भारतीय शास्त्रीय नृत्य का वर्णन कीजिए

 

उत्तरभारतीय शास्त्रीय नृत्य से संबंधित उल्लेख भरतमुनि द्वारा लिखित नाट्यशास्त्र एवं आचार्य नंदीकेश्वर द्वारा रचित अभिनय दर्पण में मिलता है। नाट्य शास्त्र में वर्णित मुद्राएं ही भारतीय शास्त्रीय नृत्य के मूल आधार हैं, लोक दृष्टि से शिव की नटराज मूर्ति शास्त्रीय नृत्य का प्रतीक है।

भारतीय नृत्य परंपरा में शास्त्रीय नृत्य की चार शैलियां प्रचलित थी- भरतनाट्यम, कथकली ,कत्यक एवं मणिपुरी। उल्लेखनीय है कि मोहिनीअट्टम, सत्रिया ,कुचिपुड़ी एवं ओडीसी को शास्त्रीय नृत्य की मान्यता बाद में प्राप्त हुई। इस प्रकार भारत में आठ शास्त्रीय नृत्य प्रचलित हैं।

भरतनाट्यम तमिल संस्कृति में लोकप्रिय एकल नृत्य हैं जिसे आरंभ में मंदिरों में देवदासियों द्वारा भगवान की मूर्ति के समक्ष किया जाता था। इस नृत्य का संबंध नटराज की मूर्ति से माना जाता है। इसमें पैरों से लयबद्ध तरीके से जमीन पर थाप दी जाती हैं, तथा हाथ, गर्दन और कंधे विशेष रूप से गतिमान होते हैं।भरतनाट्यम में नृत्य के साथ अभिनय भी होता है जिसमें शारीरिक भाव भंगिमाओ पर विशेष बल दिया जाता है। भरतनाट्यम में शारीरिक प्रक्रिया को तीन भागों में बांटा जाता है- समभंग,अभंग एवं त्रिभंग। नृत्य का आरंभ ‘ अलारिपु से होता है जब की समाप्ति तिल्लना’ से होती हैं।

बीसवीं सदी में रुकमणी देवी अरुंडेल एवं ई. कृष्ण अय्यर ने इस नत्य को ख्याति प्रदान की। इस नृत्य के प्रमुख आधुनिक कलाकारों में पद्मा सुब्रमण्यम, यामिनी कृष्णमूर्ति, सोनल मानसिंह, मृणालिनी साराभाई, मालविका सरकार एवं मल्लिका साराभाई आदि है।