भारत में फ्रांसीसियों की असफलता के कारण

1746-63 ई. के बीच भारत में दोनों कंपनियों के बीच तीन महत्त्वपूर्ण युद्ध हुए, जो यूरोपीय राजनीति से प्रभावित थे । इस समय में नया अंग्रेज परिच्छेद एवं तिर फ्रांसीसी प्रारंभ हो दोनों शाश्वत थे तथा ज्यों ही यूरोप में उनकी आपसी युद्ध आरंभ होता इस युद्ध की प्रतिध्वनि संसार में जहाँ-जहाँ भी अंग्रेज और फ्रांसीसी थे, हुई। अतः भारत भी इससे अछुता नहीं रहा। इसी संदर्भ में कर्नाटक युद्ध प्रसिद्ध है। इस युद्ध में फ्रांसीसियों की शक्ति अंतिम रूप से टूट गई, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि अंग्रेज ही भारत के भाग्य विधाता होंगे।

भारत में फ्रांसीसियों की असफलता के कारण

भारत में साम्राज्य स्थापना के लिए होने वाले युद्धों में फ्रांसीसियों को अंग्रेजों के समक्ष झुकना पड़ा और वांडीवास के युद्ध ने स्पष्ट कर दिया कि भारत में अंग्रेजों की सत्ता ही स्थापित होगी। अंग्रेजों के विरूद्ध फ्रांसीसियों को असफलता के कई कारण थे:

  1. अंग्रेजी नौ-सेना फ्रांसीसियों की सेना से अत्यन्त शक्तिशाली थी तथा सामुद्रिक मार्ग पर अंग्रेजों का नियंत्रण था।
  2. फ्रांस ने भारत में साम्राज्य निर्माण को उतना महत्व नहीं दिया जितना इंग्लैंड ने दिया। फ्रांस अमेरिका में अपना उपनिवेश कायम करना चाहता था।
  3. अंग्रेजी कंपनी एक स्वतंत्र व्यापारिक कंपनी थी। इसके विपरीत फ्रांसीसी कंपनी पर फ्रांसीसी सरकार का पूर्ण नियंत्रण था, वह कंपनी के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करती थी।
  4. अंग्रेजों ने बंगाल जैसे सम्पन्न प्रांत को जीत कर एक सुरक्षित आधार प्राप्त कर लिया, वहीं फ्रांसीसियों को पांडिचेरी प्राप्त था, जो एक सुरक्षित आधार नहीं था।
  5. फ्रांसीसी कंपनी के उंचे अधिकारी परस्पर ईर्ष्याभाव रखते थे, दूसरी ओर अंग्रेज कर्मचारी हमेशा संगठित होकर कार्य करते थे और उनके लक्ष्य में एकता थी।
  6. भारत में अंग्रेजी-फ्रांसीसी प्रतिस्पर्धा पर यूरोपीय राजनीति का पूरा प्रभाव पड़ता था। सप्तवर्षीय युद्ध में अंग्रेजों की विजय ने अमेरिका तथा भारत में स्थित उपनिवेशों में भी फ्रांसीसियों की पराजय की घोषणा कर दी।

उपर्युक्त कारणों से भारत में फ्रांसीसियों का पतन हुआ और तृतीय कर्नाटक युद्ध के बाद भारत में उनकी शक्ति समाप्त हो गई।

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