हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण की व्याख्या आरंभ से ही एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। विभिन्न विद्वानों के द्वारा इसके लिए प्रयुक्त शब्दावली में भी भिन्नता है। पहले सभ्यता के पतन के लिए अंत या निर्धन जैसी शब्दावली का प्रयोग किया जाता था। परंतु आज इन शब्दों पर आपत्ति उठाई गई है तथा इस बात पर जोर दिया गया है कि हड़प्पा सभ्यता के नगरों के साथ हड़प्पा की परंपरा भी समाप्त नहीं हो गई। बल्कि यह अपने बदले हुए स्वरूप में गुजरात, पंजाब के कई क्षेत्रों में जारी रहता है अब “ बदले हुए रूप ”शब्द का प्रयोग ज्यादा प्रासंगिक दिखता है। 

हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण
हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण

क्या हड़प्पा सभ्यता पतन का अकस्मात हुआ

आवश्यक अध्ययन सामग्री के कारण हड़प्पा सभ्यता के उद्भव तथा पतन का मुद्दा प्राचीन भारत के इतिहास लेखन में एक विवाद का मुद्दा रहा है। आरंभ में इस सभ्यता के पतन के लिए निधन शब्द का प्रयोग किया गया था। तथा इसकी व्याख्या आक्रमण, प्राकृतिक आपदा अथवा महामारी जैसे कारकों के संदर्भ में की गई। किंतु नवीन शोध ने इस अवधारणा को अस्वीकार कर दिया है। मॉर्टिमर व्हीलर ने आर्य आक्रमण के संदर्भ में हड़प्पा सभ्यता के पतन की व्याख्या प्रस्तुत की उन्होंने घोषित किया कि इसका अंत  विध्वंसात्मक था। अपने मत के पक्ष में वे मोहनजोदड़ो से 26 नर कंकाल तथा हड़प्पा से कब्रगाह एच H का उदाहरण देते हैं। किंतु बोलते हुए साहित्यिक साक्ष्य पर निर्भर है। तथा ऋग्वेद में वर्णित हरिपुरिया एवं पुरंदर जैसे उद्धरण के माध्यम से अपने मत को पुष्ट करने का प्रयत्न करते हैं किंतु उनके द्वारा प्रस्तुत पुरातात्विक साक्ष्य पर्याप्त हैं। एवं साहित्यिक साक्ष्य संदिग्ध, नवीन शोध के आधार पर यह बात स्पष्ट हो चुकी है की हड़प्पा सभ्यता का पतन तथा वैदिक आर्यों के आगमन के बीच लगभग 300 से 400 वर्षों का अंतराल था। फिर कुछ विद्वानों के द्वारा बाढ़, भूकंप अथवा महामारी को इस सभ्यता के आकस्मिक निधन के लिए उत्तरदाई मानते थे किंतु यह स्मरणीय है। कि उपयुक्त कारण कुछ स्थलों के पतन के लिए उत्तरदाई हो सकते हैं। संपूर्ण सभ्यता के पतन के लिए नहीं फिर यहां  आकस्मिक निधन जैसी अवधारणा को स्वीकार करना उचित नहीं है। क्योंकि सभ्यता के पतन का अर्थ में नगरीय चरण का पतन था सभ्यता की समाप्ति नहीं यह सभ्यता परिवर्तित रूप में आगे तक चलती रही ।

आज हड़प् हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण में आकस्मिक निधन के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया जाता क्योंकि हड़प्पा परंपरा समाप्त नहीं वरन यह परिवर्तित रूप में आगे भी चलती रही। इसे परिवर्तित हड़प्पा सभ्यता का नाम दिया गया। परिवर्तित हड़प्पाई संस्कृति को हम पांच क्षेत्र में  बांटकर देख सकते हैं उदाहरण स्वरूप सिंध क्षेत्र, पश्चिमी पंजाब और बहावलपुर, पंजाब, हरियाणा और सौराष्ट्र क्षेत्र तथा गंगा यमुना दोआब क्षेत्र सिंध में  चन्हूदड़ो आदि क्षेत्र में एक क्षेत्र संस्कृति के रूप में झुककर संस्कृति का विकास हुआ।

पश्चिमी पंजाब और बहावलपुर में कब्रगाह एच (H) संस्कृति विकसित हुई। सबसे दिलचस्प तथ्य यह है। कि जहां सिंध पंजाब और बहावलपुर के क्षेत्र में बस्तियों की संख्या कम हुई। वहीं हरियाणा गुजरात और गंगा यमुना दोआब के क्षेत्र में बस्तियों की संख्या में विस्तार हुआ। यही वजह है कि आज हड़प्पा सभ्यता के संदर्भ में आकस्मिक निधन जैसी अवधारणा ने अपना औचित्य खो दिया है।

हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण का परीक्षण करने से पूर्व निम्नलिखित तत्व पर ध्यान देना आवश्यक है। हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न स्थलों के पतन के कालक्रम में स्पष्ट अंतर है जैसे मोहनजोदड़ो जैसे इस साल का पतन 2200 से पूर्व से प्रारंभ हुआ जो अंततः 2000 पूर्व तक संपन्न हो गया। जबकि दूसरे स्थल 1800 ईसा पूर्व तक चलते रहे। इसी तरह विभिन्न स्थलों के पतन के स्वरूप में भी अंतर दिखता है। जैसे मोहनजोदड़ो एवं धौलावीरा जैसे स्थलों में मृत्यु के पूर्व ही बुढ़ापे के लक्षण देखने लग गए थे जैसे नगर निर्माण का अनेक स्तर मिलना, पुरानी दो को दोबारा प्रयोग में लाना कामा सड़कों पर अतिक्रमण होना तथा शिल्प  निर्माण की गति का धीमा होना आदि परंतु कालीबंगा कॉमन वाली जैसे स्थलों का अवसान पूर्ण व्यवस्था में ही हो गया लगता है।

हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण आर्यों का आक्रमण

हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण की व्याख्या करते हुए मोर्टिमर व्हीलर जैसे विद्वानों नेआर्य आक्रमण की अवधारणा पर बल दिया है उन्होंने यह घोषणा किया कि हड़प्पा सभ्यता का पतन क्रमिक एवं दीर्घायु रहा किंतु अंततः विनाश आत्मक। उनके विचार में  पारिस्थितिकी  साक्ष्यों के आधार पर इंद्र घोषित ठहरता है फिर भी अपने मत के पक्ष में उन्होंने कुछ पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए। पुरातात्विक साक्ष्य के रूप में उन्होंने मोहनजोदड़ो से प्राप्त 26 नर कंकाल, जिन पर तेज पेने अस्त्रों के घाव हैं।

 किंतु सूक्ष्म विश्लेषण के पश्चात ऐसा ज्ञात होता है कि मोर्टिमर व्हीलर के द्वारा प्रस्तुत पुरातात्विक साक्ष्य पर्याप्त एवं साहित्यिक साक्ष्य संदिग्ध हैं। महज 26 नर कंकालों के आधार पर यह सिद्ध करना कठिन है कि यह आर्यों के आक्रमण के परिणाम था। उसी तरह परवर्ती काल के अन्वेषण के द्वारा यह बात सिद्ध हो गई है कि  कब्रगाह में प्राप्त नर कंकाल आक्रमणकारी की लाश नहीं थी क्योंकि हड़प्पा सभ्यता के पतन के अवसर पर वह व्यक्ति वहां मौजूद नहीं था बल्कि वह वहां हड़प्पा सभ्यता के पश्चात आया था।

 ब्रिटिश आक्रमण

अब जहां तक साहित्यिक साक्ष्य का सवाल है तो इस संबंध में हम ऐसा  कह सकते हैं कि इसकी विश्वसनीयता सिद्ध नहीं है क्योंकि ऋग्वेद किसी एक काल की रचना नहीं है। फिर हड़प्पा सभ्यता के पतन तथा वैदिक आर्यों के आगमन के बीच लगभग 300 से 400 वर्षों का अंतराल था। फिर परीक्षण करने पर यह है ज्ञात होता है कि व्हीलर द्वारा आर्य आक्रमण की अवधारणा के मध्य से ब्रिटिश आक्रमण का उचित सिद्ध करना चाहते थे। 

पारिस्थितिकी असंतुलन

हड़प्पा सभ्यता के पतन से संबंधित बहस पर्यावरणीय कारकों की और मुड़ गई और फिर यह स्थापित किया जाने लगा कि वह नदियां जिनकी गोद में यह सभ्यता पंछी अंतर्गत व सभ्यता के पतन का कारण बनी है। अतः एक दृष्टि से यह नदियां पश्चिम के आक्रमणकारियों की तुलना में भी अधिक घातक सिद्ध हुई। इस प्रकार जल की अधिकता को हड़प्पा सभ्यता के पतन का कारण माने जाने लगा और फिर इस संदर्भ में बाढ़ तथा एक विशेष प्रकार के जल उत्प्लावन पर बल दिया जाने लगा जॉन मार्शल ने मोहनजोदड़ो के विभिन्न स्तरों से बाढ़ के प्रमाण एकत्रित किए उसी प्रकार आर एस राव ने लोथल से बाढ़ के प्रमाण जुटाए

किंतु एम आर साहनी इस बार को एक सामान्य बात नहीं मानते उनके विचार में यह एक विशेष प्रकार का जल उत्प्लावन था। इसके लिए वे विवर्तनिक  विक्षोभ को उत्तरदाई मानते हैं। उनके विचार में विवर्तनिक विक्षोभ के कारण भूमि ऊपर उठ गई। इसके परिणाम स्वरूप जल मोहनजोदड़ो में अवरुद्ध हो गया। मोहनजोदड़ो से रुके हुए जल का साक्ष्य मिलता है। एक अमेरिकी जल वैज्ञानिक  ने भी इस बात की पुष्टि की है। परंतु एक अन्य विद्वान टी. एच. लैम्ब्रिक इस बात से सहमत नहीं है उनका मानना है कि अगर इस प्रकार का कोई कृत्रिम अवरोध कायम हो भी गया तो भी जल अपना मार्ग स्वयं ही बना लेता है।

संक्रामक रोग 

कुछ विद्वानों ने हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण को मलेरिया जैसे रोक के बड़े पैमाने तक पर फैलने पर लोगों के स्वास्थ्य गिर जाने की संभावना व्यक्त की है। और कुछ व्यक्तियों के द्वारा कंकाल की हड्डी का अध्ययन करने के बाद एकमत व्यक्त किया गया कि मलेरिया के कारण हड्डियों का कुछ ठीक प्रकार से विकास नहीं हो पाया था। इतिहास में ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं जब पूरी की पूरी बस्तियों को एक रोकने अपने प्रभाव से ही उजाड़ दिया था।

जल प्लावन

 इस प्रकार धीरे-धीरे यह बहस जल की अधिकता से जल की कमी की ओर मुड़ गई।टी. एच. लैम्ब्रिक  ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि  सिंधु नदी का मार्ग परिवर्तन मोहनजोदड़ो के पतन का एक महत्वपूर्ण कारण था। उसी प्रकार घग्गर नदी का सूख जाना कालीबंगा जैसे स्थल के पतन का कारण हो सकता है। बताया जाता है कि पहले  सतलुज नदी सिंधु की ओर मुड़ गई और फिर यमुना नदी गंगा की सहायक नदी बन गई. अतः घग्गर नदी का प्रभाव तंत्र कमजोर पड़ गया।

विष्णु मित्र और गुरदीप सिंह जैसे विद्वानों ने जल की कमी की ओर संकेत किया है। विष्णु मित्र हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण के लिए प्रकृति के मानवीय हस्तक्षेप तथा अत्यधिक खपत को उत्तरदाई मानते है। उन्होंने जयपुर में हिस्टोरा गांव का दृष्टांत प्रस्तुत किया और यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि प्रकृति में मानवीय हस्तक्षेप के कारण वहां जलवायु नष्ट हो गई।फिर कच्चे प्रदेश में लाखपत क्षेत्र में भी जलवायु नष्ट हो गई।और क्योंकि मोरा बांध के निर्माण के मध्य प्राकृतिक स्रोतों का क्षरण हुआ गुरदीप सिंह ने जो एक महत्वपूर्ण वनस्पति शास्त्री थे।राजस्थान में सांभर डीडवाना और पुष्पा पुष्कर झील से परागों का अवशेष लेकर उनका विश्लेषण किया और फिर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि इन क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा धीरे-धीरे कम हो गई।थी सिर्फ एयर सर्विस महोदय ने भी पारिस्थितिकी असंतुलन को हड़प्पा सभ्यता के पतन का एक महत्वपूर्ण कारण निर्धारित करने का प्रयत्न किया.

हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण नगरीय तथा ग्रामीण क्षेत्र के बीच असंतुलन

हाल ही में डीके चक्रवर्ती ने संबंध में एक नई मान्यता स्थापित करने का प्रयास किया है। उनके विचार में तीसरी शताब्दी और दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य तक हड़प्पा सभ्यता की नगरीय संरचना नगरीय क्षेत्र तथा ग्रामीण क्षेत्र के बीच एक प्रकार के संतुलन का आधारित थी नगरीय जनसंख्या के आसपास से कार संग्रह करता अर्ध कृषक तथा अन्य प्रकार के ग्रामीण समूह भी उपस्थित थे फिर धीरे-धीरे इस सभ्यता का विस्तार पूरा और दक्षिण की ओर हुआ इसके साथ ही इसका रूप परिवर्तित होता चला गया।  क्योंकि क्षेत्र में इसका स्वभाविक विकास में होकर यह कम विकसित समाज के ऊपर प्रत्यारोपित किया गया।  था अतः वह उसे विकसित शिकारी संग्रह करता समूह के द्वारा निकला निगल लिया गया।  अर्थात सभ्यता के नगरी चरण का अवसान हो गया।

हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण के विश्लेषण के क्रम में किसी एक सामान्य करत निष्कर्ष पर पहुंचना तर्कसंगत नहीं है। वस्तुतः सभ्यता के पतन के लिए दो तत्वों को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। पहला है। कि सभ्यता के आधारभूत तत्व में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होना तथा दूसरा पारिस्थितिकी असंतुलन पैदा होना दरअसल सभ्यता के अस्तित्व का आधार एक नाजुक प्रकार के संतुलन पर स्थापित था जो आंतरिक और बाहरी संबंधों पर आधारित इस संतुलन का मूल तत्व अधिशेष उत्पादन एवं विकसित व्यापारिक वाणिज्य था परंतु समय-समय पर आई बाढ़ वर्षा से में कमी जल उत्प्लावन विवर्तनिक विक्षोभ नदियों के मार्ग में परिवर्तन आदि के कारण यह संतुलन बिगड़ गया।  होगा। परिणाम स्वरुप यह हुआ कि कृषि अधिशेष में गिरावट आने लगी कृषि के विकास की प्रक्रिया अवरुद्ध हो गई होगी क्योंकि इस काल में किसी नवीन फसल के संकेत प्राप्त नहीं होते हैं। इसके कारण आंतरिक व्यापार खंडित हुआ और बाहरी व्यापार भी बाधित हो गया  होगा।

जनसंख्या में वृद्धि के कारण

पारिस्थितिकी असंतुलन को भी पतन का एक कारण माना जा सकता है। जनसंख्या में वृद्धि के कारण उस प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ गया।  इसके परिणाम स्वरूप शहर की जनसंख्या पलायन संसाधन की खोज के लिए दूसरे क्षेत्र में हुआ. अतः बस्तियों की संख्या दूसरे क्षेत्र में बढ़ने लगी जैसे गुजरात चित्र में अचानक जनसंख्या में बढ़ोतरी के साथ से प्राप्त होते हैं। यह ध्यान देने योग्य तथ्य की बढ़ती जनसंख्या संसाधनों की वृद्धि की मांग करती है। क्योंकि संसाधन आपूर्ति की ज्यादा आवश्यकता होती है। इसके लिए तकनीकी विकास भी आवश्यक है। पुरातात्विक साक्ष्यों से स्पष्ट होता है। कि सभ्यता के नगरीय चरण के लंबे समय में प्रौद्योगिकी एवं तकनीकी में कोई विकास मूल परिवर्तन नहीं दिखता है।

हड़प्पा सभ्यता के पतन के स्वभाविक कारण

इस प्रकार हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण को न तो आकस्मिक माना जा सकता है। माना जा सकता है। और न ही इसकी व्याख्या मात्र किसी बाहरी आक्रमण के अभियान का प्रतिफल माना जाता है। अतः विस्तृत क्षेत्र में फैले सभ्यता के पतन को एक घटना की वजह प्रक्रिया के रूप में देखा जाना तर्कसंगत है। इन अर्थों में यह पतन की प्रक्रिया सभ्यता के विनाश की ओर नहीं बल्कि शहरीकरण के हराश पतन की ओर संकेत करती है। अतः जिस प्रकार के हड़प्पा सभ्यता का उद्भव एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक आर्थिक प्रक्रिया का परिणाम था उसी प्रकार पतन की प्रक्रिया को भी स्वभाविक निरंतर एवं दीर्घकालीन समझा जाना उचित होगा।

www.gkwiki.in

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

1 thought on “हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारण”

Leave a Comment