ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था को समझाइए

किसी भी प्रशासनिक संरचना का विकास मुख्य रूप से दो कारकों पर निर्भर करता है, पहला स्वरूप और चरित्र एवं दूसरा उद्देश का स्तर। भारतीय प्रशासन के संदर्भ में ईस्ट इंडिया कंपनी ब्रिटिश संसद की नीतियों से प्रभावित होती थी। उस समय भारत के स्थानीय जनसंख्या का प्रभाव नौकर ब्रिटिश जनमत का अधिक प्रभाव पड़ता था, और उसकी परंपराएं भी भारतीय होकर ब्रिटिश होती थी।

भारत में ब्रिटेन की प्रशासनिक संरचना का विकास कुछ कारकों का परिणाम था, सर्वप्रथम आर्थिक शोषण के लिए ब्रिटिश भारत में कानून और व्यवस्था को सशक्त और संगठित बनाये रखना था क्योंकि इसके अभाव में न तो भारत में अंग्रेजों को शासन व्यवस्था स्थायी हो सकती थी और न ही उनकी एकाधिकारवादी व्यापारिक गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सकता था।

स्वरूप और चरित्र में विदेशी होने के कारण, अंग्रेज भारत के स्थानीय जनता का समर्थन प्राप्त नहीं कर सके और चूंकि उनके विरोध का भय लगातार बना हुआ था इसलिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सेना तथा पुलिस के माध्यम से भारतीयों पर नियंत्रण बनाये रखने का निश्चय किया।

सिविल सेवा 

कॉर्नवालिस के गर्वनर जनरल बनने के पूर्व भारत सिविल में नागरिक सेवा अंसगठित ही नहीं, अव्यवस्थित भी थी। 1772 ई. में द्वैध शासन की समाप्ति कर प्रशासन पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का नियंत्रण स्थापित कर दिया गया और उसी के कर्मचारियों को प्रशासन का अधिकारी बना दिया

कॉर्नवालिस (1786-93 ई.) ने आते ही उपरोक्त व्यवस्था में परिवर्तन का प्रयास किया। इस संदर्भ में उसने कई कदम उठाये जैसे, अधिकारियों के निजी व्यापार पर रोक लगा दी, रिश्वत, तोहफे और उपहार प्राप्त करना भी प्रतिबंधित कर दिया, नागरिक सेवा के अधिकारियों का वेतन 1500 रु. तो निर्धारित किया ही गया, साथ ही उन्हें भू-राजस्व संग्रह का एक प्रतिशत देना भी निश्चित किया गया। अधिकारियों को प्रशासनिक और व्यापारिक आधार पर, अलग-अलग कर दिया गया, योग्यता और अनुभव को प्रशासनिक तरक्की का आधार बनाया गया।

उसे भारतीयों की योग्यता तथा निष्ठा पर भी भरोसा नहीं था। अत: कॉर्नवालिस ने भारतीयों को प्रशासन से अलग रखने का नियम भी बनाया. इसके लिए 1793 ई. के एक नियम के अनुसार 500 पाउण्ड से अधिक वेतन वाले पदों पर केवल अंग्रेजों को ही नियुक्त किया जा सकता था, भारतीयों को नहीं।

आरम्भ में नागरिक सेवा के अधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स को था। 1853 ई. में कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स से नियुक्ति का अधिकार छीन लिया गया तथा खुली प्रतियोगिता, जो ब्रिटेन में होती थी, के माध्यम से अधिकारियों का चयन किया जाने लगा। नये अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए लॉर्ड   वेलेजली ने कलकता में 1800 ई. में फोर्ट विलियम कॉलेज को स्थापना की लेकिन तुरन्त ही कोर्ट ऑफ डाइरेक्टर्स ने इसे अस्वीकृत कर इंग्लैण्ड के हैल्सबरी नामक स्थान पर अधिकारियों के प्रशिक्षण के लिए ‘ईस्ट इण्डिया कालेज’ की स्थापना की।

यह प्रशासनिक संरचना अत्यन्त पक्षपातपूर्ण और भारतीय हितों के प्रतिकूल थी। एक ओर 1793 ई. के अधिनियम के अनुसार 500 पाठण्ड से ऊपर के वेतन वाले पदों से भारतीयों को तो अलग रखा ही गया था, वहीं साथ ही आगे चलकर नियुक्ति के लिए जिस प्रतियोगिता परीक्षा की स्थापना की गयी थी, वह मूल रूप से उच्चवर्गीय ब्रिटिश परिवार के बच्चों के अनुरूप था। हालांकि 1833 ई. के अधिनियम में यह भरोसा दिलाया गया था कि प्रशासन में भारतीयों की  भी नियुक्ति योग्यता के माध्यम से की जाएगी, परन्तु परीक्षा का एकमात्र केन्द्र लन्दन होना और उसकी भाषा अंग्रेजी होने की स्थिति में यह कदाचित संभव नहीं था। यही वजह है कि वर्ष 1858 ई. तक एक भी भारतीय इस परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सके। परीक्षा में बैठने की अधिकतम आयु भी 23 वर्ष थी जिसे बाद में घटा कर 19 वर्ष कर दिया गया,  परिणामस्वरूप भारतीय बच्चों द्वारा उपरोक्त सरंचना वाले परीक्षा में उत्तीर्ण होना कतई संभव नहीं था।

कालांतर में उपरोक्त प्रशासनिक संरचना भारतीय इतिहास में एक इस्पात के ढाँचे के रूप में उपस्थित हुई. जो एक ओर अंग्रेजी हितों का तो बेहतर ख्याल रखती ही थी, दूसरी और प्रतिक्रियावादी स्वरूप धारण कर भारतीय राष्ट्रवाद को भी कुचलने में सक्षम हुई।

सेना

ब्रिटिश भारत की सेना साहारी औपनिवेशिक चरित्र पर आधारित सेना थी, जिसका गठन यूरोपीय प्रणाली पर किया गया था। आरम्भ में अधिकांश सैनिकों की नियुक्ति संयुक्त प्रान्त (आधुनिक उत्तर प्रदेश) और बिहार से की जाती थी परन्तु ऊँचे ओहदों पर अंग्रेजों की ही नियुक्ति होती थी। ऐसा मूल रूप से सैन्य संतुलन बनाये रखने के लिए किया जाता था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के काल में भारतीय मात्र सूबेदार के ओहदे तक ही पहुँच सकते थे।

अंग्रेजों द्वारा ब्रिटिश सेना में भारतीयों को शामिल करने का कारण मुख्य रूप से यह था कि भारतीय सैनिक ब्रिटिश सैनिक से कम वेतन पर कार्य करने को तैयार होते थे। ब्रिटेन की जनसंख्या इतनी अधिक नहीं थी कि वे हर उपनिवेश में मात्र अंग्रेजों की सेना को रख सके। भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना अनुपस्थित थी और इसलिए एक प्रान्त से लिये  गये सैनिकों को दूसरे प्रान्त के विरूद्ध नियुक्त किया जा सकता था।

नमक हलाली की भावना के कारण जहाँ भारतीय सैनिक निष्ठावान, आज्ञाकारी और विश्वस्त होते थे, वहीं ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार अच्छा और नियमित वेतन देने के कारण अच्छी नियोक्ता थी। तत्कालीन परिस्थितियों में अंग्रेजों द्वारा अपने सिपाहियों को भारतीय शासकों की तुलना में न सिर्फ अच्छा वेतन और सुविधायें प्रदान की जाती थी बल्कि साथ ही उन्हें ऐसे अवसर मिलते थे जिसमें वे अपना आर्थिक विकास भी कर सके।

ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन काल में यह सैनिक व्यवस्था ही थी जिसने उसे सम्पूर्ण भारत पर अपना साम्राज्य  स्थापित करने में सक्षम बनाया। भारतीय शासकों की सेना में जहाँ अनुशासनहीनता और अव्यवस्था तथा तकनीकी पिछड़ापन था वहीं ब्रिटिश सेना अत्यन्त अनुशासित, संगठित और नवीन तकनीकों तथा अस्त्र-शस्त्र से लैस थी।

पुलिस व्यवस्था

मुगल काल के पतन के उपरान्त भारत को शासन व्यवस्था का सभी स्तरों पर विघटन होने लगा। शांति और व्यवस्था बनाये रखने का दायित्व अर्थात् पुलिस शक्ति, जमींदारों के हाथ में केन्द्रीकृत हो गई, जिसका उन्होंने अत्यन्त ही गलत तरीके से दुरूपयोग किया। अपने शासनकाल में क्लाइव ने इसी व्यवस्था को बनाये रखा।

कॉर्नवालिस के आगमन के साथ इस व्यवस्था में भी सुधार की प्रक्रिया आरम्भ हुई और एक संगठित पुलिस व्यवस्था स्थापित की गई। इस क्रम में थाना प्रणाली ‘का सूत्रपात किया गया और जिलों को निश्चित थाना क्षेत्र (400 वर्ग कि. मो.) में विभाजित कर एक’ दारोगा ‘की नियुक्ति की गई तथा जिलों के स्तर पर पुलिस अधीक्षकों की व्यवस्था की गई जो निश्चित रूप से अंग्रेज ही होते थे। सबसे निचले स्तर पर चौकीदारों की व्यवस्था की गयी, जो गाँवों की सुरक्षा, कानून तथा शांति व्यवस्था के लिए जिम्मेदार थे।

एक दक्ष तथा व्यवस्थित पुलिस व्यवस्था की स्थापना ने अंग्रेजों के अनेक उद्देश्यों को पूरा किया। इसके माध्यम से आंतरिक विद्रोहों, षड्यंत्रों, ठगी प्रथा पर नियंत्रण तो किया ही जा सका, साथ ही सेना के समान एक प्रतिक्रियावादी शक्ति होने कारण पुलिस व्यवस्था ने राष्ट्रवादी आन्दोलन को कुचलने का भी कार्य किया।

भारतीयों के संदर्भ में पुलिस का व्यवहार अत्यन्त उत्पीड़क था। दरअसल अंग्रेजों द्वारा जिस पुलिस व्यवस्था की स्थापना की गयी थी, उसका उद्देश्य अपने औपनिवेशिक हितों की पूर्ति करना था। सभी उच्च पदों पर अंग्रेजों की ही नियुक्ति की जाती थी और भारतीयों को दारोगा से ऊपर बढ़ने नहीं दिया जाता था।

न्याय व्यवस्था

प्राक् ब्रिटिश भारत में उपस्थित न्याय व्यवस्था प्राचीन और मध्यकालीन विशेषताओं पर आधारित थी। यही वजह है कि पारम्परिक न्याय प्रणाली प्रगतिशील तो नहीं थी, साथ ही यह समय के साथ अधिक रूढ़ भी हो गया था। भारत में अंग्रेजों का आगमन एक ऐसे कोश महादेश से हुआ था जिसने प्रगतिशील, मानववाद और संसारवाद पर आधारित चिन्तन को अपना लिया था। जहाँ भारत की पारम्परिक न्याय प्रणाली धर्म, जाति, सामाजिक विभाजन को बरकरार रखने का माध्यम था, वहीं यूरोपीय व्यवस्था में मानव केन्द्र में आ गया था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में जिस न्याय प्रणाली का विकास हुआ वह पारम्परिक न्याय प्रणाली के स्थान पर यूरोप आधारित न्याय व्यवस्था की ओर संक्रमण कोबताता है।

भारत में न्याय प्रणाली के विकास में भू-धारण का प्रभाव महत्वपूर्ण है। आरंभिक काल में अंग्रेजों का सर्वप्रमुख कार्य भूमि पर अधिकार और उससे अधिकतम राजस्व की उगाही करना था। इस वजह से आरंभिक व्यवस्थाएँ भूमि के संदर्भ में की गयी। 1765 ई. में दीवानी प्राप्त करने के उपरान्त क्लाइव ने भारत की पारम्परिक, स्थानीय और प्रचलित प्रशासनिक न्यायिक व्यवस्थाओं में विशेष हस्तक्षेप नहीं किया।

न्याय प्रणाली के संदर्भ में परिवर्तन वारेन हेस्टिंग्स के काल में आरम्भ हुआ जब भारत पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का प्रभुत्व स्पष्ट, सशक्त, वैधानिक और ब्रिटिश संसद द्वारा भी स्वीकार्य हो गया। 1773 ई. के रेग्युलेटिंग एक्ट के तहत कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई, के शासन और स्वतंत्र न्यायपालिका के सिद्धान्तों पर आधारित था। वारेन हेस्टिंग्स ने भी नागरिक और अपराधिक मामलों के लिए अलग-अलग अदालतों की स्थापना की। हालांकि वारेन हेस्टिग्स को भारत के न्याय प्रणाली में आधुनिक रूपों के समावेश का श्रेय दिया जाता है परन्तु उसकी  न्याय प्रणाली भी कतिपय विशेषताओं को छोड़कर मूल रूप से मुगल व्यवस्था पर ही आधारित थी। न्याय प्रणाली में जिन प्रगतिशील तत्वों का समावेश किया गया था, वे मूल रूप से अंग्रेजों के संदर्भ में ही लागू की गयी थी। अभी स्थानीय जनता से इनका सरोकार स्थापित नहीं हुआ था।

कॉर्नवालिस के काल में न्याय प्रणाली का अधिक यूरोपीयकरण हुआ। दण्ड संहिता में भी यूरोपीय आधार पर परिवर्तन किया गया तथा अब से ‘एक्ट्स रिया’ (Acts Ria) के स्थान पर ‘मेन्स रिया’ पर विशेष बल दिया गया। अर्थात् हत्या के लिए प्रयुक्त प्रक्रिया और अस्त्र को महत्व न देकर हत्या की भावना पर बल दिया जाने लगा।

न्याय व्यवस्था में अगला परिवर्तन बेंटिक के काल में हुआ। बॅटिक के सुधार प्रतियोगितावादी विचारधारा से प्रभावित  थे इस विचारधारा के अधार पर उसने दण्ड को बदले की भावना से हटाकर अपराधी के चारित्रिक सुधार से जोड़ दिया। अन्य सुधारों के तहत बेंटिक ने अदालतों में फारसी के स्थान पर प्रान्तीय भाषाओं के प्रयोग की अनुमति दी तथा न्यायालयों में ज्यूरी प्रथा का समावेश किया। 1833 ई. में मैकाले की अध्यक्षता में ‘प्रथम विधि आयोग’ का गठन किया गया, जिसके सुझावों के आधार पर भारतीय दण्ड संहिता का निर्माण हुआ।

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