भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन

अत्यन्त प्राचीन काल से ही पश्चिमी देशों के साथ भारत का व्यापार होता रहा है। मध्ययुग की यूरोपीय मंडियों में भारतीय मालों का भारी मांग थी। इन व्यापारिक उद्देश्यों से भौगोलिक खोजें प्रारंभ हुई। 15 वीं सदी के अंतिम चतुर्थांश की भौगोलिक खोजों का वैश्विक व्यापारिक संबंधों पर गहरा प्रभाव पड़ा बास्को-डि-गामा ने भारत आने के नये समुद्री मार्ग का पता लगाया और 1498 ई. को कालीकट के बंदरगाह पर पहुँचा। पुर्तगालियों के बाद क्रमशः हालैण्ड, इंग्लैण्ड, डेनमार्क एवं फ्रांसीसी व्यापारिक कम्पनियाँ भारत आई।

पुर्तगाली

समुद्री मार्ग से भारत आने वाले प्रथम यूरोपीय यात्री बास्को-डि-गामा को भारत में काली मिर्च के व्यापार से काफी मुनाफा हुआ, जिससे अन्य पुर्तगीज व्यापारियों। भी प्रोत्साहन मिला। पुर्तगाली शासकों द्वारा भी इस व्यापार को प्रोत्साहन दिया गया लेकिन कलांतर में डचों तथा अंग्रेजों के कारण पुर्तगालियों के अधिकांश व्यापार क्षेत्र उनके हाथों से निकल गये, केवल दीव, दमन एवं गोवा शेष बच गये, जहाँ 1961 ई. तक उनका शासन बना रहा।

पुर्तगालियों के भारतीय व्यापार में असफलता के अनेक कारण थे, जैसे भारतीय जनता के प्रति धार्मिक असहिष्णुता की भावना, गुप्त व्यापार की नीति, डकैती एवं लूटपाट की नीति, नये उपनिवेश ब्राजील की खोज के कारण भारत पर अधिक ध्यान नहीं देना आदि। अन्य यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों से प्रतिस्पर्धा में पुर्तगाली पिछड़ गए। अपर्याप्त व्यापारिक तकनीक एवं पुर्तगीज वायसरायों पर पुर्तगाली राजा के नियंत्रण आदि के कारण भी वे सफल नहीं हो सकें।

डच

दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला बाजारों में प्रवेश प्राप्त करने के लिए पुर्तगालियों के बाद डचों का प्रवेश हुआ। शीघ्र ही डच कंपनी ने अंग्रेजों की सहायता से भारतीय समुद्री व्यापार से पुर्तगालियों को लगभग निष्कासित कर मसाला तथा शोरा व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया। डचों द्वारा भारत से नील, शोरा और सूती वस्त्र का निर्यात किया जाता था। मुख्यतः डच लोग भारत से सूती वस्त्र का ही व्यापार करते थे।

डचों तथा अंग्रेजों के बीच 1759 ई. में हुए ‘बेदरा युद्ध’ में ब्रिटिश नौसेना की श्रेष्ठता सिद्ध हुई और डचों के भारतीय व्यापार को गहरा धक्का लगा। बाद में 1795 ई. में उन्होंने अपने भारतीय प्रतिष्ठानों को अंग्रेजों को बेच कर दक्षिण-पूर्वी एशिया में खुद को केन्द्रित कर लिया।

अंग्रेज

उन यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों में, जिन्होंने में आकर अपनी व्यापारिक गतिविधियाँ आरंभ की, अंग्रेज सर्वाधिक सफल रहे। वस्तुतः अंग्रेज भारत सहित समूचे एशियाई व्यापार के स्वरूप को समझते थे। व्यापार विस्तार के लिए उन्होंने राजनीतिक एवं सैनिक शक्तियों का सहारा लिया, अतः वे अपने व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ औपनिवेशिक नीति में भी सफल रहे।

दिसंबर, 1600 ई. में ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को पूर्व के साथ व्यापार के लिए 15 वर्षों का अधिकार पत्र प्रदान किया। कंपनी का प्रारंभिक उद्देश्य भू-भाग प्राप्त करना नहीं बल्कि व्यापार था। 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अनेक कारणों से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की नीति में परिवर्तन आया, अब वह केवल व्यापारिक संस्था हुआ | भर नहीं। अतः रहकर कम्पनी भारतीय ने कोर्ट राजनीति ऑफ में डाइरेक्टर्स भी दिलचस्पी से सैनिक लेने शक्ति लगा। की मदद मुख्यतः से सामान्य भारत के व्यापार राजनीतिक का प्रबंध अव्यवस्था करने की के अनुमति कारण प्राप्त की। इस नई नीति के अंतर्गत अब स्थानीय शक्तियों से संघर्ष अनिवार्य हो गया। इसी क्रम उसका पहले मुगलों से, बाद में फ्रांसीसी कंपनी एंव बंगाल के नवाब से संघर्ष हुआ जिसमें कम्पनी ने सफलता प्राप्त की। इस प्रकार 18 वीं सदी के दूसरे दशक तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में एक प्रमुख व्यापारिक कंपनी के रूप में उभर कर सामने आई।

फ्रांसीसी

अन्य यूरोपीय कंपनियों की तुलना में फ्रांसीसी भारत में देरी से आये। फ्रांसीसियों ने 1668 ई. में सूरत में अपने पहले व्यापारिक कारखाने की स्थापना की। यूरोप में ब्रिटिशों के समर्थन से डचों का फ्रांसीसियों से प्रतिद्वंद्विता चल रहा था, जिसका प्रभाव भारत पर भी पड़ा। इससे उसके व्यापारिक प्रभाव में कमी आई।

1742 ई. के बाद इस कंपनी का राजनीतिक उद्देश्य, व्यापारिक लाभ की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया। इस समय फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी का भारतीय गवर्नर इप्ले भारत में फ्रांसीसी साम्राज्य स्थापित करने की महत्वकांक्षा पालने लगा, जिसे ब्रिटिशों ने चुनौती दिया। यहीं से दोनों इग्लैण्ड तथा फ्रांसीसी कम्पनियों के मध्य संघर्ष आरम्भ हुआ. जिससे भारतीय इतिहास में नया परिचय प्रारंभ हो गया.

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