भारतीय संविधान की प्रस्तावना

प्रत्येक संविधान के प्रारंभ में सामान्यतया एक प्रस्तावना होती है जिसके द्वारा  संविधान के मूल उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को स्पष्ट किया जाता है। संविधान की प्रस्तावना उन राजनैतिक, नैतिक, आर्थिक और धार्मिक मूल्यों को व्यक्त करती है जिन्हें प्रोत्साहित करने के लिए हमारा संविधान प्रतिबद्ध है। यह सत्ता के स्रोत, सरकारी प्रणाली और राजनैतिक व्यवस्था के लिए वांछनीय प्रयोजनों की विशिष्ट रूप से पहचान करती है। इसमें एक ऐसा दर्शन अंतर्निहित है जो उन आदर्शों और आकांक्षाओं को अपनी परिधि के अंदर समाहित किए हुए है जिनके प्रति राष्ट्रीय आंदोलन ने अपनी प्रतिबद्धता दर्शायी थी। किसी संविधान की प्रस्तावना से यह आशा की जाती है कि जिन मूलभूत मूल्यों तथा दर्शन पर संविधान आधारित हो तथा जिन लक्ष्यों तथा उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास करने के लिए संविधान निर्माताओं ने राज्य व्यवस्था को निर्देशित किया हो उसका प्रस्तावना में समावेश हो। संविधान की प्रस्तावना में उन महान आदर्शों, मौलिक उद्देश्यों व व लक्ष्यों का उल्लेख किया गया है, जिनके आधार पर भविष्य के भारत का निर्माण किया जाना था। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में जिस मौलिक दर्शन का उल्लेख मिलता है, वास्तव में विभिन्न संविधान प्रावधान उन्हीं की पूर्ति का प्रयास है। भारतीय संविधान में निहित दर्शन, जिसकी अभिव्यक्ति प्रस्तावना में की गई है, वास्तव में उस युग का राजनीतिक दर्शन कल्याणकारी राज्य की ओर उन्मुख उदारवादी लोकतंत्र का दर्शन के अनुरूप था, जिसमें संविधान का निर्माण किया गया।

प्रस्तावना के प्रमुख तत्त्व (Principal Elements of the Preamble)

हम भारत के लोग-इसका अर्थ है भारतीय संविधान भारतीय जनता को समर्पित है।

सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न (Sovereign)-इसका अर्थ है भारत अपने आंतरिक एवं वैदेशिक मामलों में बिना किसी बाह्य दबाव एवं प्रतिबद्धता के स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम होगा।

समाजवादी (Socialistic)-संविधान की प्रस्तावना में इस शब्द का उल्लेख 42 वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा किया गया। इसका उद्देश्य सभी उत्पादन के साधनों का राष्ट्रीयकरण करना नहीं है, अपितु आर्थिक शोषण को समाप्त करने से है। भारतीय संविधान में समाजवादी, शब्द के साथ लोकतंत्र शब्द जुड़ा है। अर्थात् जहाँ लोकतंत्रीय समाजवाद की अवधारणा है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुरूप अपना आर्थिक विकास कर सकता है। राज्य द्वारा इस उत्थान में किसी प्रकार की बाधा नहीं डाली जाएगी। राज्य कमजोर तबके के लोगों के आर्थिक उत्थान के लिए सहयोग प्रदान करेगा।

पंथ निरपेक्षता (Secular)-राज्य यथासंभव राजकीय कार्यों जैसे अर्थव्यवस्था, शिक्षा, राजनीति तथा कानून आदि में धर्म का प्रयोग नहीं करेगा तथा सभी व्यक्तियों का कल्याण सुनिश्चित करेगा और सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करेगा। भारत में पंथ निरपेक्ष राज्य की स्थापना की गई है।

एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामला 1994 में सर्वोच्च न्यायालय  द्वारा पंथनिरपेक्षता को संविधान के आधारभूत ढाँचे का अंग बताया गया। प्रस्तावना में इस शब्द को 42 वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा शामिल किया गया। पंथनिरपेक्ष भारतीय राज्य में:

  1. सरकार न किसी धर्म के मानने वाले को प्रोत्साहन देगी और न ही किसी को हतोत्साहित करेगी।
  2. भारत सरकार का कोई भी धर्म, राज्य धर्म नहीं होगा एवं सरकार सभी धर्मों एवं मतों का समान रूप से सम्मान करेगी तथा उन्हें अपने धर्म को पल्लवित एवं पुष्पित करने में बाधा उत्पन्न नहीं करेगी।
  3. सरकारी विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी तथा सरकार से सहायता प्राप्त करने वाले शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा अनिवार्य नहीं की जायेगी।
  4. अल्पसंख्यकों को अपनी रूचि की शिक्षण संस्थाएँ स्थापित करने का अधिकार होगा तथा वे अपनी भाषा-संस्कृति की रक्षा के लिए भी प्रयास कर सकते हैं।

लोकतंत्रात्मक (Democratic)-इसका अभिप्राय यह है कि शासन की सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित है। इसके अंतर्गत बिना किसी भेद-भाव के प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को निर्वाचन प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार है। इस प्रकार की व्यवस्था में जनता के द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों के द्वारा सरकार की स्थापना की जाती है और सरकार का संचालन जनता के हित में किया जाता है।

गणराज्य (Republic)-ऐसा राज्य जिसका प्रमुख निर्वाचित होता है वंशानुगत नहीं। भारत में संसदीय सरकार की स्थापना करके तथा निर्वाचित राष्ट्रपति को राज्य का प्रमुख बनाकर प्रस्तावना में शामिल ‘लोकतंत्रात्मक गणराज्य’ शब्द की अभिपुष्टि की गई है।

प्रस्तावना के उद्देश्य

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में पांच उद्देश्यों (न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व तथा राष्ट्रीय एकता व अखंडता) को स्पष्ट किया गया है। प्रस्तावना में भारत के समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय की प्राप्ति की बात कही गयी है। इसके अंतर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करने का अधिकार होगा।

सामाजिक न्याय (Social Justice)-जिसमें व्यक्ति-व्यक्ति में जाति व पंथ के आधार पर भेदभाव न हो, ऊँच-नीच की भावना न हो तथा समाज के सभी वर्गों के लोगों को अपने व्यक्तित्त्व के विकास का पूर्ण अवसर प्राप्त हो।

आर्थिक न्याय (Economic Justice)-जिसमें देश की संपत्ति का नागरिकों में यथासम्भव समान वितरण हो ताकि अधिकाधिक व्यक्तियों को उनका अधिकाधिक लाभ प्राप्त हो सके। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को अपनी योग्यतानुसार धनोपार्जन के साधन उपलब्ध हों, किंतु किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति का आर्थिक शोषण करने का अधिकार न हो।

राजनैतिक न्याय (Political Justice)-जिसमें देश के नागरिकों को अपने देश की शासन व्यवस्था में भाग लेने का अधिकार हो। अर्थात् राज्य के अंतर्गत समस्त नागरिकों को समान रूप से नागरिक और राजनैतिक अधिकार प्राप्त हों।

स्वतंत्रता (Freedom)-लोकतंत्र की वास्तविक स्थापना तभी हो सकेगी जब स्वतंत्र और सभ्य जीवन के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिकार समाज के प्रत्येक सदस्य को सुनिश्चित हो जाते हैं। साथ ही नागरिकों के व्यक्तित्त्व के पूर्ण विकास के लिए भी विभिन्न स्वतंत्रताओं का प्राप्त होना आवश्यक है। प्रस्तावना में व्यक्ति के इन आवश्यक अधिकारों का ‘विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता’ के रूप में उल्लेख किया गया है।

प्रतिष्ठा अवसर की समता (Equality of Opportunity) यहाँ समता से अभिप्राय है सामाजिक संरचना से, असमानता को दूर करना और प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिष्ठा व अवसर की समानता सुनिश्चित कराना, जिससे उसका सर्वोत्तम विकास हो सके। संविधान में इस उद्देश्य को सुनिश्चित करने के लिए एक नागरिक और दूसरे नागरिक के बीच राज्य द्वारा किए जाने वाले सभी विभेदों को अवैध घोषित किया गया है।

बंधुता (Fraternity)-प्रस्तावना में व्यक्ति की गरिमा को सुनिश्चित करने के लिए बंधुता को बढ़ाने का संकल्प व्यक्त किया गया है। ज्ञातव्य है कि सर्वप्रथम फ्रांसिसी अधिकारों के घोषणापत्र में और फिर संयुक्त राष्ट्रसंघ में मानव अधिकारों में बंधुता पर बल दिया गया।

भारतीय संविधान की उद्देशिका में बंधुत्व की यही भावना दृष्टिगोचर होती है। यह भारत जैसे देश के लिए और भी आवश्यक है क्योंकि यहाँ के लोग विभिन्न मूलवंश, धर्म, भाषा और संकृति वाले हैं।

राष्ट्र की एकता और अखंडता (Unity and Intergrity of the Nation) -42 वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा उद्देशिका में ‘और अखंडता’ शब्दों को जोड़कर अलगाववादी शक्तियों पर अंकुश स्थापित किया गया है और इस भावना का विकास किया गया है कि भारत के लोग सम्पूर्ण देश को अपनी मातृभूमि समझे।

प्रस्तावना का महत्त्व

भारतीय राजव्यवस्था लोकतंत्रात्मक है, जिसमें लोगों के मूल अधिकारों तथा स्वतंत्रता की गारंटी दी गयी है तथा राष्ट्र की एकता सुनिश्चित की गयी है। प्रस्तावना में उस आधारभूत दर्शन और राजनीतिक, धार्मिक व नैतिक मूल्यों का उल्लेख हैं जो हमारे संविधान के आधार है। सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य के वाद में न्यायमूर्ति मधोलकर ने कहा था कि उद्देशिका पर ‘गहन विचार विमर्श’ की छाप है तथा उद्देशिका ‘संविधान की विशेषताओं का निचोड़’ है। गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य के मामले में न्यायमूर्ति हिदायतुल्लाह ने भी विचार व्यक्त किया कि ‘संविधान की उद्देशिका उन सिद्धांतों का निचोड़ है जिनके आधार पर सरकार को कार्य करना है’ वह ‘संविधान की मूल आत्मा है, शाश्वत है, अपरिवर्तनीय है। ‘भले ही प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग माना जाता है (केशवानंद भारतीय बनाम केरल राज्य), फिर भी यह भी अपनी जगह सत्य है कि यह न तो किसी शक्ति का स्त्रोत है और न ही उसको किसी प्रकार सीमित करता है।

प्रस्तावना को न्यायालय में प्रवर्तित नहीं किया जा सकता किंतु लिखित संविधान की उद्देशिका में वे उद्देश्य लेखबद्ध किये जाते हैं, जिनकी स्थापना और संप्रवर्तन के लिए संविधान की रचना होती है। प्रस्तावना का महत्त्व यह भी है कि जब कोई अनुच्छेद अस्पष्ट हो और उसका ठीक-ठीक अर्थ जानने में कठिनाई हो तो स्पष्टीकरण के लिए प्रस्तावना की भाषा का सहारा लिया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, प्रस्तावना में संविधान निर्माताओं के आशय को समझने के लिए प्रस्तावना का सहारा लिया जा सकता है। प्रस्तावना संविधान की आत्मा है। सभी संवैधानिक और संसदीय अधिनियमों की इसके प्रकाश में व्याख्या की जा सकती है। प्रस्तावना का महत्त्व इस कारण भी स्पष्ट होता है कि यह संविधान के स्वरूप, कार्यप्रणाली तथा राजनीतिक व्यवस्था को प्रकट करने के साथ-साथ भावी भारत के स्वरूप को भी चित्रित करती है। प्रस्तावना में’ हम क्या करेंगे, हमारा ध्येय क्या है और किस दिशा में जा रहे हैं ‘का उल्लेख है। वस्तुतः संविधान की प्रस्तावना से दो प्रयोजन स्पष्ट होते हैं-प्रथम, प्रस्तावना यह स्पष्ट करती है कि संविधान के प्राधिकार के स्त्रोत क्या हैं और द्वितीय, संविधान किन उद्देश्यों को संवर्धित या प्राप्त करना चाहता है

प्रस्तावना में संशोधन

केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य के वाद में यह प्रश्न सर्वप्रथम न्यायालय के समक्ष विचार के लिए उपस्थित हुआ था कि क्या अनुच्छेद 368 के तहत प्रस्तावना में संशोधन किया जा सकता है अथवा नहीं? इस संदर्भ में सरकार का यह तर्क था कि चूंकि प्रस्तावना संविधान का एक अंग है, अतएव अनुच्छेद 368 के अंतर्गत उसमें संशोधन किया जा सकता है। अपीलार्थी की ओर से यह कहा गया कि अनुच्छेद 368 द्वारा प्रदत्त संशोधन की शक्ति सीमित है। प्रस्तावना में संविधान का आधारभूत ढांचा निहित है, जिसे संशोधन करके नष्ट नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इससे संवैधानिक ढाँचे का चरमरा जाना निश्चित है। उच्चतम न्यायालय ने बहुमत से इस मामले में यह निर्धारित किया है कि प्रस्तावना संविधान का भाग है, अतः इसमें संशोधन किया जा सकता है। किन्तु न्यायालय ने इसके साथ यह भी निर्धारित किया है कि प्रस्तावना के उस भाग में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता है जो आधारभूत ढाँचे से सम्बन्धित है। संविधान के 42 वें संशोधन अधिनियम, 1976 के पश्चात् यह स्पष्ट हो चुका है कि संसद को प्रस्तावना में संशोधन की शक्ति प्राप्त है, किन्तु जब तक केशवानंद भारती का निर्णय उलट नहीं दिया जाता, प्रस्तावना में किए गए संशोधन को कभी भी न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है कि वह उसमें निहित आधारभूत ढाँचे में परिवर्तन है।

  • भारतीय शासन व्यवस्था के आधारभूत मूल्यों का वर्णन संविधान के प्रस्तावना में किया गया है।
  • संविधान की आधारशिला उद्देश्य प्रस्ताव संविधान का दर्शन प्रस्तावना (अम्बेडकर के अनुसार संविधान की आत्मा अनुच्छेद 32 है।)
  • प्रायः प्रत्येक अधिनियम के प्रारम्भ में एक उद्देशिका होती है जिसमें कि उन उद्देश्यों का उल्लेख किया जाता जिनकी प्राप्ति के लिए उक्त अधिनियम पारित किया गया है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने’ इन री वेरूबारी यूनियन (1960) ‘के वाद में इसे संविधान निर्माताओं के विचारों को जानने की कुंजी बताया है। लेकिन यह भी कहा कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं हैं। 1973 में केशवानंद भारती वाद में प्रस्तावना को संविधान का अंग मान लिया गया और कहा गया कि यह संविधान की व्याख्या में सहायक है (यही वर्तमान में स्थिति है)।
  • प्रस्तावना का आरम्भ’ हम भारत के लोग ‘शब्द से होता है। यह स्पष्ट करता है कि भारतीय संविधान का स्रोत भारतीय जनता है।
  • समाजवादी शब्द 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा 2 जनवरी, 1977 को जोड़ा गया है।
  • पंथनिरपेक्षता 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा 3 जनवरी, 1977 को प्रस्तावना में जोड़ा गया है।
  • संविधान की प्रस्तावना में अखण्डता शब्द भी 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा 3 जनवरी, 1977 को जोड़ा गया।
  • प्रस्तावना को न्यायालय द्वारा परिवर्तित नहीं कराया जा सकता है। इस बात की घोषणा सर्वोच्च न्यायालय ने यूनियन ऑफ इण्डिया बनाम मदन गोपाल (1957) के केस में की थी।
  • प्रस्तावना किसी संविधान का सबसे अधिक मूल्यवान अंग होता है। यह संविधान की आत्मा होती है। इसे हम संविधान की कुंजी के रूप में जानते हैं। यह एक उचित मानदण्ड है, जिसके आधार पर संविधान का मूल्यांकन किया जा सकता है। प्रायः प्रत्येक संविधान के प्रारम्भ में एक प्रस्तावना होती है जिसके आधार पर संविधान का मूल्यांकन किया जा सकता है तथा जिसके द्वारा संविधान के मूल उददेश्यों व लक्ष्यों को स्पष्ट किया जाता है।
  • ‘प्रभुत्व सम्पन्न’ शब्द इस बात का द्योतक है, कि भारत आंतरिक या बाह्य दृष्टि से किसी भी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं है, यह संप्रभुता भारत के लोगों में निहित है।
  • हमारे संविधान में शासन की पद्धति के रूप में प्रतिनिधिक लोकतंत्र की कल्पना की गयी है।
  • राजनैतिक न्याय से तात्पर्य है कि व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के समान राजनैतिक अधिकार प्राप्त थे।

Leave a Comment