदेश कार्य, चर्च सम्बन्धी कार्य ओर जनजाति क्षेत्र का प्रशासन गवर्नर-जनरल को स्वविवेकानुसार और अपने द्वारा नियुक्त परामर्शदाताओं की सहायता से करना । था । ये परामर्शदाता विधान मंडल के प्रति उत्तरदायी नही थे; (2) ऊपर आरक्षित विषयों से भिन्न विषयों के बारे में गवर्नर-जनरल को मंत्रीपरिषद् की सलाह से कार्य करना था मंत्रीपरिषद् विधान मंडल के उत्तरदायी था । किन्तु इस क्षेत्र में भी यदि उसका “विशेष उत्तरदायित्व” अन्तर्वलित होता था तो वह मंत्रीपरिषद् द्वारा दी गई सलाह के विरूद्ध कार्य कर सकता था । विशेष उत्तरदायित्व के सम्बन्ध में वह गवर्नर-जनरल, सेक्रेटरी आफ स्टेट के नियंत्रण और निदेश के अधीन कार्य करता था ।

वस्तुतः 1935 के अधिनियम के अधीन न तो परामर्शदाता नियुक्त किए गए और न ही विधान मंडल के प्रति उत्तदायी मंत्रिपरिषद् । गवर्नर-जनरल को सलाह देने के लिए 1919 के अधिनियम द्वारा उपबन्धित पुरानी कार्यकारी परिषद् ही भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 तक गवर्नर-जनरल को सलाह देती रही ।

(ग) विधान मंडल केन्द्रीय विधान मंडल में दो सदन थे जो परिसंघ विधान सभा और राज्य परिषद् से मिलकर बनते थे ।

छह प्रान्तों में विधान मंडल द्विसदनीय थे जो विधान सभा और विधान परिषद् से मिलकर बनते थे, शेष प्रान्तों में विधान मंल में एक सदन था । केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान मंडलों की शक्तियां कुछ मर्यादाओं के अधीन थी । यह नहीं कहा जा सकता था कि इनमें प्रभुत्वसंपन्न विधान मंडली के लक्षण विद्यमान थे । इस अधिनियम के अधीन निकाले गए ‘अनुदेश-विलेख में यह अपेक्षा की गई थी की बहुत से विषयों से सम्बन्धित विधेयक जैसे उच्चतम न्यायालय की शक्तियों को कम करने वाले या स्थायी व्यवस्था को प्रभावी करने वाले विधेयक जब गवर्नर-जनरल या गवर्नर की अनुमति के लिए प्रस्तुत किए जाएंगे तो वे, यथास्थिति, सम्राट या गवर्नर-जनरल के विचार के लिए आरक्षित रखे जाएंगे ।

(घ) केन्द्र और प्रान्तों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण-यद्यपि देशी रियासतें परिसंघ में सम्मिलित नही हुई फिर भी भारत शासन अधिनियम, 1935 के परिसंघीय उपबन्ध केन्द्रीय सरकार और प्रान्तों के बीच वस्तुतः लागू किए गए ।

केन्द्र और प्रान्तों के बीच विधायी शक्तियों के विभाजन पर ही संविधान में संघ और राज्यों के बीच विभाजन आधारित है । यह भारत शासन अधिनियम, 1919 के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन केन्द्र द्वारा प्रान्तों को प्रत्यायोजित शक्तियां मात्र नहीं थी । 1935 के संविधान अधिनियम में विधायी शक्तियों को केन्द्र और प्रान्तीय विधान मंडलों के बीच विभाजित किया गया और नीचे उल्लिखित उपबन्धों के अधीन रहते हुए किसी भी विधान मंडल को दूसरे की शक्तियों का अतिक्रमण करने का अधिकार नहीं था ।

इस अधिनियम में तीन प्रकार का विभाजन किया गया ।

(1) एक परिसंघ सूची थी जिस पर परिसंघ विधान मंडल को विधान बनाने की अनन्य शक्ति थी इस सूची में विदेश कार्य, करेंसी और मुद्रा, नौसेना, सेना और वायुसेना, जनगणना जैसे विषय थे ।

(2) विषयों की एक प्रान्तीय सूची थी जिस पर प्रान्तीय विधान मंडलों की अनन्य अधिकारिता थी । उदाहरण के लिए पुलिस, प्रान्तीय लोकसेवा और शिक्षा ।

(3) विषयों की एक समवर्ती सूची थी-जिस पर परिसंघ और प्रान्तीय विधान मंडल दोनों विधान बनाने के लिए सक्षम थे, उदाहरणार्थ, दंड विधि और प्रक्रिया, सिविल प्रक्रिया, विवाह और विवाह-विच्छेद, माध्यस्थम्  ।. गवर्नर-जनरल द्वारा आपात की उद्घोषणा किए जाने पर परिसंघ विधान मंडल को प्रान्तीय सूची में प्रगणित विषयों की बाबत विधान बनाने की शक्ति थी । परिसंघ विधान मंडल प्रान्तीय विषयों की बाबत उस दिशा में भी विधान की रचना कर सकता था जब दो या अधिक विधान मंडल अपने सामान्य हित में ऐसा किए जाने की इच्छा प्रकट करते थे ।

समवर्ती क्षेत्र में विरोध की दशा में, परिसंघ विधि, की सीमा तक प्रान्त की विधि पर अभिभावी होती थी किन्तु यदि प्रान्तीय विधि को गवर्नर-जनरल के विचार के लिए आरक्षित किया गया था और गवर्नर-जनरल ने अपनी अनुमति दे दी थी तो प्रान्तीय विधि विरोध के होते हुए भी अभिभावी होती थी ।’

इस अधिनियम में अवशिष्ट विधायी शक्ति का आवंटन अद्वितीय था । वह न तो केन्द्रीय विधान मंडल में निहित था न प्रान्तीय विधान मंडल में । गवर्नर-जनरल को यह शक्ति दी गई थी का बह परिसंघ या प्रान्तीय विधान मंडल को किसी ऐसे विषय की बाबत विधि अधिनियमित करने के लिए प्राधिकृत करे जो विधायी सूची प्रगणित नहीं थी ।

यह ध्यान देने योग्य है कि साइमन आयोग ने 1929 में जो “डोमिनियन प्रास्थिति” देने का वचन दिया था वह भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा प्रदत्त नहीं की गई ।

क्रिप्स मिशन (1942)

ब्रिटिश सरकार को द्वितीय विश्व युद्ध के प्रारम्भ हो जाने पर बाहरी परिस्थितियों के कारण उन्हें यह  स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ा कि भारतीय सांविधानिक समस्या का हल निकालना अति अवश्यक है । 1940 में , इंग्लैंड में बहुदलीय सरकार ने इस सिद्धान्त को स्वीकार किया कि भारत के लिए नया संविधान  भारत के लोग हो बनाएंगे । मार्च, 1942 में जब जापान भारत के द्वार तक पहुंच गया, तब उन्होंने सर स्टेफर्ड क्रिप्स को , जो मंत्रिमंडल के थे, ब्रिटिश सर के प्रस्तावों की घोषणा के प्रारूप के साथ भेजा । ये प्रस्ताव (युद्ध को समाप्ति पर) अंगीकार किए जाने वाले थे यदि (कांग्रेस और मुस्लिम लीग) दो प्रमुख राजनीतिक दल उन्हें स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाएं । मुख्य प्रस्ताव इस प्रकार थे:

  • (क) भारत के संविधान की रचना भारत के लोगों द्वारा निर्वाचित संविधान सभा करेगी;
  • (ख) संविधान भारत को डोमिनियन प्रास्थिति और ब्रिटिश राष्ट्रकुल में बराबर की भागीदारी देगा;
  • (ग) सभी प्रान्तों और देशी रियासतों से मिलकर एक संघ बनेगा; किन्तु
  • (घ) कोई प्रान्त (या देशी रियासत) जो संविधान को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हो तत्समय विद्यमान अपनी सांविधानिक स्थिति बनाए रखने के लिए स्वतंत्र होगा और इस प्रकार सम्मिलित न होने वाले प्रान्तों से ब्रिटिश सरकार पृथक् सांविधानिक व्यवस्था कर सकेगी ।
  • किन्तु दोनों राजनीतिक दल इन प्रस्तावों को स्वीकार करने के लिए सहमत नहीं हो सके । मुस्लिम लीग ने इस बात पर बल दिया,-
  • (क) कि भारत को साम्प्रदायिक आधार पर दो स्वतंत्र राज्यों में विभाजित किया जाए और श्री जिन्ना द्वारा बताए गए कुछ प्रान्तों को मिलाकर एक स्वतंत्र मुस्लिम राज्य की स्थापना की जाए, जिसे पाकिस्तान कहा जाएगा ।
  • (ख) एक संविधान सभा के स्थान पर दो संविधान सभाएं होनी चाहिए अर्थात् पाकिस्तान के निर्माण के लिए  पृथक् संविधान सभा होगी ।

ब्रिटिश मंत्रिमडल का प्रतिनिधिमंडल

क्रिप्स के प्रस्तावों के अस्वीकार हो जाने के पश्चात् और कांग्रेस द्वारा “भारत छोड़ो” आन्दोलन प्रारम्भ करने के बाद दोनों दलों को एकमत करने के लिए बहुत से प्रयत्न किए गए जिनमें गवर्नर-जनरल, लार्ड बावल की प्रेरणा से किया गया शिमला सम्मेलन भी है । इन सबके असफल हो जाने पर ब्रिटिश मंत्रिमंडल ने अपने तीन सदस्य दल एक और गम्भीर प्रयत्न करने के लिए भेजे । किन्तु यह प्रतिनिधिमंडल भी दोनो प्रमुख रानीतिक दलों के बीच सहमति लाने में असफल रहा । परिणामस्वरूप उसे अपने ही प्रस्ताव रखने पड़े जिनको भारत और इंग्लैंड में 16 मई 1946 को एक साथ घोषणा की गई ।

मंत्रिमंडलीय प्रतिनिधिमंडल के प्रस्तावों में भारत का संघ बनाने और उसका विभाजन करने के बीच समझौता लाने का प्रयत्न किया गया । मंत्रिमंडलीय प्रतिनिधिमंडल ने पृथक् संविधान सभा और मुसलमानों के लिए पृथक राज्य के दावे को स्पष्टतः नामंजूर कर दिया । जिस योजना की सिफारिश उन्होंने की उसमें मुस्लिम लीग के दावे को पीछे जो सिद्धान्त था उसको लगभग स्वीकार कर लिया गया । उस योजना के मुख्य लक्ष्य ये थे,

(क) एक भारत संघ होगा जो ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों से मिलकर बनेगा और जिसकी विदेश कार्य प्रतिरक्षा और संचार के विषयों पर अधिकारिता होगी । शेष सभी शक्तियां प्रान्तों और राज्यों में निहित होंगी ।

(ख) संच को एक कार्यपालिका और एक विधान मंडल होगा जो प्रान्तों और राज्यों के प्रतिनिधियों से गठित होगा । किन्तु जब विधान मंडल में कोई प्रमुख सांप्रदायिक प्रश्न उठेगा तो उसका विनिश्चय दोनों प्रमुख समुदायों के उपस्थित और मतदान करने वाले तथा सभी उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा ।

प्रान्त इस बात के लिए स्वतंत्र होंगे कि वे कार्यपालिका और विधान मंडलों के गुट बना लें और प्रत्येक गुट उन प्रान्तीय विषयों को अवधारित करने के लिए सक्षम होगा जिन पर गुट संगठन की अधिकारिता होगी ।

संविधान का निर्माण कैसे हुआ

कैबिनट मिशन ने जा स्कीम अधिकथित की थी वह सिफारिश के रूप में थी । मिशन की यह धारणा थी कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच सहमति होकर उसे स्वीकार कर लिया जाएगा । किन्तु संविधान सभा के लिए निर्वाचन होने के पश्चात् एक विचित्र परिस्थिति उत्पन्न हो गई । मुस्लिम लीग ने निर्वाचन में भाग लिया और उसके प्रत्याशी चुने गए किन्तु इसी बीच कैबिनेट के “गुट सम्बन्धी खडों” के निर्वचन के बारे में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद हो गए । ब्रिटिश सरकार ने इस प्रक्रम पर हस्तक्षेप किया और लंदन में नेताओं को यह बताया कि लीग का पक्ष सही है ।

इस प्रकार पहने पहन ब्रिटिश सरकार ने यह स्वीकार किया कि दो राज्य और दो संविधान सभाएं बन सकती है  । इसका परिणाम यह हुआ कि 9 दिसंबर, 1946 को जब संविधान सभा पहली बार अधिविष्ट हुई तब मुस्लिम लीग के सदस्य उपस्थित नहीं हुए और संविधान सभा ने मुस्लिम लीग के सदस्यों के बिना कार्य प्राम्भ किया ।

संविधान का निर्माण कैसे हुआ 20 फरवरी, 1947 का ब्रिटिश सरकार का कथन

इसके बाद मुस्लिम लीग ने यह कहा कि भारत को संविधान सभा को विघटित किया जाना चाहिए क्योंकि उसमें भारत के सभी भागों के लोगों को पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं था दूसरी ओर, ब्रिटिश सरकार ने अपने 20 फरवरी, 1947 के कथन में यह घोषणा की,

(क) कि जून, 1948 को समाप्ति पर भारत पर ब्रिटिश शासन समाप्त हो जाएगा । इसके बाद ब्रिटेन भारतीयों के हाथ में सत्ता सौंप देगा,

(ख) यदि तब तक पूर्ण रूप से प्रतिनिधित्व करने वाली संविधान सभा कैबिनेट प्रतिनिधिमंडल के प्रस्तावों के अनुसार संविधान के निर्माण के काम में असफल रहती है तो,

“हिज मैजेस्टी की सरकार इस बात पर विचार करेगी कि किसे ब्रिटिश भारत में केन्द्रीय सरकार को शक्ति सौपी जाए और क्या ब्रिटिश भारत के लिए केन्द्रीय सरकार की सम्पूर्ण शक्ति सौंपी जाए या कुछ क्षेत्रों में विद्यमान प्रान्तीय सरकार को सौंपी जाए या किसी ऐसी रीति से सौंपी जाए जो सर्वाधिक युक्तियुक्त हो और भारत की जनता के सर्वोत्तम हित में हो ।”

इसका परिणाम वही हुआ जो होना था और लीग ने संविधान सभा में संयुक्त होना आवश्यक नहीं समझा और “मुस्लिम भारत” के लिए संविधान सभा की मांग पर बल देती रही ।

इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने लार्ड वावेल के स्थान पर लार्ड माउंटबेटन को भारत के गवर्नर-जनरल के रूप में भेजा जिससे शक्ति के अन्तरण की तैयारियां शीघ्र हो सकें । इस शक्ति अन्तरण के लिए एक कठोर समय सीमा तय कर दी गई थी । लार्ड माउंटबेटन ने कांग्रेस और लीग में यह स्पष्ट समझौता कराया कि पंजाब और बंगाल के समस्या वाले प्रान्तों का विभाजन किया जाएगा जिससे कि इन प्रान्तों में हिन्दू और मुस्लिम बहुमत वाले खंड बनाए जाएंगे । तब लीग को अपना पाकिस्तान मिल जाएगा जिसे कैबिनेट मिशन ने ठुकरा दिया था-जिसमें असम, पूर्वी पंजाब और पश्चिमी बंगाल नही होगा । कांग्रेस जो मुसलमानों को छोड़कर भारत के सभी लोगों की प्रतिनिधि थी उसे वह शेष भारत मिलेगा जहां मुस्लिम अल्पमत में थे ।

संविधान का निर्माण ब्रिटिश सरकार का 3 जून, 1947 का कथन

पंजाब और बंगाल इन दोनों प्रान्तों के विभाजन का वास्तविक निर्णय इन दोनों प्रान्तों की विधान सभाओं के सदस्यों के मत पर छोड़ दिया गया । ये विधान सभाएं दो भागों में अधिविष्ट होंगी । इस योजना को माउंटबेटन योजना नाम दिया गया । इसे ब्रिटिश सरकार ने 3-6-1947 को अपने कथन द्वारा एक औपचारिक रूप प्रदान किया । इसमें अन्य बातों के साथ-साथ यह उपबन्ध था कि,

“बंगाल और पंजाब की प्रान्तीय विधान सभाओं को (यूरोपीय सदस्यों का अपवर्जित करते हुए) यह कहा कि. वे दो भागों में अधिविष्ट हो । एक भाग में मुस्लिम बहुमत वाले जिलो के प्रतिनिधि होंगे और दूसरे भाग में शेष प्रान्त के । दोनों भागों के सदस्य पृथक् रूप से बैठकर इस बात के लिए मतदान देंगे कि क्या उस प्रान्त का विभाजन किया जाए । यदि दोनों भागों में सादे बहुमत से विभाजन के पक्ष में निर्णय होता है तो विभाजन होगा और तदनुसार प्रबन्ध किए जाएंगे । यदि विभाजन का निर्णय होता है तो प्रत्येक विधान सभा का वह भाग उन क्षेत्रों के बारे में जिनका वह प्रतिनिधित्व करता है यह निर्णय करेगा कि वह विद्यमान संविधान सभा में सम्मिलित होगा या पृथक् संविधान सभा में ।”

यह प्रस्ताव भी किया गया कि पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त में और सिलहट के मुस्लिम बहुमत वाले जिले में जनमत संग्रह किया जाएगा कि वे भारत में सम्मिलित होना चाहते है या पाकिस्तान में । इस कथन में यह घोषणा भी की गई कि सम्राट का यह आशय है कि चालू सत्र के दौरान इस वर्ष डोमिनियन प्रास्थिति के आधार पर एक या दो उत्तरवर्ती प्राधिकारियों को, घोषणा के परिणामस्वरूपम किए गए विनिश्चयों के अनुसार, शक्ति का अन्तरण करने के लिए विधान पुरःस्थापित किया जाए ।

उपर्युक्त योजना के अनुसार मतदान का परिणाम पहले से मालूम था । दोनों प्रान्तों (पश्चिमी बंगाल और पूर्वी बंगाल) के मुस्लिम बहुमत वाले क्षेत्रों के प्रतिनिधियों विभाजन और नई संविधान सभा में सम्मिलित होने के पक्ष में मतदान किया । पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त और सिलहट में जनमत पाकिस्तान के पक्ष में पाया गया ।

26 जूलाई, 1947 को गवर्नर-जनरल ने पाकिस्तान के लिए पृथक् संविधान सभा की स्थापना की घोषणा की । 3 जून, 1947 की योजना के क्रियान्वित हो जाने पर उस घोषणा के अनुसार ब्रिटिश पार्लमेंट द्वारा अधिनियम बनाकर शक्ति का अन्तरण करने में अब कोई कठिनाई नहीं थी ।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 का अधिनियमन जिन परिस्थितियों के परिणामस्वरूप हुआ उन्हें इसके बाद के अध्याय में स्पष्ट किया जाएगा । किन्तु संविधान सभा द्वारा स्वतंत्र भारत के लिए संविधान बनाए जाने के पहले तक इस अधिनियम से शासन की संरचना में जो परिवर्तन किए गए उन्हें वर्तमान संदर्भ में बताना उचित होगा जिससे कि संविधान की भूमिका का सही और विस्तृत ज्ञान हो सके ।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के अनुसरण में भारत शासन अधिनियम, 1935 का भारत और पाकिस्तान में, अनुकूलन आदेशों द्वारा संशोधन किया गया जिससे दोनों डोमिनियनों में संविधान सभा द्वारा भावी संविधान का निर्माण पूरा हो जाने तक अंतरिम संविधान की व्यवस्था हो सके ।

इन अनुकूलनों के निम्नलिखित मुख्य परिणाम थे:

(क) ब्रिटिश पार्लियामेंट की प्रभुता और उत्तरदायित्व का उत्सादन भारत शासन अधिनियम, 1858 द्वारा भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से सम्राट को अन्तरित कर दिया गया था । इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट भारत की प्रत्यक्ष संरक्षक बन गई और भारत के प्रशासन के लिए सेक्रेटरी आफ स्टेट के पद का सृजन किया गया । भारत के मामलों के लिए सेक्रेटरी आफ स्टेट संसद् के प्रति उत्तरदायी था । यह नियंत्रण धीरे-धीरे शिथिल होता गया फिर भी भारत का गवर्नर-जनरल और प्रान्तो के गवर्नर भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 तक सेक्रेटरी आफ स्टेट के सीधे नियंत्रण के अधीन बने रहे जिससे कि,

  • “संविधान के सिद्धांत रूप में भारत की सरकार हिज मैजेस्टी की सरकार के अधीनस्थ सरकार थी ।”
  • भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम ने इस सांविधानिक स्थिति में आमूल परिवर्तन कर दिया । उसने यह घोषित किया कि 15 अगस्त, 1947 से (जिसे “नियत दिन” कहा गया) भारत अधीनस्थ राज्य नही रहा और देशी रियासतों पर ब्रिटिश सम्राट की प्रभुता तथा जनजाति क्षेत्रों से उनके संधि संबंध उसी दिन से समाप्त हो गए ।
  • ब्रिटिश सरकार और पार्लियामेंट का भारत के प्रशासन के लिए उत्तरदायित्व समाप्त हो जाने के कारण भारत के लिए सेक्रेटरी आफ स्टेट का पद भी समाप्त कर दिया गया ।

(ख) सम्राट प्राधिकार का स्रोत नही रहा जब तक भारत ब्रिटिश सम्राट का अधीनस्थ राज्य था तब तक भारत का शासन हिज मैजेस्टी ‘के नाम से चलाया जाता था । 1935 के अधिनियम के अधीन परिसंघ स्कीम बनने के कारण सम्राट को और भी प्रमुखता मिली । परिसंघ की सभी इकाइयां प्रान्त और केन्द्र, अपना प्राधिकार सीधे सम्राट से प्राप्त करते थे । किन्तु स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के अधीन भारत और पाकिस्तान को डोमिनियनों में से कोई भी ब्रिटिश द्वीप समूह से प्राधिकार नहीं लेती थी ।

(ग) गवर्नर-जनरल और प्रान्तीय गवर्नरों का सांविधानिक अध्यक्ष के रूप में कार्य करना-दोनों डोमिनियनों को गवर्नर-जनरल दोनों नई डोमिनियनों के सांविधानिक अध्यक्ष हो गए । यह” डोमिनियन प्रास्थिति “की अवश्यंभावी परिणति थी । यह प्रास्थिति भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा नहीं दी गई थी किन्तु भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 द्वारा प्रदान की गई ।

स्वतंत्रता अधिनियम अधीन किए गए अनुकूलनों के अनुसार 1919 के अधिनियम के अधीन बनाई गई कार्यकारी परिषद् या 1935 के अधिनियम में उपबन्धित’ परामर्शशदाता ‘समाप्त हो गए । गवर्नर-जनरल और प्रान्तीय गवर्नर मंत्रीपरिषद् की सलाह पर कार्य करने लगे । मंत्रीपरिषद् को डोमिनियन विधान मंडल या प्रान्तीय विधान मंडल का विश्वास होना आवश्यक था । भारत शासन अधिनियम, 1935 से” स्वविवेकानुसार “,” अपने विवेकानुसार कार्य करते हुए “और” अपने स्वयं के विवेक से “शब्द जहां-जहां आते थे वहां से निकाल दिए गए । इसका परिणाम यह हुआ कि ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा था जिसमें सांविधानिक अध्यक्ष मंत्रियों की सलाह के बिना या उनकी इच्छा के विरूद्ध कार्य कर सके । इसी प्रकार गवर्नर-जनरल की उस शक्ति का भी विलोप कर दिया गया जिसके अनुसार वह गवर्नरों से यह अपेक्षा कर सकता था कि वे उसके अभिकर्ता के रूप में कार्य करें ।

गवर्नर-जनरल और गवर्नरों के विधान बनाने की साधारण शक्तियां भी नष्ट हो गई । वे अब विधान मंडल की प्रतियोगिता में अधिनियम नही पारित कर सकते थे और न ही सामान्य विधायी प्रयोजनों के लिए उद्घोषणाए और अध्यादेश निकाल सकते थे । उनकी प्रमाणित करने की शक्ति भी समाप्त कर दी गई । प्रान्तीय संविधान को निलम्बित करने की गवर्नर की शक्ति भी ले ली गई । सम्राट का वीटो का अधिकार चला गया और अब गवर्नर-जनरल किसी विधेयक को सम्राट की अनुमति के लिए आरक्षित नही कर सकता था ।

(घ) डोमिनियन विधान मंडल की प्रभुता-14-8-1947 को भारत का केन्द्रीय विधान मंडल, जो विधान सभा और राज्य परिषद् से मिलकर बना था, विघटित हो गया ।“ नियत दिन “से और जब तक दोनों डोमिनियनों की संविधान सभाएं नए संविधानों की रचना न कर लें और उनके अधीन नए विधान मंडल गठित न हो जाएं तब तक संविधान सभा को ही अपने डोमिनियन के केन्द्रीय विधान मंडल के रूप में कार्य करना था । दूसरे शब्दों में, दोनों डोमिनियनों की संविधान को सभाओं को (जब तक कि वह स्वयं अन्यथा इच्छा प्रकट न करें) दोहरा काम करना था सांविधानिक और विधायी ।

  • डोमिनियन विधान मंडल को प्रभुता सम्पूर्ण थी और किसी भी मामले में विधान बनाने के लिए अब गवर्नर-जनरल की मंजूरी की आवश्यकता नही थी तथा ब्रिटिश साम्राज्य की किसी विधि के उल्लंघन के कारण कोई विरोध भी नही हो सकता था ।
  • भारत की संविधान सभा जो संविधान सभा अविभाजित भारत के लिए निर्वाचित की गई थी और जिसकी पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को हुई थी, वही भारत डोमिनियन की प्रभुत्वसंपन्न संविधान सभा के रूप में 14 अगस्त, 1947 को पुनः समवेत हुई ।
  • इसके गठन के बारे में यह स्मरणीय है कि यह कैबिनेट प्रतिनिधिमंडल द्वारा सिफारिश की गई योजना के अनुसार प्रान्तीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन से निर्वाचित हुई थी ।

इस योजना की प्रमुख बातें निम्नलिखित थीः

(1) प्रत्येक प्रान्त को और प्रत्येक देशी रियासत या रियासतों के समूह को अपनी जनसंख्या के अनुपात में कुल स्थान आवंटित किए गए थे । स्थूल रूप से 10 लाख के लिए एक स्थान का अनुपात था । इसके परिणामस्वरूप प्रान्तों को 292 सदस्य निर्वाचित करने थे और देशी रियासतों को कम से कम 93 स्थान दिए गए ।

(2) प्रत्येक प्रान्त के स्थानों को तीन प्रमुख समुदायों में जनसंख्या के अनुपात में बांटा गया । ये संप्रदाय थे मुस्लिम, सिख और साधारण ।

(3) प्रान्तीय विधान सभा में प्रत्येक समुदाय के सदस्यों ने एकल संक्रमणीय मत से आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन किया ।

(4) देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के चयन को पद्धति परामर्श से तय की जानी थी ।

3 जून, 1947 की योजना के अधीन विभाजन के परिणामस्वरूप पाकिस्तान के लिए एक पृथक् संविधान सभा गठित की गई । बंगाल, पंजाब, सिंध, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त, बलोचिस्तान और असम के सिलहट जिले (जो जनमत संग्रह द्वारा पाकिस्तान में सम्मिलित हुए थे) के प्रतिनिधि भारत की संविधान सभा के सदस्य नहीं रहे । पश्चिमी बंगाल और पूर्वी पंजाब के प्रान्तों में नए निर्वाचन किए गए । परिणामस्वरूप जब संविधान सभा 31 अक्तूबर, 1947 को पुनः समवेत हुई तो सदन की सदस्यता घटकर 299 हो गई । इनमें से 284 सदस्य, 26 नवंबर, 1949 को उपस्थित थे और उन्होंने अन्तिम रूप से पारित संविधान पर अपने हस्तक्षर किए ।

प्रस्तावित संविधान के प्रमुख सिद्धान्तों की रूपरेखा सभा की विभिन्न समितियों ने तैयार की थी । उदारहरणार्थ संघ संविधान समिति, संघ शक्ति समिति, मूल अधिकार समिति आदि । इन समितियों के प्रतिवेदनों पर साधारणतः विचार-विमर्श करते हुए सभा ने 29 अगस्त, 1947 को एक प्रारूप समिति की स्थापना की । इस प्रारूप समिति ने जिसके अध्यक्ष डा. अम्बेडकर थे, सभा के विनिश्चयों को और उसके साथ आनुकल्पिक और अतिरिक्त प्रस्तावों को सम्मिलित करते हुए भारत के संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया । इसे फरवरी, 1948 में प्रकाशित किया गया । प्रारूप के उपबन्धों पर खंडवार विचार करने के लिए संविधान सभा की बैठक इसके बाद नवंबर, 1948 में हुई । अनेकों सत्रों के बाद खंडों पर विचार करने की प्रक्रिया 17 अक्तूबर, 1949 को पूरी हुई ।

संविधान सभा की बैठक तृतीय वाचन के लिए 14 नवंबर, 1949 को हुई और यह वाचन 26 नवंबर, 1949 को समाप्त हुआ । इसी तारीख को संविधान पर सभा के सभापति के हस्ताक्षर हुए और उसे पारित ‘घोषित किया गया । नागरिकता, निर्वाचन और अन्तरिम संसद् से सम्बन्धित उपबन्धों को तथा अस्थायी और संक्रमणकारी उपबन्धों को तुरन्त प्रभावी किया. गया अर्थात् वे 26 नवंबर, 1949 को लागू किए गए । शेष संविधान 26 जनवरी, 1950 को प्रवृत्त हुआ और इस तारीख को संविधान में उसके प्रारम्भ की तारीख कहा गया ।

राज्य पुनर्गठन से उत्पन्न समस्याएँ

भाषायी आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से अनेक समस्याएँ पैदा हो गयी जिनमें निम्न कुछ प्रमुख हैं: 1. क्षेत्रीयता की भावना विकसित करने के कारण भाषायी राज्य राष्ट्रीय एकता के लिये एक खास किस्म का खतरा पैदा कर देते हैं । वे राज्यों के बीच आर्थिक सहयोग को अवरूद्ध करते हैं और पड़ोसी राज्यों के प्रति विरोधी भावनाओं को बढ़ावा देते हैं । संसाधनों को बांटने की बजाय’ अपने संसाधनों का स्व-उपभोग करने की प्रबल भावना विकसित हो जाती है । 2. पुनर्गठन ने क्षेत्रीय, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भाषायी आधारों पर जो जोर दिया है उससे राष्ट्रीय एकता की भावना खासी कमजोर पड़ी. है । बम्बई को मुम्बई और मद्रास राज्य को तमिलनाडु और हाल में मद्रास नगर को चेन्नई, एवं कलकत्ता को कोलकाता का नामकरण इसी स्थानीयता का उदाहरण हैं । 3. भाषायी राज्यों के गठन ने योजनाबद्ध आर्थिक विकास की गति काफी धीमी कर दी है क्योंकि राज्य-विशेष की स्थानीय भावना राज्य के संसाधनों का दूसरे राज्यों के लाभ हेतु उपयोग पर अक्सर आपत्ति करती है । सिविल सेवाओं को छोड़कर अंतर-राजकीय रोजगार संभावनाओं में अपेक्षानुकूल वृद्धि नहीं हुई है क्योंकि राज्य भाषायी सिद्धांतों पर पुनर्गठित हैं ।

निष्कर्ष

भारत को भाषायी आधार पर बांटने का निर्णय सांस्कृतिक दृष्टि से तो सही था क्योंकि अधिकांश मामलों में सांस्कृतिक क्षेत्र भौगोलिक विभाजनों से मेल खाते हैं, भाषायी राज्यों ने क्षेत्रीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार में सहयोग किया है और इस प्रकार बहुतेरे राज्यों की खास पहचान विकसित हुई है । तथापि, यह विभाजन आर्थिक और भौगोलिक दृष्टि से सही नहीं है क्योंकि यह समस्याएँ हल करने की बजाए, समस्याएँ पैदा करता है ।

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संविधान की प्रमुख विशेषताएं

भारतीय संविधान की संवैधानिक पृष्ठभूमि क्या है |

भारतीय संविधान की संवैधानिक पृष्ठभूमि: भारतीय गणतंत्र का संविधान राजनैतिक क्रान्ति का परिणाम नहीं है। यह जनता के मान्य प्रतिनिधियों के निकाय के अनुसंधान और विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप जन्मा है। इस निकाय ने प्रशासन की विद्यमान पद्धति में सुधार लाने का प्रयत्न किया अतएव संविधान को सही रूप से समझने के लिए सांविधानिक विकास पर दृष्टिपात करना अनिवार्य हो जाता है

संविधान की संवैधानिक पृष्ठभूमि

यहां पर हम भारतीय संविधान की संवैधानिक पृष्ठभूमि की व्याख्या करेंगे. 1949 का संविधान पिछली दो शताब्दियों की संवैधानिक दस्तावेजों केवल एक बात में भिन्नता रखता है। वह यह कि अन्य दस्तावेज साम्राज्यवादी शक्तियों द्वारा लादे गए थे किन्तु गणतंत्र संविधान लोगों ने प्रभुत्वसंपन्न संविधान सभा में समवेत अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से स्वयं बनाया। इससे इस नए विलेख की गरिमा और नैतिक मूल्य प्रकट होता है और इस बात का महत्व भी स्पष्ट हो जाता हैं कि क्यों पहले से विद्यमान प्रणाली में कुछ नए उपबन्ध जोड़े गए।

भारत शासन अधिनियम, 1858

हमारे वर्तमान प्रयोजनों के लिए हमें 1858 से पीछे जाने की आवश्यकता नहीं हैं। इस वर्ष ब्रिटिश सम्राट ने भारत की प्रभुसत्ता ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर अपने में निहित कर ली थी और ब्रिटिश पार्लियामेंट ने ब्रिटेन की सरकार द्वारा सीधे शासन चलाने के लिए भारत के शासन का पहला कानून बनाया था-भारत शासन अधिनियम, 1858 यह अधिनियम हमारे सर्वेक्षण का प्रारम्भिक स्थल है क्योंकि इसमें सम्राट के आत्यन्तिक नियंत्रण का सिद्धान्त प्रमुख था। संविधान के बनने तक, इस अधिनियम के पश्चात् का इतिहास सम्राट के नियंत्रण के धीरे-धीरे शिथिलीकरण का और उत्तरदायित्वपूर्ण सरकार के उत्क्रमण का इतिहास है।

1858 के अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं

(क) देश का प्रशासन न केवल ऐकिक था बल्कि कठोरता से केन्द्रीकृत भी था। राज्यक्षेत्र को प्रान्तों में बांटा गया था और प्रत्येक के शीर्ष पर एक गवर्नर या लेफिटनेंट गवर्नर था तथा उसकी सहायता के लिए कार्यकारी परिषद् थी। किन्तु ये प्रान्तीय सरकारें भारत सरकार के अभिकरण मात्र थीं। उन्हें प्रान्त के शासन से सम्बन्धित सभी मामलों में गवर्नर-जनरल के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अधीन काम करना पड़ता था।

(ख) कृत्यों का कोई पृथक्करण नहीं था। भारत के शासन के लिए सभी प्राधिकार-सिविल और सैनिक, कार्यपालक और विधायी सपरिषद् गवर्नर-जनरल में निहित थे जो सेक्रेटरी आफ स्टेट के प्रति उत्तरदायी था।

(ग) भारत के प्रशासन पर सेक्रेटरी आफ स्टेट का आत्यन्तिक नियंत्रण था। इस अधिनियम द्वारा भारत के शासन या राजस्व से किसी भी प्रकार से सम्बन्धित सभी कार्यों. संक्रियाओं और बातों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण सेक्रेटरी आफ स्टेट में निहित किया गया था। ब्रिटिश पार्लियामेंट के प्रति अन्तिम रूप से उत्तरदायी रहते हुए वह अपने अभिकर्ता गवर्नर-जनरल के माध्यम से भारत का प्रशासन चलाता था। उसी का वाक्य अन्तिम होता था चाहे वह नीति के विषय में हो या अन्य ब्योरों के विषय में।

(घ) प्रशासन का सम्पूर्ण तंत्र अधिकार तंत्र था, जिसका भारत की जनता की राय से कोई लेना देना नहीं था।

भारतीय परिषद् अधिनियम, 1861

भारतीय परिषद् अधिनियम, 1861 से लोक प्रतिनिधित्व के तत्त्व का चुटकीभर समावेश किया गया था। इसमें यह उपबन्ध किया गया था कि गवर्नर-जनरल की कार्यकारी परिषद् में, जो अभी तक अनन्य रूप से आधिकारियों से मिलकर बनती थी, उस समय जब परिषद् विधान परिषद् के रूप में विधायी कार्य करेगी, कुछ गैर सरकारी सदस्य भी सम्मिलित किए जाएंगे। यह विधान परिषद् किसी भी प्रकार से न तो लोक प्रतिनिधि थी और न ही इसमें विचार-विमर्श होता था। सदस्य नामनिर्दिष्ट किए जाते थे और उनका कार्य, गवर्नर-जनरल द्वारा उनके समक्ष रखे गए विधायी प्रस्तावों पर विचार करने तक ही सीमित था। वह प्राधिकारियों के प्रशासनिक कृत्यों या उनके आचरण की किसी भी रीति में आलोचना नहीं कर सकती थी। विधान के बारे में भी प्रभावी शक्तियां गवर्नर-जनरल के पास थी, जैसे

(क) कुछ विषयों के सम्बन्ध में विधेयक को पूर्वानुमोदन प्रदान करना जिसके बिना विधान परिषद् में उसे पुरःस्थापित नहीं किया जा सकता था,

(ख) जो विधेयक पारित किए गए उन्हें वीटो करना या सम्राट के विचार के लिए आरक्षित करना,

(ग) अध्यादेश द्वारा विधायन, अध्यादेश का प्राधिकार विधान परिषद् द्वारा बनाए गए अधिनियमों के समान था। 1861 के अधिनियम में इसी प्रकार के उपबन्ध प्रान्तों में विधान परिषदों के लिए भी थे। किन्तु इन प्रान्तीय परिषदों में कुछ मामलों की बाबत विधान प्रारम्भ करने के लिए भी गवर्नर-जनरल की पूर्व अनुमति आवश्यक थी

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भारतीय परिषद् अधिनियम, 1892

भारतीय और प्रान्तीय विधान परिषदों के बारे में उल्लिखित स्थिति में दो सुधार भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 द्वारा किए गए। एक तो यह कि-(क) भारतीय विधान परिषद् में शासकीय सदस्यों का बहुमत रखा गया किन्तु गैर-सरकारी सदस्य बंगाल चैम्बर आफ कामर्स और प्रान्तीय विधान परिषद् द्वारा नामनिर्देशित होने लगे। प्रान्तीय परिषदों के गैर-सरकारी सदस्य कुछ स्थानीय निकायों द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने लगे। ये स्थानीय निकाय थे विश्वविद्यालय, जिला बोर्ड, नगरपालिका आदिः (ख) परिषदों को राजस्व और व्यय के वार्षिक कथन अर्थात् बजट पर विचार-विमर्श करने को और कार्यपालिका से प्रश्न पूछने की शक्ति दी गई।

भारतीय परिषद् अधिनियम 1909

मोर्ले-मिंटो के सुधार द्वारा प्रातिनिधिक और निर्वाचित तत्व का समावेश करने का पहला प्रयत्न किया गया। यह नामकरण तत्कालीन भारत के लिए सेक्रेटरी आफ स्टेट (लार्ड मोर्ले) और वाइसराय (लार्ड मिंटों) के नाम से हुआ। इस सुधार को भारतीय परिषद् अधिनियम, 1909 नाम से लागू किया गया।

प्रान्तीय विधान परिषद् सम्बन्धित परिवर्तन प्रगामी थे। इन परिषदों के आकार में वृद्धि की गई और उसमें कुछ निर्वाचित गैर-सरकारी सदस्य सम्मिलित किए गए जिससे शासकीय बहुमत समाप्त हो गया। केन्द्र की विध गान परिषद् में भी निर्वाचन का समावेश हुआ किन्तु शासकीय बहुमत बना रहा।

विधान परिषदों के विचार-विमर्श के कृत्यों में भी इस अधिनियम द्वारा वृद्धि हुई। इससे उन्हें यह अवसर दिया गया कि वे बजट या लोकहित के किसी विषय पर संकल्प प्रस्तावित करके प्रशासन की नीति पर प्रभाव डाल सकें। कुछ विनिर्दिष्ट विषय इसके बाहर थे जैसे सशस्त्र बल, विदेश कार्य और देशी रियासतें।

1909 के अधिनियम द्वारा जो निर्वाचन की पद्धति अपनाई गई उसमें एक बहुत बड़ा दोष था। इसमें पहली बार मुस्लिम समुदाय के लिए पृथक् प्रतिनिधित्व का उपबन्ध किया गया था। इसी से पृथक्तावाद का बीजारोपण हुआ जिसकी परिणति इस देश के दुखद विभाजन में हुई। मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचक मंडल का विचार और राजनैतिक दल के रूप में मुस्लिम लीग की स्थापना एक ही समय में हुई (1906) ।

इसके पश्चात् भारत शासन अधिनियम, 1915 पारित किया गया। इसका उद्देश्य पूर्ववर्ती भारत शासन अधिनियमों को समेकित करना था जिससे कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका से सम्बन्धित भारत शासन के सभी विद्यमान उपबन्ध एक ही अधिनियम में प्राप्त हो जाएं।

भारत शासन अधिनियम 1919

भारत के सांविधानिक विकास में इसके बाद मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड प्रतिवेदन का महत्वपूर्ण स्थान है। इसी कारण आगे चलकर भारत शासन अधिनियम, 1919 अधिनियमित किया गया। वास्तव में यह संशोधनकारी अधिनियम था किन्तु संशोधनों द्वारा विद्यमान पद्धति में अधिष्ठायी परिवर्तन किए गए।

मोर्ले-मिंटो सुधार से भारत के राष्ट्रवादियों की आकांक्षाओं की तुष्टि नहीं हो सकी क्योंकि यह उद्देश्य नहीं था कि इन सुधारों से देश में शासन की संसदीय पद्धति स्थापित की जाए और सभी प्रश्नों पर अन्तिम विनिश्चय कार्यपालिका के हाथ में था जो किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं थी।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जिसकी स्थापना 1885 में हुई थी अभी तक नरम लोगों के नियंत्रण में थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वह अधिक सक्रिय हो गई और उसने स्वराज्य का अभियान प्रारम्भ किया (जिसे ‘होम रूल’ आंदोलन कहा गया)। इस लोकप्रिय मांग के उत्तर में ब्रिटिश सरकार ने 20 अगस्त, 1917 को यह घोषणा की कि सरकार की नीति यह हैं-“कि प्रशासन को प्रत्येक शाखा में भारतीयों को अधिकाधि क सम्मिलित किया जाए और धीरे-धीरे स्वतंत्र संस्थाओं का विकास किया जाए जिससे ब्रिटिश साम्राज्य के अविभाज्य भाग के रूप में ब्रिटिश भारत में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की जा सके।”

भारत के लिए तत्कालीन सेक्रेटरी आफ स्टेट (श्री इ.एस.मोंटेग्यू) और गवर्नर-जनरल (लार्ड चेम्सफोर्ड) को उक्त नीति के क्रियान्वयन के लिए प्रस्ताव बनाने का कार्य सौंपा गया और भारत शासन अधिनियम, 1919 में उनकी सिफारिशों को एक विधिक रूप प्रदान किया गया।

भारत शासन अधिनियम 1919 के अधिनियम के मुख्य लक्षण

(1) प्रान्तों में द्वैध शासन– प्रान्तों में उत्तरदायी सरकार को स्थापना का प्रयत्न किया गया। साथ ही इस बात का ध्यान रखा गया कि प्रान्तों के प्रशासन के लिए गवर्नर का (गवर्नर-जनरल के माध्यम से) उत्तरदायित्व कम न हों। इसके लिए द्वैध शासन या द्विणासन की पद्धति का सहारा लिया गया। प्रशासन के विषयों को (अधिनियम के अधीन नियमों द्वारा) दो प्रवर्गों में बांटा गया-केन्द्रीय और प्रान्तीय। केन्द्रीय विषय वे थे जो केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण में अनन्य रूप से रखे गए। प्रान्तीय विषयों को दो भागों में बांटा गया-अन्तरित और आरक्षित।

प्रान्तों को सौंपे गए विषयों में से “अन्तरित विषयों” का प्रशासन गवर्नर द्वारा विधान परिषद् को उत्तरदायी मंत्रियों की सहायता से किया जाना था। विधान परिषद् में निर्वाचित सदस्यों का अनुपात बढ़ाकर 70 प्रतिशत कर दिया गया। इस प्रकार उत्तरदायी सरकार की नींव अन्तरित विषयों के संकीर्ण क्षेत्र में डाली गई।

दूसरी ओर, “आरक्षित विषयों” का प्रशासन गवर्नर और उसकी कार्यकारी परिषद् द्वारा किया जाना था। यह विधान मंडल के प्रति कोई उत्तरदायी नहीं था।

(2) प्रान्तों पर केन्द्रीय नियंत्रण का शिथिलीकरण– भारत शासन अधिनियम, 1919 के अधीन बनाए गए नियमों ने जिन्हें न्यागमन नियम कहा जाता था प्रशासन के विषयों का दो प्रवर्गों में विभाजन किया- केन्द्रीय और प्रान्तीय। स्थूल रूप से, अखिल भारतीय महत्व के विषयों को “केन्द्रीय” प्रवर्ग में रखा गया और प्राथमिक रूप से प्रान्तों के प्रशासन से समबन्धित विषयों को “प्रान्तीय” वर्गीकरण में रखा गया। इसका अर्थ यह हुआ कि प्रान्तों पर पूर्ववर्ती केन्द्रीय नियंत्रण प्रशासनिक, विधायी और वित्तीय विषयों में शिथिल हो गया। राजस्व के स्रोतों का भी दो प्रवर्गों में विभाजन किया गया जिससे प्रान्त अपने द्वारा संगृहीत राजस्व की सहायता से अपना प्रशासन चला सके। इस प्रयोजन के लिए प्रान्तीय बजट को भारत सरकार के बजट से अलग किया गया औ प्रान्तीय विधान मंडल को यह शक्ति दी गई कि वह अपना बजट प्रस्तुत कर सके और प्रान्त के राजस्व के स्रोतों से संबंधित अपने कर उद्गृहीत कर सके।

प्रान्तों को शक्तियों के न्यागमन को परिसंघ में शक्ति का वितरण समझना भूल होगी। 1919 के अधिनियम के अधीन प्रान्तों को शक्ति केन्द्र से प्रत्यायोजित होती थी। केन्द्रीय विधान मंडल को सम्पूर्ण भारत के लिए किसी भी विषय सम्बन्धित विधान बनाने की शक्ति थी। केन्द्रीय विधान मंडल की इस परम शक्ति के अधीन रहते हुए विधान मंडल को “देश में उस प्रान्त को गठित करने वाले राज्यक्षेत्रों की शान्ति और सुशासन के लिए विधि बनाने की शक्ति दी गई”।

प्रान्तीय विधान पर गवर्नर-जनरल के नियंत्रण को बनाए रखने के लिए यह अधिकथित किया गया कि कोई भी प्रान्तीय विधेयक, चाहे उसे गवर्नर की अनुमति मिल गई हो तो भी, तब तक विधि नहीं बनेगा जब तक कि उसे गवर्नर-जनरल की अनुमति न मिल जाए। इसी उद्देश्य से गवर्नर को यह शक्ति दी गई कि वह, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट विषयों से सम्बन्धित विधेयक को गवर्नर-जनरल के विचार के लिए आरक्षित कर सके।

(3) भारतीय विधान मंडल को और अधिक प्रातिनिधिक बनाया गया केन्द्र में उत्तरदायित्व को स्थान नहीं दिया गया। सपरिषद् गवर्नर-जनरल भारत के लिए सेक्रेटरी आफ स्टेट के माध्यम से ब्रिटिश संसद का उत्तरदायी बना रहा फिर भी भारतीय विधान मंडल को अपेक्षाकृत अधिक प्रातिनिधिक बनाया गया और पहली बार विधान मंडल द्विसदनीय किया गया। उच्चतर सदन जिसे राज्य परिषद् का नाम दिया गया 60 सदस्यों से मिलकर बनती थी जिनमें से 34 निर्वाचित थे। निचले सदन में जिसे विधान सभा का नाम दिया गया ।44 सदस्य थे, जिनमें से 104 निर्वाचित थे। दोनों सदनों की शक्तियां समान थीं किन्तु प्रदाय के लिए मतदान की शक्ति अनन्य रूप से विधान सभा को दी गई थी। निर्वाचक मंडल जाति और भाग के आधार पर बनाया गया था। इस प्रकार मोर्ले-मिंटो युक्ति को आगे बढ़ाया गया।

केन्द्रीय विधान मंडल की बाबत गवर्नर-जनरल की अध्यारोही शक्तियों को निम्नलिखित रूप में बनाए रखा गयाः (क) कुछ विषयों से सम्बन्धित विधेयकों को पुरःस्थापित करने के लिए उसकी पूर्व अनुमति आवश्यक थी; (ख) उसे भारतीय विधान मंडल द्वारा पारित किसी भी विधेयक को वीटो करने या सम्राट के विचार के लिए आरक्षित करने की शक्ति थी; (ग) उसे यह शक्ति थी कि विधान मंडल द्वारा नामंजूर किए गए या पारित न किए गए किसी विधेयक या अनुदान को प्रमाणित कर दें। ऐसे प्रमाणित करने पर उसका इस प्रकार प्रभाव होगा मानो विधान मंडल द्वारा पारित या प्रदत्त है: (घ) वह आपात की दशा में अध्यादेश बना सकता था जिनका अस्थायी अवधि के लिए विधि का बल होता था।

भारत शासन अधिनियम 1919 के अधिनियम की कमियां

(1) प्रान्तों को पर्याप्त शक्तियां प्रदान करने के बाद भी सरंचना ऐकिक और केन्द्रीकृत बनी रही। सपरिषद् गवर्नर-जनरल इस संपूर्ण सांविधानिक रचना का आधारस्तंभ था। सपरिषद् गवर्नर-जनरल के माध्यम से सेक्रेटरी आफ स्टेट और अन्तिम रूप से पार्लियामेंट भारत की शान्ति व्यवस्था और सुशासन का उत्तरदायितव निभाती थी। कोई विषय केन्द्रीय है या प्रान्तीय, यह निर्णय करने का प्राधिकार गवर्नर-जनरल को था न्यायालय को नहीं। प्रान्तीय विधान मंडल, गवर्नर-जनरल की पूर्व मंजूरी के बिना अनेकों विषयों से संबंधित विधेयकों पर विचार नहीं कर सकते थे।

(2) प्रान्तीय क्षेत्र में द्वैध शासन के कार्यकरण से सबसे अधिक असंतोष हुआ। गवर्नर को अध्यारोही वित्तीय शक्तियां थीं और विधान मंडल में शासकीय मत उसके नियंत्रण में थे इसलिए उनके मात्र यम से गवर्नर, मंत्रिमंडल की नीति को, बहुत बड़ी सीमा तक प्रभावित करता था। व्यवहार में शायद ही कोई महत्व का प्रश्न ऐसा उत्पन्न होता हो जो एक या अधिक आरक्षित विभागों को प्रभावित न करता हो। भारत के दृष्टिकोण से प्रणाली का मुख्य दोष धन पर नियंत्रण था। वित्त, आरक्षित विषय था और इसलिए कार्यकारी परिषद् के सदस्य के प्रभार में रखा जाता था मंत्री के नही। किसी भी मंत्री के लिए कोई भी प्रगतिशील काम करना धन के बिना संभव नहीं होता था और इसके साथ ही यह तथ्य भी था कि भारतीय सिविल सेवा के सदस्य जिनके माध्यम से मंत्रियों को अपनी नीतियां लागू करनी थीं, सेक्रेटरी आफ स्टेट द्वारा भर्ती किए जाते थे और उसी के प्रति उत्तरदायी रहते थे मंत्री के प्रति नहीं। इन सबके ऊपर गवर्नर की अध्यारोही शक्ति थी।

गवर्नर अन्तरित विषयों की बाबत भी सांविधानिक अध्यक्ष के रूप में काम नहीं करता था। प्रान्तीय विधान मंडलों के प्रति मंत्रियों के सामूहिक उत्तरदायित्व की कोई व्यवस्था नहीं थी। मंत्री व्यक्तिशः नियुक्त किए जाते थे, गवर्नर के सलाहकार के रूप में कार्य करते थे और वे कार्यकारी परिषद् के सदस्य से केवल इस बात में भिन्न थे कि वे गैर-सरकारी थे। गवर्नर को यह शक्ति थी कि वह मंत्रियों की सलाह के अनुसार कार्य करे या न करे। वह विधान मंडल द्वारा इंकार किए गए अनुदान को या उसके द्वारा नामंजूर किए गए विधेयक को प्रमाणित कर सकता था, यदि वह समझता था कि किसी आरक्षित विषय से सम्बन्धित उसके उत्तरदायित्व के सम्यक् निर्वहन के लिए यह आवश्यक है।

संविधान की प्रमुख विशेषताएं (Salient Features of the Constitution)

संविधान की प्रमुख विशेषताएं (Salient Features of the Constitution): भारतीय संविधान तत्वों और मूल भावना के संबंध में अद्वितीय है। हालांकि इसके कई तत्व विश्व के विभिन्न संविधानों से उधार लिये गये हैं। भारतीय संविधान के कई ऐसे तत्व हैं, जो उसे अन्य देशों के संविधानों से अलग पहचान प्रदान करते हैं। यह बात ध्यान देने योग्य है कि सन 1949 में अपनाए गए संविधान के अनेक वास्तविक लक्षणों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। विशेष रूप से 7 वें, 42 वें, 44 वें, 73 वें, 74 वें एवं 97 वें संशोधन में।संविधान में कई बड़े परिवर्तन करने वाले 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 को ‘मिनी कॉन्स्टिट्यूशन’ कहा जाता है। केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को मिली संवैधानिक शक्ति संविधान के मूल ढांचे ‘को बदलने की अनुमति नहीं देती।

संविधान की प्रमुख विशेषताएं
संविधान की प्रमुख विशेषताएं

संविधान की प्रमुख विशेषताएं का नीचे वर्णन किया गया है

1. सबसे लंबा लिखित संविधान

संविधान को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-लिखित, जैसे अमेरिकी संविधान, और; अलिखित, जैसे-ब्रिटेन का संविधान।  भारत का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। यह  बहुत बृहद समग्र और विस्तृत दस्तावेज है। मूल रूप से (1949) संविधान में एक प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद (22 भागों में विभक्त) और 8 अनुसूचियां थीं। वर्तमान में (2016) इसमें एक प्रस्तावना, 465 अनुच्छेद (25 भागों में विभक्त) और 12 अनुसूचियां हैं। सन 1951 से हुए विभिन्न संशोधनों ने करीब 20 अनुच्छेद व एक भाग (भाग- VII) को हटा दिया और इसमें करीब 90 अनुच्छेद, चार भागों (4 क, 9 क, 9 ख और 14 क) और चार अनुसूचियों (9, 10, 11, 12) को जोड़ा गया। विश्व के किसी अन्य संविधान में इतने अनुच्छेद और अनुसूचियां नहीं हैं। भारत के संविधान को विस्तृत बनाने के पीछे निम्न चार कारण हैं: (अ) भौगोलिक कारण, भारत का विस्तार और विविधता। (ब) ऐतिहासिक, इसके उदाहरण के रूप में भारत शासन अधिनियम, 1935 के प्रभाव को देखा जा सकता है। वह अधिनियम बहुत विस्तृत था। (स) जम्मू-कश्मीर को छोड़कर केंद्र और राज्यों के लिए एकल संविधान। (द) संविधान सभा में कानून विशेषज्ञों का प्रभुत्व। संविधान में न सिर्फ शासन के मौलिक सिद्धांत बल्कि विस्तृत  रूप में प्रशासनिक प्रावधान भी विद्यमान हैं। इसके अलावा अन्य आधुनिक लोकतंत्रों में जिन विषयों को छोड़ दिया हैं , उन्हें भी भारत के संविधान में शामिल किया गया है।

2. विभिन्न स्रोतों से विहित

भारत के संविधान ने अपने अधिकतर उपबंध विश्व के कई देशों के संविधानों भारत-शासन अधिनियम, 1935 के उपबंधों से हैं। डॉ. अंबेडकर ने गर्व के साथ घोषणा की थी कि, “भारत के संविधान का निर्माण विश्व के विभित्र संविधानों को छानने के बाद किया गया है।” संविधान का अधिकांश ढांचागत हिस्सा भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया गया है। संविधान का दार्शनिक भाग (मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत) क्रमशः अमेरिका और आयरलैंड से प्रेरित है। भारतीय संविधान के राजनीतिक भाग (संघीय सरकार का सिद्धांत और कार्यपालिका और विधायिका के संबंध) का अधिकांश हिस्सा ब्रिटेन के संविधान से लिया गया है। संविधान के अन्य प्रावधान कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, यूएसएसआर (अब रूस), फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, जापान इत्यादि देशों के संविधानों से लिए गए हैं। भारत के संविधान पर सबसे बड़ा प्रभाव और भौतिक सामग्री का स्रोत भारत सरकार अधिनियम, 1935 रहा है। संघीय व्यवस्था, न्यायपालिका, राज्यपाल, आपातकालीन अधिकार, लोक सेवा आयोग और अधिकतर प्रशासनिक विवरण इसी से लिए गए हैं। संविधान के आने से अधिक प्रावधान या तो 1935 के इस अधिनियम के समान है या फिर इससे मिलते-जुलते हैं।

संविधान की प्रमुख विशेषताएं

स्रोत विशेषताए
1. भारत शासन अधिनियम, 1935 संघीय तंत्र, राज्यपाल का कार्यालय, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन उपबंध व प्रशासनिक विवरण।
2. ब्रिटेन का संविधान संसदीय शासन, विधिका शासन, विधायी प्रक्रिया, एकल नागरिकता, मंत्रिमण्डल प्रणाली, परमाधिकार लेख, संसदीय विशेषाधिकार और द्विसदनवाद।
3. संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान मूल अधिकार, न्यायापालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक पुनरावलोकन का सिद्धांत, उप-राष्ट्रपति का पद, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का पद से हटाया जाना और राष्ट्रपति पर महाभियोग।
4. आयरलैंड का संविधान राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत, राष्ट्रपति को निर्वाचन पद्धति और राज्य सभा के लिए सदस्यों का नामांकन।
5. कनाडाका संविधान सशक्त केन्द्र के साथ संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियों का केन्द्र में निहित होना, केन्द्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्शी न्याय निर्णयन।
6. ऑस्ट्रेलिया का संविधान समवर्ती सूनी, व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।
7. जर्मनी का वाइमर संविधान आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थगन।
8. सोवियत संघ (पूर्व) का संविधान मूल कर्तव्य और प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक) का आदर्श।
9. फ्रांस का संविधान गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श।
10. दक्षिणी अफ्रीकाका संविधान संविधान में संशोधन की प्रक्रिया और राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन।
11. जापान का संविधान विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।

3. नम्यता एवं अनम्यता का समन्वय

संविधानों को नम्यता और अनम्यता की दृष्टि से भी वर्गीकृत किया जाता है। कठोर वा अनम्य संविधान उसे माना जाता है, जिसमें संशोधन करने के लिए विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता हो। उदाहरण के लिए अमेरिकी संविधान।लचीला या नम्य संविधान वह कहलाता है, जिसमें संशोधन की प्रक्रिया वही हो, जैसी किसी आम कानूनों के निर्माण की, जैसे-ब्रिटेन का संविधान। भारत का संविधान न तो लचीला है और न ही कठोर, बल्कि यह दोनों का मिला-जुला रूप है। अनुच्छेद 368 में दो तरह के संशोधनों का प्रावधान है:

(अ). कुछ उपबंधों को संसद में विशेष बहुमत से संशोधित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत और प्रत्येक सदन में कुल सदस्यों का बहुमत (जो कि 50 प्रतिशत से अधिक है)।

(ब). कुछ अन्य प्रावधानों को संसद के विशेष बहुमत और कुल राज्यों के आधे से अधिक राज्यों के अनुमोदन से ही संशोधित किया जा सकता है। इसके अलावा संविधान के कुछ प्रावधान आम विधायी प्रक्रिया की तरह संसद में सामान्य बहुमत के माध्यम से संशोधित किए जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि ये संशोधन अनुच्छेद 368 के अंतर्गत नहीं आते।

4. एकात्मकता की ओर झुकाव के साथ संघीय व्यवस्था

भारत का संविधान संघीय सरकार की स्थापना करता है। इसमें संघ के सभी आम लक्षण विद्यमान हैं; जैसे-दो सरकार, शक्तियों का विभाजन, लिखित संविधान, संविधान की सर्वोच्चता, संविधान की कठोरता, स्वतंत्रा न्यायपालिका एवं द्विसदनीयता आदि। यद्यपि भारतीय संविधान में बड़ी संख्या में एकात्मकता और गैर-संघीय लक्षण भी विद्यमान हैं, जैसे-एक सशक्त केंद्र, एक संविधान, एकल नागरिकता, संविधान का लचीलापन, एकीकृत न्यायपालिका, केन्द्र द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति, अखिल भारतीय सेवाएं, आपातकालीन प्रावधान इत्यादि। फिर भी, संविधान में कहीं भी ‘संघीय’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। दूसरी ओर अनुच्छेद 1 में भारत का उल्लेख ‘राज्यों के संघ’ के रूप में किया गया है। इसके दो अभिप्राय हैं पहला, भारतीय संघ राज्यों के बीच हुए किसी समझौते का निष्कर्ष नहीं है, और दूसरा; किसी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। इसी वजह से भारतीय संविधान को निम्नांकित नाम दिए गए हैं, जैसे कि-एकात्मकता की भावना में संघ, अर्थ संघ, बारगेनिंग फेडरेलिज्म, को-ऑपरेटिव फेडरेलिज्म, फेडरेशन विद ए सेंट्रलाइजिंग टेंडेंसी’।

5. सरकार का संसदीय रूप

भारतीय संविधान ने अमेरिका की अध्यक्षीय प्रणाली की बजाए ब्रिटेन के संसदीय तंत्र को अपनाया है। संसदीय व्यवस्था विधायिका और कार्यपालिका के मध्य समन्वय व सहयोग के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि अध्यक्षीय प्रणाली दोनों के बीच शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है। संसदीय प्रणाली को सरकार के ‘वेस्टमिंस्टर रूप, उत्तरदायी सरकार और मंत्रिमंडलीय सरकार के नाम से भी जाना जाता है। संविधान केवल केंद्र में ही नहीं, बल्कि राज्य में भी संसदीय प्रणाली की स्थापना करता है। भारत में संसदीय प्रणाली की विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  1. वास्तविक व नाममात्र के कार्यपालकों की उपस्थिति,
  2. बहुमत वाले दल की सत्ता,
  3. विधायिका के समक्ष कार्यपालिका की संयुक्त जवाबदेही,
  4. विधायिका में मंत्रियों की सदस्यता,
  5. प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नेतृत्व,
  6. निचले सदन का विघटन (लोकसभा अथवा विधानसभा)

हालांकि भारतीय संसदीय प्रणाली बड़े पैमाने पर ब्रिटिश संसदीय प्रणाली पर आधारित है फिर भी दोनों में कुछ मूलभूत अंतर हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटिश संसद की तरह भारतीय संसद संप्रभु नहीं है। इसके अलावा भारत का प्रधान निर्वाचित व्यक्ति होता है (गणतंत्र), जबकि ब्रिटेन में उत्तराधिकारी व्यवस्था है। किसी भी संसदीय व्यवस्था में, चाहे वह भारत की हो अथवा ब्रिटेन की, प्रधानमंत्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। जैसा कि राजनीति के जानकार इसे’ प्रधानमंत्रीय सरकार ‘का नाम देते हैं।

6. संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता में में समन्वय

संसद की संप्रभुता का नियम ब्रिटिश संसद से जुड़ा हुआ है, जबकि न्यायपालिका की सर्वोच्चता का सिद्धांत, अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से लिया गया है। जिस प्रकार भारतीय संसदीय प्रणाली, ब्रिटिश प्रणाली से भिन है, ठीक उसी प्रकार भारत में सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा शक्ति अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय से कम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिकी संविधान में’ विधि की नियत प्रक्रिया ‘का प्रावधान है, जबकि भारतीय संविधान में विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ (अनुच्छेद 21) का प्रावधान है। इसलिए भारतीय संविधान निर्माताओं ने ब्रिटेन की संसदीय संप्रभुता और अमेरिका की न्यायपालिका सर्वोच्चता के बीच उचित संतुलन बनाने को प्राथमिकता दी। एक ओर जहां सर्वोच्च न्यायालय अपनी न्यायिक समीक्षा की शक्तियों के तहत संसदीय    कानूनों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है, वहीं दूसरी ओर संसद अपनी संवैधानिक शक्तियों के बल पर संविधान के बड़े भाग को संशोधित कर सकती है।

7. एकीकृत व स्वतंत्र न्यायपालिका

भारतीय संविधान एक ऐसी न्यायपालिका की स्थापना करता है, जो अपने आप में एकीकृत होने के साथ-साथ स्वतंत्र है। भारत की न्याय व्यवस्था में सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है। इसके नीचे राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय हैं। राज्यों में उच्च न्यायालय के नीचे क्रमवार अधीनस्थ न्यायालय हैं, जैसे-जिला अदालत व अन्य निचली अदालतें। न्यायालयों का एकल तंत्र, केंद्रीय कानूनों के साथ-साथ राज्य कानूनों को लागू करता है। हालांकि अमेरिका में संघीय कानूनों को संघीय न्यायपालिका और राज्य कानूनों को राज्य न्यायपालिका लागू करती है। सर्वोच्च न्यायालय, संघीय अदालत है। यह शीर्ष न्यायालय है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है और संविधान का संरक्षक है। इसलिए संविधान में इसकी स्वतंत्रता के लिए कई प्रावधान किए गए हैं; जैसे-न्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा, न्यायाधीशों के लिए निर्धारित सेवा शर्ते, भारत की संचित निधि से सर्वोच्च न्यायालय के सभी खचों का वहन, विधायिका में न्यायाधीशों के कामकाज पर चर्चा पर रोक, सेवानिवृत्ति के बाद अदालत में कामकाज पर रोक, अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति, कार्यपालिका से न्यायपालिका को अलग रखना इत्यादि।

8. मौलिक अधिकार

संविधान के तीसरे भाग में छह मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। ये अधिकार हैं:

  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)
  5. सांस्कृतिक व शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

मौलिक अधिकार का उद्देश्य वस्तुतः राजनीतिक लोकतंत्र की भावना को प्रोत्साहन देना है। यह कार्यपालिका और विधायिका के मनमाने कानूनों पर निरोधक की तरह काम करते हैं। उल्लंघन की स्थिति में इन्हें न्यायालय के माध्यम से लागू किया जा सकता है। जिस व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन हुआ है, वह सीधे सर्वोच न्यायालय की शरण में जा सकता है, जो अधिकारों की  रक्षा के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा व उत्प्रेषण जैसे अभिलेख या रिट जारी कर सकता है। हालांकि मौलिक अधिकार कुछ सीमाओं के दायरे में आते हैं लेकिन वे अपरिवर्तनीय भी नहीं हैं। संसद इन्हें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से समाप्त कर सकती है अथवा इनमें कटौती भी कर सकती है। अनुच्छेद 20-21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छोड़कर राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान इन्हें स्थगित किया जा सकता है।

9. राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत

डॉ. बी.आर. अंबेडकर के अनुसार, राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता है। इनका उल्लेख संविधान के चौथे भाग में किया गया है। इन्हें मोटे तौर पर तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-सामाजिक, गांधीवादी तथा उदार- बौद्धिका नीति-निदेशक तत्वों का कार्य सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना है। इनका उद्देश्य भारत में एक ‘कल्याणकारी राज्य’ की स्थापना करना है। हालांकि मौलिक अधिकारों की तरह इन्हें कानून रूप में लागू नहीं किया जा सकता। संविधान में कहा गया है कि देश की शासन व्यवस्था में ये सिद्धांत मौलिक हैं और यह देश की जिम्मेदारी है कि वह कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को अपनाए। इसलिए इन्हें लागू करना राज्यों का नैतिक कर्तव्य है किंतु इनकी पृष्ठभूमि में वास्तविक शक्ति राजनैतिक है, अर्थात् जनमत। मिनर्वा मिल्स मामले (1980) “में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि,” भारतीय संविधान की नींव मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक सिद्धांतों के संतुलन पर रखी गई है। ”

10. मौलिक कर्तव्य

मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख नहीं किया गया है। इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश के आधार पर 1976 के 42 वें संविधान संशोधन के माध्यम से आंतरिक आपातकाल (1975-77) के दौरान शामिल किया गया था। 2002 के 86 वें संविधान संशोधन ने एक और मौलिक कर्तव्य को जोड़ा। संविधान के 4 ए भाग में 1 मौलिक कर्तव्यों का जिक्र किया गया है (जिसमें केवल एक अनुच्छेद 51-क है)। इसके तहत प्रत्येक भारतीय का यह कर्तव्य होगा कि वह-संविधान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे, राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें; हमारी मिश्रित संस्कृति की समृद्ध धरोहर का अनुरक्षण करें; सभी लोगों में आपसी भाईचारे की भावना का विकास करें, इत्यादि। मौलिक कर्तव्य नागरिकों को वह बाद दिलाते हैं कि अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते समय उन्हें याद रखना चाहिए कि उन्हें अपने समाज, देश व अन्य नागरिकों के प्रति कुछ जिम्मेदारियों का निर्वाह भी करना है। नीति-निदेशक तत्वों की तरह कर्तव्यों को भी कानून रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

11. एक धर्मनिरपेक्ष राज्य

भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। इसलिए यह किसी धर्म विशेष को भारत के धर्म के तौर पर मान्यता नहीं देता। संविधान के निम्नलिखित प्रावधान भारत के धर्मनिरपेक्ष लक्षणों को दर्शाते हैं:

  1. वर्ष 1976 के 42 वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष ‘शब्द को जोड़ा गया।
  2. प्रस्तावना हर भारतीय नागरिक की आस्था, पूजा-अर्चना व विश्वास की स्वतन्त्रता की रक्षा करती है।
  3. किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समान समझा जाएगा और उसे कानून को समान सुरक्षा प्रदान की जाएगी (अनुच्छेद -14)।
  4. धर्म के नाम पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद -15)।
  5. सार्वजनिक सेवाओं में सभी नागरिकों को समान अवसर दिए जाएंगे (अनुच्छेद -16)।
  6. हर व्यक्ति को किसी भी धर्म को अपनाने व उसके अनुसार पूजा-अर्चना करने का समान अधिकार है (अनुच्छेद 25)।
  7. हर धार्मिक समूह अथवा इसके किसी हिस्से को अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार है (अनुच्छेद 26)।
  8. किसी भी व्यक्ति को किसी भी धर्म विशेष के प्रचार के लिए किसी प्रकार का कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद 27)
  9. किसी भी सरकारी शैक्षिक संस्थान में किसी प्रकार के धार्मिक निर्देश नहीं दिए जाएंगे (28)। 10. नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी भाषा, लिपि अथवा संस्कृति को संरक्षित रखने का अधिकार है (अनुच्छेद 29)।
  10. अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थानों की स्थापना करने और उन्हें संचालित करने का अधिकार है (अनुच्छेद 30)।
  11. राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने के लिए प्रयास करेगा (अनुच्छेद -44)।

धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी अवधारणा धर्म (चर्च) और राज्य (राजनीति) के बीच पूर्ण अलगाव रखती है। धर्मनिरपेक्षता की यह नकारात्मक अवधारणा भारतीय परिवेश में में लागू नहीं हो सकती क्योंकि यहां का समाज बहु धर्मवादी है। इसलिए भारतीय संविधान में सभी धर्मों को समान आदर अथवा सभी धर्मों की समान रूप से रक्षा करते हुए धर्मनिरपेक्षता के सकारात्मक पहलू को शामिल किया गया है। इसके अलावा संविधान ने विधायिका में धर्म के आधार पर कुसौं का आरक्षण देने वाले पुराने धर्म आधारित प्रतिनिधित्व को भी समाप्त कर दिया है। हालांकि संविधान अनुसूचित जाति और जनजाति को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए अस्थायी आरक्षण प्रदान करता है।

12.सार्वभौम वयस्क मताधिकार

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान-सभा में कहा था कि संसदीय प्रणाली से हमारा अभिप्राय एक व्यक्ति एक वोट से है, जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार करके संविधान के रचनाकारों ने साफ वयस्क मताधिकार (Universal Aduit Franchise) की पद्धति अपनाई थी, ताकि प्रत्येक भारतीय को बिना किसी भेदभाव के मतदान के समान अधिकार प्राप्त हों।

इसीलिए भारतीय संविधान में बिना किसी भेदभाव के 18 वर्ष की अवस्थी वाले प्रत्येक नागरिक- चाहे वह स्त्री हो या पुरुष को मताधिकार दिया गया है। सन् 1935 के सुधार कानून के अंतर्गत केवल 14 प्रतिशत भारतीयों को मताधिकार प्राप्त थी, जबकि वर्तमान संविधान के अंतर्गत देश का प्रत्येक 18 वर्षीय स्त्री अथवा पुरुष नागरिक वयस्क मताधिकार पा लेता है। वह बिना किसी भेदभाव के स्थानीय निकायों, विधानमंडल, लोकसभा आदि के निर्वाचनों के लिए मतदान कर सकता है।

भारतीय संविधान द्वारा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव के आधारस्वरूप सार्वभौम वयस्क मताधिकार को अपनाया गया है। हर वह व्यक्ति जिसकी उम्र कम से कम 18 वर्ष है, उसे धर्म, जाति, लिंग, साक्षरता अथवा संपदा इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना मतदान करने का अधिकार है। वर्ष 1989 में 61 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 के द्वारा मतदान करने की उम्र को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया था। देश के वृहद आकार, जनसंख्या, उच्च गरीबी, सामाजिक असमानता, अशिक्षा आदि को देखते हुए संविधान निर्माताओं द्वारा सार्वभौम वयस्क मताधिकार को संविधान में शामिल करना एक साहसिकवसराहनीय प्रयोग था। ” वयस्क मताधिकार लोकतंत्र को बड़ा आधार देने के साथ साथ आम जनता के स्वाभिमान में वृद्धि करता है, समानता के सिद्धांत को लागू करता है, अल्पसंख्यकों को अपने हितों की रक्षा करने का अवसर देता है तथा कमजोर वर्गों के लिए नई आशाएं और प्रत्याशा जगाता है।

13. एकल नागरिकता

यद्यपि भारतीय संविधान फेडरल है और दो लक्षणों (एकल व संघीय) का प्रतिनिधित्व करता है मगर इसमें केवल एकल नागरिकता का प्रावधान है अर्थात भारतीय नागरिकता।    दूसरी ओर, अमेरिका जैसे देशों में प्रत्येक व्यक्ति के पास न केवल देश की नागरिकता होती है बल्कि वह जिस राज्य में रहता है उसकी भी नागरिकता होती है। इसलिए वह अधिकारों के दो समूहों का लाभ उठाता है- पहला, राष्ट्रीय सरकार द्वारा प्रदत्त, तथा; दूसरा, राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त। भारत में, सभी नागरिकों को चाहे वो किसी भी राज्य में पैदा हुए हो या रहते हों, संपूर्ण देश में नागरिकता के समान राजनीतिक और नागरिक अधिकार प्राप्त होते हैं और उनमें कोई भेदभाव नहीं किया जाता, सिवाए कुछ मामलों के, जैसे-जनजातीय क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर इत्यादि।सभी नागरिकों के लिए एकल नागरिकता और समान अधिकारों के संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद भारत में सांप्रदायिक दंगे, वर्ग संघर्ष, जातिगत युद्ध, भाषायी विवाद और नृजातीय विवाद होते रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि, संविधान के निर्माताओं ने एकीकृत और संगठित भारत राष्ट्र के निर्माण का जो सपना देखा था, वह पूरी तरह पूरा नहीं हो पाया है।

14. स्वतंत्र निकाय

भारतीय संविधान केवल विधाविका, कार्यपालिका व सरकार (केन्द्र और राज्य) न्यायिक अंग ही उपलब्ध कराता है। बल्कि वह कुछ स्वतंत्र निकायों की स्थापना भी करता है। इन्हें संविधान ने भारत सरकार के लोकतांत्रिक तंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में परिकल्पित किया है। ऐसे कुछ स्वतंत्र निकाय निम्नलिखित हैं: अ. संसद, राज्य विधानसभाओं भारत के राष्ट्रपति और भारत के उप-राष्ट्रपति के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने हेतु निर्वाचन आयोग। ब. राज्य और केंद्र सरकार के खातों के अंकेक्षण के लिए भारत का नियंत्रक एवं महालेखाकार। ये जनता के पैसे के संरक्षक होते हैं और सरकार द्वारा किए गए खचों की वैधानिकता और उनके उचित होने पर टिप्पणी करते हैं। स. संघ लोक सेवा आयोग। यह अखिल भारतीय सेवाओं व उच्च स्तरीय केंद्रीय सेवाओं के लिए भर्ती हेतु परीक्षाओं का आयोजन करता है तथा अनुशासनात्मक मामलों पर राष्ट्रपति को सलाह देता है। द. राज्य लोक सेवा आयोग, जिसका काम हर राज्य में राज्य सेवाओं के लिए भर्ती हेतु परीक्षाओं का आयोजन करना व अनुशासनात्मक मामलों पर राज्यपाल को सलाह देना है। विभिन्न प्रावधानों, यथा-कार्यकाल की सुरक्षा, निर्धारित सेवा शर्ते, भारत की संचित निधि पर भारित विभिन्न व्यय आदि  के माध्यम से संविधान इन निकायों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है।

15.आपातकालीन प्रावधान

आपातकाल की स्थिति से प्रभावशाली ढंग से निपटने के लिए भारतीय संविधान में राष्ट्रपति के लिए बृहद आपातकालीन प्रावधानों की व्यवस्था है। इन प्रावधानों को संविधान में शामिल करने का उद्देश्य है-देश की संप्रभुता, एकता, अखण्डता और सुरक्षा, संविधान एवं देश के लोकतांत्रिक ढांचे को सुरक्षा प्रदान करना। संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल की विवेचना की गई है।

  1. राष्ट्रीय आपातकालः युद्ध, आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह पैदा हुई राष्ट्रीय अशांति की अवस्था (अनुच्छेद -352)।
  2. राज्य में आपातकाल (राष्ट्रपति शासन) राज्यों में संवैधानिक तंत्र की असफलता (अनुच्छेद 356) वा केन्द्र के निदेशों का अनुपालन करने में असफलता (अनुच्छेद 365)।
  3. वित्तीय आपातकाल: भारत की वित्तीय स्थिरता या प्रत्यय संकट में हो (अनुच्छेद 360)।

आपातकाल के दौरान देश की पूरी सत्ता केंद्र सरकार के हाथों में आ जाती है और राज्य केंद्र के नियंत्रण में चले जाते हैं। इससे संविधान में संशोधन किए बगैर देश का ढांचा संघीय से एकात्मक हो जाता है। राजनीतिक तंत्र का संघीय (सामान्य परिस्थितियों के दौरान) से एकात्मक (आपातकाल के दौरान) में परिवर्तित होना भारतीय संविधान की एक अद्वितीय विशेषता है।

16. त्रिस्तरीय सरकार

मूल रूप से अन्य संघीय संविधानों की तरह भारतीय संविधान में दो स्तरीय राजव्यवस्था (केंद्र व राज्य) और संगठन के संबंध में प्रावधान तथा केंद्र एवं राज्यों की शक्तियां अंतर्विष्ट थीं। बाद में वर्ष 1992 में 73 वें एवं 74 वें संविधान संशोधन ने तीन स्तरीय (स्थानीय) सरकार का प्रावधान किया गया, जो विश्व के किसी और संविधान में नहीं है। संविधान में एक नए भाग (9 वें) एवं नई अनुसूची (11 वीं) जोड़कर वर्ष 1992 के 73 वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायतों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। इसमें एक नया भाग “जोड़ा गया। इसी प्रकार से 74 वें संविधान संशोधन विधेयक, 1992 ने एक नए भाग 9 ए” तथा नई अनुसूची 12 वीं को जोड़कर नगरपालिकाओं (शहरी स्थानीय सरकारें) को संवैधानिक मान्यता प्रदान की।

17. सहकारी समितियां

97 वां संविधान संशोधन अधिनियम 2011 ने सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा और संरक्षण प्रदान किया। इस संदर्भ में निम्न तीन परिवर्तन संविधान में इसने किए

  1. इसने सहकारी समिति गठित करने के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया (अनुच्छेद 19)।
  2. इसने एक नया राज्य का नीति निदेशक तत्व जोड़ा सहकारी समितियों के प्रोत्साहन देने के लिए (अनुच्छेद 43-B)
  3. इसने संविधान में एक नया भाग 1X-B जोड़ा- “सहकारी समितियां” (The Co-operative Societies) शीर्षक से (अनुच्छेद 243 (a) से लेकर अनुच्छेद 243(o) नया भाग IXB के अंतर्गत अनेक ऐसे प्रावधानों के द्वारा सुनिश्चित किया गया है कि देश भर में सहकारी समितियां लोकतांत्रिक, व्यावसायिक, स्वायत्त ढंग से तथा आर्थिक मजबूती के साथ कार्य करें। यह संसद को अंतर-राज्य सहकारी समितियों तथा राज्य विधायिकाओं को अन्य सहकारी समितियों के लिए उपयुक्त कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है।

18. जनसत्तात्मकता

भारतीय संविधान लोकतंत्र के सिद्धांत पर जनता का, जनता द्वारा तथा जनता के हित के लिए रचा गया है। संविधान में स्पष्टत: यह उल्लिखित है कि भारतीय संघ एवं उसकी समस्त इकाइयों में अंतिम सत्ता जनता के हाथों में रहेगी।

19. नर-नारियों की समानता का पोषक

भारतीय समाज में नारियाँ सदियों से शोषित और पीड़ित रही हैं। उन्हें प्रायः ऐसा कोई अधिकार नहीं दिया गया था, जिसके आधार पर वे अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रख पाती। भारतीय संविधान में उन्हें विना किसी भेदभाव के पुरुषों के समान अधिकार दिए गए हैं।

अव संविधान के अनुसार, सरकारी नौकरियों में भी पुरुषों एवं नारिणों में कोई भेदभाव नहीं बरता जाता। पुरुषों के समान महिलाओं को भी जन-प्रतिनिधि चुनने का वयस्क मताधिकार प्राप्त है। यहाँ तक कि महिलाओं के लिए पंचायतों तथा नगरपालिकाओं के निवचिन में एक-तिहाई सीटों पर आरक्षण है।

भारतीय संविधान की आलोचनाएँ

भारतीय संविधान में जहाँ इतनी विशेषताएँ हैं, वहीं विद्वानों ने इसमें कुछ कमियाँ भी खोजी हैं। इसी संदर्भ में आलोचकों ने भारतीय संविधान की तुलना ऐसी महिला से की है, जो अपने प्रेमियों के मनोभावों के अनुसार प्रशंसा अथवा निंदा पाती है। सामान्यतः भारतीय संविधान के निम्नलिखित कमजोर पक्ष उद्घाटित किए गए हैं

1. उधार का संविधान

आलोचक कहते हैं कि भारतीय संविधान में नया और मौलिक कुछ भी नहीं है। वे इसे ‘उधार का संविधान’ कहते हैं और ‘उधारी को एक बोरी’ अथवा एक ‘हॉच पांच कन्स्टीच्युशन’ दुनिया के संविधानों के लिए विभिन्न दस्तावेजों की ‘पैबन्दगिरी।’ लेकिन ऐसी आलोचना पक्षपातपूर्ण एवं अंतार्किक है। ऐसा इसलिए कि संविधान बनाने वालों ने अन्य संविधान के आवश्यक संशोधन करके ही भारतीय परिस्थितियों में उनकी उपयुक्तता के आधार पर उनकी कमियों को दरकिनार करके ही स्वीकार किया उपरोक्त।, आलोचना का उत्तर देते हुए डा. वी.आर. अम्बेदकर ने संविधान सभा में कहा- “कोई पूछ सकता है कि इस घड़ी दुनिया के इतिहास में बनाए गए संविधान में नया कुछ हो सकता है। सौ साल से अधिक हो गए जबकि दुनिया का पहला लिखित    संविधान बना। इसका अनुसरण अनेक देशों ने किया और अपने देश के संविधान को लिखित बनाकर उसे छोटा बना दिया। किसी संविधान का विषय क्षेत्र क्या होना चाहिए। यह पहले ही तय हो चुका है, उसी प्रकार किसी संविधान के मूलभूत तत्वों की जानकारी और मान्यता आज पूरी दुनिया में है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सभी संविधानों में मुख्य प्रावधानों में समानता दिख सकती है। केवल एक नई चीज यह हो सकती है किसी संविधान में जिसका निर्माण इतने विलंब से हुआ है कि उसमें गलतियों को दूर करने और देश की जरूरतों के अनुरूप उसको टालने की विविधता उसमें मौजूद रहे। यह दोषारोपण कि यह संविधान अन्य देशों के संविधानों की हू-ब-हू नकल है, मैं समझता हूं, संविधान के यथेष्ट अध्ययन पर आधारित नहीं है।

2. 1935 के अधिनियम की कार्बन कॉपी

आलोचकों ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने बड़ी संख्या में भारत सरकार अधिनियम 1935 के प्रावधान भारत के संविधान में डाल दिए। इससे संविधान 1935 के अधिनियम को कार्बन कॉपी बनकर रह गया या फिर उसका ही संशोधित रूप उदाहरण के लिए एन. श्रीनिवासन का कहना है कि भारतीय संविधान भाषा और वस्तु दोनों ही तरह से 1935 के अधिनियम की नकल है। उसी प्रकार सर आइबर जेनिंग्स, ब्रिटिश संविधानवेता ने कहा कि संविधान भारत सरकार अधिनियम 1935 से सीधे निकलता है, जहां से वास्तव में अधिकांश प्रावधानों के पाठ बिल्कुल उतार लिए गए हैं। पुनः पी.आर. देशमुख, संविधान सभा सदस्य ने टिप्पणी की कि “संविधान अनिवार्यतः भारत सरकार अधिनियम 1935 ही है, बस वयस्क मताधिकार उसमें जुड़ गया है।” उपरोक्त आलोचनाओं का उत्तर संविधान सभा में बी.आर. अम्बेदकर ने इस प्रकार दिया-“जहां तक इस आरोप की बात है कि प्रारूप संविधान में भारत सरकार अधिनियम 1935 का अच्छा-खासा हिस्सा शामिल कर लिया गया है, मैं क्षमा याचना नहीं करूंगा। उधार लेने में कुछ भी लज्जास्पद नहीं है। इसमें साहित्यिक चोरी शामिल नहीं है। संविधान के मूल विचारों पर किसी का एकस्व अधिकार (Patent Rights) नहीं है। मुझे खेद इस बात के लिए है भारत सरकार अधिनियम, 1935 से लिए गए प्रावधान अधिकतर प्रशासनिक विवरणों से सम्बन्धित हैं।”

3. अभारतीय अथवा भारतीयता विरोधी

आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान ‘अ-भारतीय’ या ‘भारतीयता विरोधी’ है क्योंकि यह भारत की राजनीतिक परम्पराओं अथवा भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता। उनका कहना है कि संविधान की प्रकृति विदेशी है जिससे यह भारतीय परिस्थितियों के लिए अनुपयुक्त एवं अकारण है। इस संदर्भ में के. हनुमथैव्या, संविधान सभा सदस्य ने टिप्पणी को- “हम वीणा या सितार का संगीत चाहते थे, लेकिन यहां हम एक इंग्लिश बैंड का संगीत सुन रहे हैं। ऐसा इसलिए कि हमारे संविधान निर्माता उसी प्रकार से शिक्षित हुए।” उसी प्रकार लोकनाथ मिश्रा, एक अन्य संविधान सभा सदस्य ने संविधान को आलोचना करते हुए इसे “पश्चिम का दासवत अनुकरण, बल्कि पश्चिम को दासवत आत्मसमर्पण कहा। लक्ष्मीनारायण साहू. एक अन्य संविधान सभा सदस्य का कहना था-” जिन आदशों पर यह प्रारूप संविधान गढ़ा गया है भारत को मूलभूत उनमें प्रगट नहीं होती। यह संविधान उपयुक्त सिद्ध नहीं होगा और लागू होने के फौरन बाद ही टूट जाएगा। ‘

4. गांधीवाद से दूर संविधान

आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान गांधीवादी दर्शन और मूल्यों को प्रतिबिम्बित नहीं करता, जबकि गांधी जी हमारे राष्ट्रपिता है। उनका कहना था कि संविधान ग्राम पंचायत तथा जिला पंचायतों के आधार पर निर्मित होना चाहिए था। इस संदर्भ में, वही सदस्य के. हनुमंथैय्या ने कहा-” यह वही संविधान है जिसे महात्मा गांधी कभी नहीं चाहते, न ही संविधान को उन्होंने विचार किया होगा। टी. प्रकाशम संविधान के एक और सदस्य इस कमी का कारण गांधीजी के आंदोलन में अम्बेदकर को सहभागिता नहीं होना, साथ ही गांधीवाद विचारों के प्रति उनका तीव्र विरोध को बताते हैं।

5. महाकाय आकार

आलोचक कहते हैं कि भारत का संविधान बहुत भीमकाय और बहुत विस्तृत है जिसमें अनेक अनावश्यक तत्व भी सम्मिलित है। सर आइवर जेनिंग्स, एक ब्रिटिश संविधानवेत्ता के विचार में जो प्रावधान बाहर से लिए गए हैं उनका चयन बेहतर नहीं है    और संविधान सामान्य रूप से कहें, तो बहुत लंबा और जटिल है। ” इस संदर्भ में एच.वी. कामथ, संविधान सभा के सदस्य ने टिप्पणी की-” प्रस्तावना, जिस किरीट का हमने अपनी सभा के लिए चयन किया है, वह एक हाथी है। यह शायद इस तथ्य के अनुरूप ही है कि हमारा संविधान भी दुनिया में बने तमाम संविधानों में सबसे भीमकाय है। ‘उन्होंने यह भी कहा-” मुझे विश्वास है, सदन इस पर सहमत नहीं होगा कि हमने एक हाथीनुमा संविधान बनाया है। ”

6. वकीलों का स्वर्ग

आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान अत्यंत विधिवादितापूर्ण तथा बहुत जटिल है। उनके विचार में जिस कानूनी भाषा और मुहावरों को शामिल किया है उनके चलते संविधान एक जटिल दस्तावेज बन गया है। वही सर आइवर जेनिम्स इसे’ वकीलों का स्वर्ग ‘कहते हैं। इस संदर्भ में एच.के. माहेश्वरी, संविधान सभा के सदस्य का कहना था-” प्रारूप लोगों को अधिक मुकदमेबाज बनाता है, अदालतों की ओर अधिक उन्मुख होंगे, वे कम सत्यनिष्ठ होंगे, और सत्य और अहिंसा के तरीकों का पालन वे नहीं करेंगे। यदि में ऐसा कह सकू तो यह प्रारूप वास्तव में वकीलों का स्वर्ग ‘ है। यह वाद या मुकदमों की व्यापक संभावना खोलता है और हमारे योग्य और बुद्धिमान वकालों के हाथ में बहुत सारा काम देने वाला है।  उसी प्रकार संविधान सभा के एक अन्य सदस्य पी.आर. देशमुख ने कहा-” मैं यह कहना चाहूंगा कि सदन के समक्ष डा. अम्बेदकर ने जो अनुच्छेदों का प्रारूप प्रस्तुत किया है, मेरी समझ से अत्यंत भारी-भरकम है, जैसा कि एक भारी-भरकम जिल्दवाला विधि-ग्रंथ हो। संविधान से सम्बन्धित कोई दस्तावेज इतना अधिक अनावश्यक विस्तार तथा शब्दाडम्बर का इस्तेमाल नहीं करता। शायद उनके लिए ऐसे दस्तावेज को तैयार करना कठिन था जिसे, मेरी समझ से एक विधि ग्रंथ नहीं बल्कि एक सामाजिक राजनीतिक दस्तावेज होना था, एक जीवंत स्पंदनयुक्त, जीवनदायी दस्तावेज। लेकिन हमारा दुर्भाग्य कि। नहीं हुआ और हम शब्दों और शब्दों से लद गए हैं जिन्हें बहुत आसानी से हटाया जा सकता था।

7. राज्यों की स्वायत्तता पर नियंत्रण

भारतीय संविधान में राज्य सरकारों की अपेक्षा केंद्र सरकार को अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, जिससे वह संघात्मक से अधिक एकात्मक हो गया है। भारतीय संविधान पर टिप्पणी करते हुए डॉ. जेनिन्स का कथन है कि यह संविधान ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक प्रतिक्रियात्मक संविधान है। जिस प्रकार अमेरिकी संविधान जॉर्ज तृतीष के विरुद्ध जनप्रतिक्रियाओं का प्रतिफल थी, उसी प्रकार भारतीय संविधान बॉण्डविन, मैकडोनाल्ड, वरलेन, पापिल आदि के प्रति प्रतिक्रियाओं की देन है।

8. राष्ट्रपति बनाम तानाशाह

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को व्यापक संकटकालीन अधिकार दिए गए हैं, जिससे राष्ट्रपति के पद में तानाशाही तत्त्वों का समावेश हो गया है। शंकर राय देव के शब्दों में, “राष्ट्रपति पद में जर्मन संविधान के समान तानाशाही शक्तियाँ निहित हैं।

9. नीति-निदेशक तत्त्वों की निस्सारता

राज्यों के नीति-निदेशक तत्वों को व्यावहारिक रूप में लागू करना आसान नहीं है। कुछ मामलों में तो न्यायालय भी असमर्थता जाहिर कर बैठते हैं। अतः वे तत्व व्यर्थ और निस्सार हैं।

10. भारतीयता का अभाव

कुछ आलोचकों की दृष्टि में भारतीय संविधान भारतीयता से सर्वथा रहित है, क्योंकि इसकी आत्मा सन् 1935 के अधिनियम में बसती है और इसके शरीर के लिए इंग्लौंड, अमेरिका, फ्रांस, कनाडा आदि के संविधानों से मसाला जुटाया गया है।

11. अनावश्यक केंद्रीयकरण

भारतीय संविधान में अनावश्यक रूप से शासन का केंद्रीयकरण किया गया है, जो संघ के सिद्धांतों के प्रतिकूल है।

 

 

प्रारूप समिति के 7 सदस्य कौन थे?

अध्यक्षः बी.आर. अम्बेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे
प्रारूप समिति के अन्य सदस्य (सात सदस्यीय)
1. श्री एन. गोपालास्वामी आयंगर
2. अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर
3. मोहम्मद सादुल्ला
4. के. एम. मुंशी
5. बी.एल. मित्र
6. डी.पी. खेतान

संविधान का महत्व क्या है

संविधान द्वारा ही किसी राज्य के स्वरूप को निश्चित किया जा सकता है । संविधान ही सरकार के विभिन्न अंगों पर नियंत्रण स्थापित करता है और उन्हें तानाशाह होने से बचाता है । संविधान ही नागरिकों के मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों की रक्षा करता है । संविधान एक ध्रुव तारे के समान है, जो शासक को हमेशा दिशा-निर्देश देता है और उसका मार्गदर्शन करता है । संविधान ही सरकार के विभिन्न अंगों के बीच संबंध बनाए रखता है और उसमें जो मतभेद पैदा होता है, उसे स्पष्ट करता रहता है । संविधान एक आईना है जिसमें एक देश के भूत, वर्तमान और भविष्य की झलक मिलती है । संविधान को एक जड़ दस्तावेज के रूप में देखना उचित नहीं, वह निरंतर गतिशील रहता है ।

भारतीय संविधान की आधारभूत सिद्धांत की अवधारणा से आप क्या समझते हैं?

 

भारतीय संविधान की आधारभूत सिद्धांत की अवधारणा: संविधान के आधारभूत ढांचे की अवधारणा का आशय है कि कुछ संवैधानिक व्यवस्थाएं संविधान का मूल स्वरूप या भावना निर्मित करते हैं।केशवानंद भारती वाद (24 अप्रैल 1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने आधारभूत ढांचे के सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।
संविधान की सर्वोच्चता, लोकतंत्रात्मक संसदीय प्रणाली, शक्तियों का पृथक्करण, संघात्मक शासन व्यवस्था,विधि का शासन, पंथनिरपेक्षता, राष्ट्र की एकता एवं अखंडता ,निष्पक्ष चुनाव प्रणाली, व्यक्ति की स्वतंत्रता ,मौलिक अधिकार , न्यायिक स्वतंत्रता आदि विषय आधारभूत ढांचे में सम्मिलित है । मिनर्वा मिल्स वाद (1980) तथा एस.आर .बोम्मई वाद (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संविधान के आधारभूत ढांचे का निर्धारण किसी वाद में किसी तत्व को तथ्यों के आधार पर किया जाएगा। अतः आधारभूत ढांचे के सिद्धांत द्वारा संविधान के निरंतर और असीमित संशोधन (अनुच्छेद 368) पर एक स्वाभाविक प्रतिबंध आरोपित होता है। जो न्यायिक पुनरावलोकन का ठोस आधार निर्मित करता है ।

भारतीय संविधान की निर्माण प्रक्रिया को समझाइए?

कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव के आधार पर भारत के संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा का गठन किया गया था। संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव ब्रिटिश अधिकृत क्षेत्रों(296 सदस्य) एवं देसी रियासतों(93 सदस्य) से किया गया ।

भारतीय संविधान सभा की प्रथम बैठक 9 दिसंबर 1946 को संपन्न हुई। डॉ राजेंद्र प्रसाद के अध्यक्ष एवं बी.एन.राव के संवैधानिक सलाहकार नियुक्त होने के पश्चात 13 दिसंबर 1946 को पंडित नेहरू द्वारा प्रस्तुत ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ में संविधान की प्रकृति, स्त्रोत, उद्देश्य एवं नागरिकों के लिए संवैधानिक प्रावधानों की रूपरेखा को प्रस्तुत किया गया।

संविधान सभा ने समितियों को दो वर्गों (!)प्रक्रिया संबंधी समिति नियम, परिचालन आदि) तथा(!!) विषय संबंधी समिति (संघ शक्ति, मूल अधिकार, प्रांतीय संविधान आदि) में बांटकर भावी संविधान के लिए ‘प्रारूप निर्माण’ (डॉ. अम्बेडकर) एवं तीन वाचन (विचार-विमर्श) प्रस्तुत किये।

26 नवंबर 1949 को 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचियों एवं 22 भाग के साथ संविधान को अंगीकार एवं 26 जनवरी 1950 को लागू (execution)किया गया।

डॉ.राजेंद्र प्रसाद को गणराज्य का प्रथम राष्ट्रपति एवं संविधान सभा को ‘अंतरिम संसद में परिवर्तित किया गया।